आधार जारी करने में सख्ती की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने PIL सुनने से किया इनकार, सरकार के पास जाने की सलाह

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आधार जारी करने में सख्ती की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने PIL सुनने से किया इनकार, सरकार के पास जाने की सलाह

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने आधार जारी करने की प्रक्रिया सख्त करने की PIL सुनने से इनकार कर दिया और मामला सरकार पर छोड़ दिया। 144 करोड़ धारकों वाली इस प्रणाली में मुंबई में 87,000 फर्जी दस्तावेज़ मिलने जैसी घटनाओं के बीच सुधार की माँग तेज़ हो रही है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 4 मई 2026 को आधार जारी करने में सख्ती की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार किया।
वकील अश्विनी उपाध्याय ने माँग की थी कि 6 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को आधार के लिए SDM या तहसीलदार की अनुमति अनिवार्य हो।
देश में लगभग 144 करोड़ आधार धारक हैं और 99% नागरिकों के पास आधार मौजूद है।
करीब 55 करोड़ जनधन खाते आधार से जुड़े हैं; मुंबई में हाल ही में 87,000 फर्जी दस्तावेज़ मिले।
अदालत ने कहा कि नीतिगत मामलों पर पहले केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने 4 मई 2026 को नई दिल्ली में आधार कार्ड जारी करने की प्रक्रिया को सख्त बनाने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के नीतिगत मामलों पर पहले केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए और याचिकाकर्ता को संबंधित सरकारी विभाग के समक्ष अपनी बात रखने की सलाह दी।

याचिका में क्या थी मांग

वकील अश्विनी उपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय में यह याचिका दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों को तो आधार कार्ड दिया जाए, लेकिन उससे अधिक आयु के व्यक्तियों को आधार प्राप्त करने के लिए एक निर्धारित और कठोर प्रक्रिया से गुज़रना अनिवार्य हो। याचिका में यह भी कहा गया था कि 6 वर्ष से अधिक आयु के आवेदकों को केवल सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट या तहसीलदार कार्यालय की अनुमति के बाद ही आधार जारी किया जाए, ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।

याचिकाकर्ता के तर्क

उपाध्याय ने अदालत में दलील दी कि देश में वर्तमान में लगभग 144 करोड़ आधार कार्ड धारक हैं और लगभग 99 प्रतिशत नागरिकों के पास आधार मौजूद है। उन्होंने बताया कि करीब 55 करोड़ जनधन खाते आधार से जुड़े हुए हैं, जिससे इस दस्तावेज़ की महत्ता और संवेदनशीलता और भी बढ़ जाती है।

उनका कहना था कि कई स्थानों पर महज किराये के पते या साधारण दस्तावेज़ों के आधार पर आधार कार्ड बन जाता है, जिससे आगे चलकर अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी आसानी से तैयार हो जाते हैं और पूरी व्यवस्था में गड़बड़ियाँ उत्पन्न होती हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि हाल ही में मुंबई में करीब 87,000 फर्जी दस्तावेज़ मिलने की बात सामने आई थी।

फर्जीवाड़े और घुसपैठ की चिंता

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यदि आधार जारी करने की प्रक्रिया को और सख्त नहीं किया गया, तो फर्जीवाड़े और घुसपैठ की बढ़ती समस्या को रोकना मुश्किल हो जाएगा। यह ऐसे समय में आया है जब देश में दस्तावेज़ों की जालसाज़ी और पहचान की चोरी से जुड़े मामले लगातार सुर्खियों में हैं। गौरतलब है कि आधार देश की सबसे बड़ी बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली है और इसका दुरुपयोग व्यापक सामाजिक और सुरक्षा संबंधी जोखिम उत्पन्न कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप से परहेज़ करते हुए कहा कि नीतिगत प्रश्नों पर न्यायपालिका की बजाय कार्यपालिका को पहले विचार करना चाहिए। अदालत ने अश्विनी उपाध्याय को सुझाव दिया कि वे अपनी माँगें केंद्र सरकार के संबंधित विभाग के समक्ष रखें, जो इस पर उचित निर्णय ले सके। यह न्यायिक संयम का स्पष्ट संकेत है कि अदालत आधार जैसे व्यापक नीतिगत ढाँचे में बदलाव के लिए विधायी या कार्यपालिका मार्ग को प्राथमिकता देती है।

आगे क्या होगा

अब यह देखना होगा कि याचिकाकर्ता केंद्र सरकार के किस विभाग — संभवतः भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) या इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय — के समक्ष अपनी बात रखते हैं और सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है। आधार प्रणाली में किसी भी बड़े बदलाव के लिए संसदीय स्तर पर विचार-विमर्श आवश्यक होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह उस बड़े सवाल को अनुत्तरित छोड़ देता है जो याचिका उठाती है — क्या 144 करोड़ आधार धारकों वाली प्रणाली में पर्याप्त सत्यापन तंत्र है? मुंबई में 87,000 फर्जी दस्तावेज़ों का मामला महज एक अपवाद नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति का संकेत है। UIDAI ने वर्षों से आधार की सुरक्षा को अभेद्य बताया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इस दावे पर सवाल उठाती है। जब तक सरकार इस पर सक्रिय नीतिगत पहल नहीं करती, PIL की विफलता एक प्रशासनिक खामी को और लंबे समय तक जीवित रखेगी।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने आधार PIL पर सुनवाई क्यों नहीं की?
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आधार जारी करने की प्रक्रिया में बदलाव एक नीतिगत मामला है, जिस पर पहले केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए। अदालत ने याचिकाकर्ता को संबंधित सरकारी विभाग के समक्ष अपनी माँग रखने की सलाह दी।
अश्विनी उपाध्याय की PIL में आधार के लिए क्या बदलाव माँगे गए थे?
याचिका में माँग थी कि 6 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को आधार कार्ड के लिए सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट या तहसीलदार कार्यालय की अनुमति अनिवार्य की जाए। इसका उद्देश्य फर्जीवाड़े और घुसपैठ को रोकने के लिए प्रक्रिया में पारदर्शिता और सख्ती लाना था।
भारत में कितने लोगों के पास आधार कार्ड है?
याचिकाकर्ता के अनुसार, देश में लगभग 144 करोड़ आधार कार्ड धारक हैं और करीब 99 प्रतिशत नागरिकों के पास आधार मौजूद है। इसके अलावा लगभग 55 करोड़ जनधन खाते आधार से जुड़े हुए हैं।
मुंबई में फर्जी दस्तावेज़ों का आधार से क्या संबंध है?
याचिकाकर्ता ने अदालत में उल्लेख किया कि हाल ही में मुंबई में करीब 87,000 फर्जी दस्तावेज़ मिले थे। उनका तर्क था कि ढीली आधार जारी करने की प्रक्रिया के कारण अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी आसानी से बन जाते हैं, जिससे पूरी व्यवस्था में गड़बड़ियाँ होती हैं।
अब इस मामले में आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद याचिकाकर्ता को UIDAI या इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय जैसे संबंधित विभागों के समक्ष अपनी माँगें रखनी होंगी। किसी भी बड़े बदलाव के लिए संसदीय स्तर पर विचार-विमर्श आवश्यक होगा।
राष्ट्र प्रेस
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