आधार जारी करने में सख्ती की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने PIL सुनने से किया इनकार, सरकार के पास जाने की सलाह
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 4 मई 2026 को नई दिल्ली में आधार कार्ड जारी करने की प्रक्रिया को सख्त बनाने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के नीतिगत मामलों पर पहले केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए और याचिकाकर्ता को संबंधित सरकारी विभाग के समक्ष अपनी बात रखने की सलाह दी।
याचिका में क्या थी मांग
वकील अश्विनी उपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय में यह याचिका दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों को तो आधार कार्ड दिया जाए, लेकिन उससे अधिक आयु के व्यक्तियों को आधार प्राप्त करने के लिए एक निर्धारित और कठोर प्रक्रिया से गुज़रना अनिवार्य हो। याचिका में यह भी कहा गया था कि 6 वर्ष से अधिक आयु के आवेदकों को केवल सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट या तहसीलदार कार्यालय की अनुमति के बाद ही आधार जारी किया जाए, ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
याचिकाकर्ता के तर्क
उपाध्याय ने अदालत में दलील दी कि देश में वर्तमान में लगभग 144 करोड़ आधार कार्ड धारक हैं और लगभग 99 प्रतिशत नागरिकों के पास आधार मौजूद है। उन्होंने बताया कि करीब 55 करोड़ जनधन खाते आधार से जुड़े हुए हैं, जिससे इस दस्तावेज़ की महत्ता और संवेदनशीलता और भी बढ़ जाती है।
उनका कहना था कि कई स्थानों पर महज किराये के पते या साधारण दस्तावेज़ों के आधार पर आधार कार्ड बन जाता है, जिससे आगे चलकर अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी आसानी से तैयार हो जाते हैं और पूरी व्यवस्था में गड़बड़ियाँ उत्पन्न होती हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि हाल ही में मुंबई में करीब 87,000 फर्जी दस्तावेज़ मिलने की बात सामने आई थी।
फर्जीवाड़े और घुसपैठ की चिंता
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यदि आधार जारी करने की प्रक्रिया को और सख्त नहीं किया गया, तो फर्जीवाड़े और घुसपैठ की बढ़ती समस्या को रोकना मुश्किल हो जाएगा। यह ऐसे समय में आया है जब देश में दस्तावेज़ों की जालसाज़ी और पहचान की चोरी से जुड़े मामले लगातार सुर्खियों में हैं। गौरतलब है कि आधार देश की सबसे बड़ी बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली है और इसका दुरुपयोग व्यापक सामाजिक और सुरक्षा संबंधी जोखिम उत्पन्न कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप से परहेज़ करते हुए कहा कि नीतिगत प्रश्नों पर न्यायपालिका की बजाय कार्यपालिका को पहले विचार करना चाहिए। अदालत ने अश्विनी उपाध्याय को सुझाव दिया कि वे अपनी माँगें केंद्र सरकार के संबंधित विभाग के समक्ष रखें, जो इस पर उचित निर्णय ले सके। यह न्यायिक संयम का स्पष्ट संकेत है कि अदालत आधार जैसे व्यापक नीतिगत ढाँचे में बदलाव के लिए विधायी या कार्यपालिका मार्ग को प्राथमिकता देती है।
आगे क्या होगा
अब यह देखना होगा कि याचिकाकर्ता केंद्र सरकार के किस विभाग — संभवतः भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) या इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय — के समक्ष अपनी बात रखते हैं और सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है। आधार प्रणाली में किसी भी बड़े बदलाव के लिए संसदीय स्तर पर विचार-विमर्श आवश्यक होगा।