चीन पर अमेरिकी फार्मा की 70% हेपारिन निर्भरता: सप्लाई चेन संकट की चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिका का फार्मास्युटिकल और बायोटेक उद्योग चीनी सप्लाई चेन पर इस कदर निर्भर हो चुका है कि किसी भी आपूर्ति बाधा की स्थिति में अमेरिकी मरीजों की जान खतरे में पड़ सकती है। अमेरिकी ऑनलाइन पत्रिका 'द नेशनल इंटरेस्ट' में प्रकाशित एक विश्लेषण रिपोर्ट में यह गंभीर चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट में ब्लड थिनर दवा हेपारिन को केंद्र में रखकर यह दर्शाया गया है कि अमेरिका की दवा सुरक्षा किस हद तक कमज़ोर हो चुकी है।
हेपारिन संकट: निर्भरता के आँकड़े
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में उपयोग होने वाली हेपारिन की लगभग 70 प्रतिशत आपूर्ति चीन से आती है। स्थिति और गंभीर इसलिए है क्योंकि अमेरिका में हेपारिन एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (API) बनाने वाले दो प्रमुख संयंत्र — विस्कॉन्सिन स्थित एसपीएल और ओहायो स्थित स्मिथफील्ड बायोसाइंस — अब चीनी कंपनियों की सहायक इकाइयाँ बन चुके हैं। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अमेरिका के पास इस दवा का कोई स्वतंत्र, व्यावसायिक स्तर का घरेलू उत्पादक नहीं बचा है।
रिपोर्ट में रोडियम ग्रुप की मई 2026 की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2021 से 2024 के बीच ऐसे उत्पादों की संख्या 192 से बढ़कर 315 हो गई है, जिनमें चीन का वर्चस्व बहुत अधिक है।
2007-08 की दूषित हेपारिन त्रासदी
रिपोर्ट में 2007-08 की उस घटना का उल्लेख किया गया है, जब चीन से आई दूषित हेपारिन के कारण कम से कम 149 अमेरिकी नागरिकों की मृत्यु हो गई थी। यह दूषित आपूर्ति 11 देशों तक पहुँची थी। जाँच में इसका स्रोत चीन के जियांग्सू प्रांत के चांगझोउ शहर को बताया गया, लेकिन चीनी अधिकारियों ने इस दावे को अस्वीकार कर दिया और अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) को आपराधिक जाँच की अनुमति नहीं दी। इस मामले में कथित तौर पर किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया गया।
गौरतलब है कि इस त्रासदी के डेढ़ दशक से अधिक समय बाद भी अमेरिका ने अपनी निर्भरता कम करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। रिपोर्ट के अनुसार, उल्टे अमेरिकी कंपनियाँ इस दवा के उत्पादन से बाहर होती जा रही हैं, जिससे चीन पर निर्भरता और गहरी होती जा रही है।
चीन की 15वीं पंचवर्षीय योजना और वैश्विक दबदबा
मार्च 2026 में जारी चीन की 15वीं पंचवर्षीय योजना में बायोमैन्युफैक्चरिंग को उन प्राथमिकता क्षेत्रों में शामिल किया गया है, जहाँ 'निर्णायक सफलता' हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन इस रणनीति के तहत वैश्विक फार्मास्युटिकल वैल्यू चेन में अपनी पकड़ और मज़बूत करना चाहता है। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि चीन पहले ही रेयर अर्थ और उर्वरक क्षेत्रों में अपनी प्रभुता का उपयोग व्यापारिक साझेदारों पर दबाव बनाने के लिए कर चुका है, जिससे कीमतों में भारी उछाल आई।
रिपोर्ट में चेताया गया है कि यदि उत्पादन गुणवत्ता में कोई बड़ी गड़बड़ी होती है या अमेरिका-चीन के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ता है, तो चीन हेपारिन की आपूर्ति रोक सकता है। इसका सबसे गंभीर असर डायलिसिस मरीजों पर पड़ेगा, जो इस दवा पर जीवन-रक्षक रूप से निर्भर हैं।
अमेरिकी सरकार की प्रतिक्रिया और सीमाएँ
रिपोर्ट में अगस्त 2025 में जारी उस अमेरिकी कार्यकारी आदेश का उल्लेख किया गया है, जिसके तहत 'स्ट्रैटेजिक एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स रिजर्व' (SAPIR) बनाने की योजना शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य लगभग दो दर्जन ज़रूरी दवाओं के लिए छह महीने का API भंडार तैयार करना है, जिसमें घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता दी जाएगी।
हालाँकि, रिपोर्ट में इस पहल की सीमाएँ भी रेखांकित की गई हैं। अमेरिकी सरकार की प्रमुख 'फ्लो-बार्डा' पहल मुख्य रूप से कंटीन्यूअस-फ्लो केमिस्ट्री तकनीक पर आधारित है, जो छोटी रासायनिक दवाओं के लिए उपयुक्त है। लेकिन पशु ऊतकों से बनने वाली जैविक दवा हेपारिन का उत्पादन इस तकनीक से संभव नहीं है — जो इस पूरी रणनीति की सबसे बड़ी खामी है।
आगे क्या होगा
रिपोर्ट के अनुसार, उत्पादन के स्रोत बढ़ने के बजाय घट रहे हैं और हर नई बंदी के साथ चीनी API उत्पादकों का वर्चस्व और मज़बूत होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अमेरिका हेपारिन जैसी जैविक दवाओं के लिए स्वतंत्र घरेलू उत्पादन क्षमता नहीं बनाता, तब तक यह भेद्यता बनी रहेगी। यह ऐसे समय में आया है जब अमेरिका-चीन व्यापार तनाव पहले से ही उच्च स्तर पर है।