ट्रंप सरकार का पाकिस्तान को बढ़ावा देना अमेरिका को पड़ेगा महंगा, भू-राजनीतिक विशेषज्ञ की चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
इटली के भू-राजनीतिक विशेषज्ञ और राजनीतिक सलाहकार सर्जियो रेस्टेली ने चेतावनी दी है कि ट्रंप सरकार का पाकिस्तान को रणनीतिक प्रोत्साहन देना अमेरिका के लिए एक ऐतिहासिक भूल साबित हो सकती है — ठीक वैसे ही जैसे 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के विरुद्ध प्रॉक्सी युद्ध की रणनीति अंततः 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के रूप में अमेरिका को ही भारी पड़ी। यह चेतावनी 4 जुलाई को 'टाइम्स ऑफ इजरायल' में प्रकाशित उनके विश्लेषण लेख में सामने आई है।
ऐतिहासिक संदर्भ और अमेरिकी रणनीति की विफलता
रेस्टेली ने अपने लेख में लिखा, 'इतिहास अक्सर खुद को दोहराता है और दूरदृष्टि की कमी वाले नेता अपने पूर्ववर्तियों की गलतियों को दोहराते हैं। ट्रंप सरकार का पाकिस्तान को प्रोत्साहन देना ऐसी ही एक भूल है, जिसकी भारी कीमत अमेरिका को चुकानी पड़ेगी।'
उन्होंने याद दिलाया कि 1979 में अमेरिका और सऊदी अरब ने जनरल जिया-उल-हक के नेतृत्व वाले पाकिस्तान का इस्तेमाल अफगानिस्तान में सोवियत संघ के विरुद्ध एक रणनीतिक प्रॉक्सी युद्ध के लिए किया था। रेस्टेली के अनुसार, उसके बाद के दशकों में पाकिस्तान ने दोनों पक्षों के साथ अपने हित साधे और इसी रणनीतिक गलती का अंतिम परिणाम 11 सितंबर 2001 का आतंकी हमला रहा।
उन्होंने आगे कहा, 'आतंक के खिलाफ लड़ाई के दौरान पाकिस्तान पर अमेरिका की लगातार निर्भरता ने न सिर्फ काबुल को तालिबान के हाथों में सौंप दिया, बल्कि अमेरिका को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी।'
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी और रणनीतिक मजबूरी
रिपोर्ट के अनुसार, चाहे अमेरिका का पाकिस्तान के प्रति नरम रुख हो या यूरोपीय संघ द्वारा मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों के बावजूद जीएसपी-प्लस का दर्जा जारी रखना — अंतरराष्ट्रीय साझेदार क्षेत्रीय रणनीतिक महत्व के कारण इस्लामाबाद की खुलकर आलोचना करने से बचते नजर आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुझान पाकिस्तान को घरेलू शासन की नाकामियों के बावजूद बाहरी जवाबदेही से बचाता है।
रेस्टेली ने चेतावनी दी है कि यदि यह रुझान जारी रहा, तो इसके गंभीर राजनीतिक और सामाजिक परिणाम सामने आ सकते हैं — जिसका असर राजनीतिक विरोधियों, जातीय अल्पसंख्यकों और व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने की आशंका है।
अफगान सीमा पर तनाव और सैन्य ऑपरेशन
विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के बावजूद पाकिस्तान ने अफगान सीमा पर सैन्य अभियान जारी रखे हैं, जिससे तालिबान अधिकारियों के साथ तनाव बढ़ गया है। सीमा पार हमलों और हथियारों से जुड़ी मुठभेड़ों की बढ़ती संख्या ने इस चिंता को गहरा किया है कि इस्लामाबाद अपने पड़ोस में कूटनीतिक बातचीत की जगह दबाव की नीति अपना रहा है।
बलूचिस्तान और लोकतांत्रिक गिरावट की चिंता
पाकिस्तान के बिगड़ते घरेलू राजनीतिक हालात पर टिप्पणी करते हुए रेस्टेली ने कहा कि आलोचक तेजी से यह तर्क दे रहे हैं कि देश की राजनीति पर सेना का प्रभाव एक ऐसे तंत्र में बदल रहा है, जहां वास्तविक राजनीतिक अधिकार पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुनीर के नेतृत्व वाली सेना के हाथों में है।
उन्होंने कहा, 'राजनीतिक कार्रवाई बलूचिस्तान में बढ़ती अशांति के साथ हुई है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने जाने-माने बलूच कार्यकर्ता महरंग बलूच समेत अन्य कार्यकर्ताओं को सजा सुनाए जाने की कड़ी आलोचना की है।' संगठनों का कहना है कि शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति को तेजी से आपराधिक बनाया जा रहा है। पाकिस्तानी अधिकारी इन आरोपों को खारिज करते हैं और कहते हैं कि मामले कानून के अनुसार चलाए जाते हैं।
क्षेत्रीय स्थिरता पर संभावित प्रभाव
रेस्टेली ने अपने विश्लेषण में आगाह किया कि विदेश में पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति देश के भीतर लोकतांत्रिक गिरावट के लिए राजनीतिक आवरण प्रदान कर सकती है और दक्षिण एशिया में एक नई सत्तावादी व्यवस्था की ओर बढ़ने को प्रोत्साहित कर सकती है। यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक समीकरण पहले से ही तेजी से बदल रहे हैं।