30 सितंबर 2026
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गंदरबल कोर्ट का 2018 हत्याकांड में फैसला: मोहम्मद शफी मगरे हत्या का दोषी, अपहरण के आरोप से बरी

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गंदरबल कोर्ट का 2018 हत्याकांड में फैसला: मोहम्मद शफी मगरे हत्या का दोषी, अपहरण के आरोप से बरी

सारांश

सात साल बाद गंदरबल की अदालत ने 2018 के हत्याकांड में न्याय की मुहर लगाई। एटीएम कार्ड का इस्तेमाल, ₹50,000 की देनदारी और घर से बरामद नकदी — परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की यह श्रृंखला आरोपी मोहम्मद शफी मगरे के लिए निर्णायक साबित हुई। सजा की सुनवाई अभी बाकी है।

मुख्य बातें

अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश फोजिया पॉल ने 30 सितंबर को मोहम्मद शफी मगरे को 2018 के हत्याकांड में दोषी ठहराया।
आरोपी को आरपीसी धारा 302 (हत्या), धारा 379 (चोरी) और धारा 201 (साक्ष्य मिटाना) का दोषी पाया गया।
मृतक का एटीएम कार्ड और ₹11,700 नकद आरोपी के घर से बरामद हुए; लापता होने के अगले दिन कार्ड से ₹4,000 का लेनदेन हुआ था।
आरोपी और मृतक के बीच ₹50,000 की आर्थिक देनदारी को हत्या का साबित मकसद माना गया।
धारा 364 आरपीसी (अपहरण) के तहत आरोपी को बरी किया गया — अपहरण साबित करने वाला कोई स्वीकार्य साक्ष्य नहीं था।
सजा की मात्रा के लिए अलग सुनवाई होगी; आरोपी फिलहाल न्यायिक हिरासत में है।

जम्मू-कश्मीर के गंदरबल में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश फोजिया पॉल ने बुधवार, 30 सितंबर को 2018 के हत्याकांड में आरोपी मोहम्मद शफी मगरे को दोषी करार दिया। कोर्ट ने उसे रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) की धारा 302 (हत्या), धारा 379 (चोरी) और धारा 201 (साक्ष्य मिटाना) के तहत अपराधी पाया। हालाँकि, अपहरण से जुड़ी धारा 364 आरपीसी के तहत आरोपी को बरी कर दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पुलिस स्टेशन खीरभवानी में दर्ज एफआईआर संख्या 33/2018 से जुड़ा है। मृतक मोहम्मद यूसुफ खांडेय 31 मई 2018 को चुंडिना स्थित जम्मू एंड कश्मीर बैंक से पैसे निकालने गया था, जिसके बाद वह लापता हो गया। 2 जून 2018 को उसका शव शालाबुग/बटागुंड से सटे खेतों में मिला।

आरोपी मोहम्मद शफी मगरे, पुत्र मोहम्मद सिद्दीक मगरे, गंदरबल के चुंडिना का निवासी है। मामले की जाँच तत्कालीन थाना प्रभारी अरशिद सेल्फी ने की थी।

मुख्य साक्ष्य और अभियोजन का आधार

अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका था, क्योंकि हमले का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा कि मृतक के सिर के पिछले हिस्से में फ्रैक्चर और बड़ी मात्रा में एक्स्ट्राड्यूरल हेमेटोमा पाया गया — जो भारी कुंद वस्तु से लगी चोट की पुष्टि करता है।

कोर्ट ने मृतक के एटीएम कार्ड के इस्तेमाल को अभियोजन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना। बैंक रिकॉर्ड के अनुसार, मृतक के लापता होने के अगले ही दिन 1 जून 2018 को नदिहाल स्थित शाहीन सर्विस स्टेशन पर उसके एटीएम कार्ड से ₹4,000 का लेनदेन हुआ। गवाह फैयाज अहमद डार — जो आरोपी के साथ उस वक्त यात्रा कर रहा था — ने अदालत में बयान दिया कि आरोपी ने वहाँ एक कार्ड पेश कर ₹4,000 प्राप्त किए। 2 जून 2018 को नगबल में भी ₹500 के एक अन्य लेनदेन का रिकॉर्ड सामने आया।

बाद में मृतक का एटीएम कार्ड और ₹11,700 नकद आरोपी के घर में एक कमरे की चटाई के नीचे से बरामद किए गए। यह बरामदगी आरोपी की दी गई जानकारी के आधार पर हुई।

इसके अतिरिक्त, आरोपी और मृतक के बीच ₹50,000 की आर्थिक देनदारी को भी कोर्ट ने महत्वपूर्ण परिस्थितिजन्य साक्ष्य माना। एक स्वतंत्र दस्तावेज लेखक ने उस हलफनामे की पुष्टि की जिसमें आरोपी की ओर से यह देनदारी स्वीकार की गई थी, और हैंडराइटिंग विशेषज्ञ ने दस्तावेज पर मौजूद हस्ताक्षरों को आरोपी के हस्ताक्षरों से जोड़ा। फटे हुए कर्ज दस्तावेज के टुकड़ों की बरामदगी ने परिस्थितियों की श्रृंखला को और मजबूत किया।

