श्रीलंका में साइबर ठगी के बड़े अड्डे उजागर, 'पिग-बुचेरिंग' घोटाले का नया केंद्र बना द्वीपीय देश
सारांश
मुख्य बातें
श्रीलंका तेज़ी से अंतरराष्ट्रीय टेलीकॉम धोखाधड़ी और 'पिग-बुचेरिंग' निवेश घोटालों का नया गढ़ बनता जा रहा है। आर्थिक संकट से जूझ रहे इस द्वीपीय देश में नियामकीय निगरानी की कमज़ोरी ने संगठित साइबर अपराधियों को यहाँ पाँव जमाने का मौका दे दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, म्यांमार, कंबोडिया और लाओस में सक्रिय साइबर अपराधी नेटवर्क अब अपने ठिकाने श्रीलंका की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं।
स्कैम सेंटरों का खुलासा और छापेमार कार्रवाइयाँ
साल 2024 के मध्य से श्रीलंका पुलिस और क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) ने कई बड़े अभियान चलाए हैं, जिनमें विदेशी नागरिकों द्वारा संचालित स्कैम सेंटर पकड़े गए और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया। कैंडी, पनादुरा और नेगोम्बो में हुई छापेमार कार्रवाइयों में लग्जरी होटलों और गेस्ट हाउसों को निशाना बनाया गया, जिन्हें कथित तौर पर इन अपराधियों के ऑपरेशन बेस के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था।
अप्रैल 2026 में अंबकंदविला के एक लग्जरी होटल पर की गई कार्रवाई में 150 लोगों को गिरफ्तार किया गया — इनमें 133 चीनी नागरिक, 13 वियतनामी, एक मलेशियाई और अन्य शामिल थे। जाँचकर्ताओं ने सैकड़ों कंप्यूटर, मोबाइल फोन और सिम-बॉक्स डिवाइस जब्त किए, जो एक साथ सैकड़ों सिम कार्ड चलाकर हज़ारों फर्जी कॉल और संदेश भेजने में सक्षम थे।
'पिग-बुचेरिंग' घोटाला: कैसे काम करता है यह जाल
'पिग-बुचेरिंग' इन ठगी नेटवर्क की कमाई का प्रमुख तरीका है। इसमें अपराधी पहले ऑनलाइन माध्यम से पीड़ित से दोस्ती या प्रेम संबंध जैसा भरोसेमंद रिश्ता बनाते हैं और फिर उन्हें नकली निवेश प्लेटफॉर्म पर पैसा लगाने के लिए मनाते हैं। ठग VPN का उपयोग करके अपनी वास्तविक लोकेशन छिपाते हैं और सोशल मीडिया अकाउंट हैक करके भी लोगों से धन उगाही करते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, हैक किए गए अकाउंट्स से पीड़ितों को फिशिंग लिंक भेजे गए और उन्हें स्थानीय निजी बैंक खातों में रकम जमा करने के लिए धोखा दिया गया। यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण-पूर्व एशिया में साइबर अपराध के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है।
भर्ती का जाल और मानव तस्करी का पहलू
इन नेटवर्क के भर्तीकर्ता सोशल मीडिया पर 'ऑनलाइन मार्केटिंग' या 'डेटा एंट्री' जैसी नौकरियों का विज्ञापन देकर लोगों को फँसाते हैं। नौकरी मिलने के बाद पीड़ितों के पासपोर्ट जब्त कर लिए जाते हैं और उन्हें जबरन धोखाधड़ी वाले अभियानों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है — जो मानव तस्करी के गंभीर संकेत हैं।
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क से संबंध
रिपोर्टों में आरोप लगाया गया है कि चीनी और नाइजीरियाई नागरिक इन नेटवर्क के प्रमुख संचालक हैं। कथित तौर पर ये केंद्र म्यांमार और कंबोडिया में मौजूद अंतरराष्ट्रीय आपराधिक गिरोहों से सीधे जुड़े हुए हैं। गौरतलब है कि विदेशी निवेश और बाहर से आने वाले धन पर श्रीलंका में अपेक्षाकृत कम जाँच-पड़ताल होती है, जिसे अपराधी अपने पक्ष में भुना रहे हैं।
आगे क्या होगा
श्रीलंका की एजेंसियाँ अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिलकर इन नेटवर्क की जड़ें खोदने में जुटी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक नियामकीय ढाँचे को मज़बूत नहीं किया जाता और विदेशी निवेश पर पारदर्शिता नहीं बढ़ती, तब तक श्रीलंका ऐसे अपराधियों के लिए आकर्षक ठिकाना बना रहेगा।