कोर्ट की कानूनी कसौटी

कोर्ट ने हनुमंत गोविंद नरगुंडकर बनाम मध्य प्रदेश सरकार तथा शरद बिरधीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र सरकार के मामलों में निर्धारित कसौटियों को लागू करते हुए माना कि अभियोजन ने सभी परिस्थितियों को संदेह से परे साबित किया है।

गौरतलब है कि कोर्ट ने विवादित सीसीटीवी फुटेज, फिंगरप्रिंट सामग्री और पारंपरिक 'लास्ट सीन' सिद्धांत को मुख्य साक्ष्य श्रृंखला में शामिल नहीं किया। जाँच में सामने आई कुछ कमियों के कारण कथित हथियार की बरामदगी को भी सीमित महत्व दिया गया। इसके बावजूद कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि शेष स्वीकार्य साक्ष्यों की श्रृंखला पूर्ण थी और आरोपी की संलिप्तता के अलावा कोई उचित संभावना नहीं बचती थी।

धारा 364 से बरी होने का कारण

अपहरण के आरोप के संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि किसी गवाह ने आरोपी द्वारा मृतक को बलपूर्वक या धोखे से ले जाने की बात न सुनी और न देखी। मृतक को बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप पुलिस के उस इकबालिया बयान पर आधारित था, जिसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिए धारा 364 आरपीसी के तहत आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुआ और आरोपी को इससे बरी कर दिया गया।

आगे की कार्यवाही

मोहम्मद शफी मगरे को फिलहाल न्यायिक हिरासत में रखने का निर्देश दिया गया है। सजा की मात्रा तय करने के लिए अलग से सुनवाई होगी, जिसमें अभियोजन और दोषी पक्ष दोनों को सजा के निर्धारण से जुड़े गंभीर और कम करने वाले परिस्थितिजन्य पहलुओं पर अपनी बात रखने का अवसर दिया जाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

जाँच में सीसीटीवी और फिंगरप्रिंट साक्ष्यों की कमज़ोरियाँ चिंताजनक हैं — यह सवाल उठाती हैं कि क्या जम्मू-कश्मीर पुलिस की फोरेंसिक क्षमता उस स्तर पर है जहाँ होनी चाहिए। धारा 364 से बरी होना यह भी रेखांकित करता है कि अदालतें स्वीकार्य साक्ष्य और पुलिस के इकबालिया बयान के बीच स्पष्ट रेखा खींचती हैं — जो आरोपी के अधिकारों की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण संकेत है।
RashtraPress
30 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गंदरबल 2018 हत्याकांड में कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश फोजिया पॉल ने 30 सितंबर को आरोपी मोहम्मद शफी मगरे को आरपीसी धारा 302, 379 और 201 के तहत दोषी ठहराया। हालाँकि, अपहरण से जुड़ी धारा 364 के तहत उसे बरी कर दिया गया।
मोहम्मद यूसुफ खांडेय की हत्या कब और कैसे हुई?
मोहम्मद यूसुफ खांडेय 31 मई 2018 को चुंडिना स्थित जम्मू एंड कश्मीर बैंक से पैसे निकालने के बाद लापता हो गया था। 2 जून 2018 को उसका शव शालाबुग/बटागुंड के खेतों से मिला। मेडिकल साक्ष्यों के अनुसार सिर पर भारी कुंद वस्तु से लगी चोट उसकी मौत का कारण बनी।
आरोपी को दोषी साबित करने में कौन-से साक्ष्य निर्णायक रहे?
मृतक के एटीएम कार्ड का आरोपी द्वारा इस्तेमाल, कार्ड व ₹11,700 नकद का आरोपी के घर से बरामद होना, गवाह फैयाज अहमद डार की गवाही और आरोपी-मृतक के बीच ₹50,000 की देनदारी मुख्य साक्ष्य रहे। फटे हुए कर्ज दस्तावेज की बरामदगी ने भी परिस्थितियों की श्रृंखला को पूरा किया।
धारा 364 (अपहरण) के तहत आरोपी को क्यों बरी किया गया?
कोर्ट ने पाया कि किसी गवाह ने आरोपी द्वारा मृतक को बलपूर्वक या धोखे से ले जाने की बात न सुनी और न देखी। अपहरण का आरोप पुलिस के उस इकबालिया बयान पर आधारित था जिसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, इसलिए यह आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुआ।
अब आगे क्या होगा — आरोपी को सजा कब मिलेगी?
मोहम्मद शफी मगरे फिलहाल न्यायिक हिरासत में है। सजा की मात्रा तय करने के लिए अलग से सुनवाई होगी, जिसमें अभियोजन और दोषी दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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