अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर से टीएमसी के 20 बागी सांसदों की अयोग्यता याचिकाएँ शीघ्र निपटाने की माँग की
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने सोमवार, 27 जुलाई 2026 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर पार्टी के उन 20 सांसदों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं के शीघ्र निपटारे का अनुरोध किया, जिन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित होते ही नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल होकर दलबदल किया। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक ने तर्क दिया कि 5 सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद याचिकाओं पर न कोई सुनवाई हुई और न कोई नोटिस जारी किया गया।
याचिकाओं का कानूनी आधार
अभिषेक बनर्जी ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि ये 20 सांसद 2024 के लोकसभा चुनाव में TMC उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए थे। उनकी अयोग्यता संविधान की 10वीं अनुसूची के प्रावधानों और लोकसभा सदस्य (दल-बदल के आधार पर अयोग्यता) नियम, 1985 के नियम 6 के तहत माँगी गई है। पत्र के अनुसार याचिकाओं के साथ एक विस्तृत विवरण संलग्न था, जिसमें अयोग्यता के तथ्यात्मक एवं कानूनी आधार रेखांकित किए गए थे।
एनसीपीआई की स्थिति पर सवाल
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि जिस एनसीपीआई में ये सांसद शामिल हुए हैं, वह एक गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसका संसद या किसी राज्य विधानसभा में कोई प्रतिनिधित्व अथवा मान्यता प्राप्त दर्जा नहीं है। अभिषेक ने तर्क दिया कि इन सदस्यों का आचरण स्पष्ट रूप से 10वीं अनुसूची के दायरे में आता है और उनकी तत्काल अयोग्यता अनिवार्य है।
निष्क्रियता पर गंभीर चिंता
TMC महासचिव ने पत्र में लिखा, "इस तरह की निरंतर निष्क्रियता गंभीर चिंता का विषय है।" उन्होंने कहा कि 10वीं अनुसूची के अनुच्छेद 6 के तहत स्पीकर को प्राप्त संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का प्रयोग उचित समय के भीतर किया जाना आवश्यक है, अन्यथा दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता कमजोर पड़ती है। उनके अनुसार अयोग्यता कार्यवाही का अनावश्यक रूप से लंबित रहना उस अनिश्चितता को जारी रखता है जिसे संविधान टालना चाहता है।
सर्वदलीय बैठक से बढ़ी तात्कालिकता
अभिषेक बनर्जी ने एक अतिरिक्त तर्क देते हुए बताया कि केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री ने इन 20 सांसदों को 19 जुलाई को आयोजित सर्वदलीय बैठक में एक अलग समूह के रूप में आमंत्रित किया, जिससे मामले की तात्कालिकता और भी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि संबंधित सदस्यों की संसदीय स्थिति को लेकर बनी निरंतर अनिश्चितता 10वीं अनुसूची की प्रभावशीलता और संसदीय कार्यवाही की अखंडता दोनों को कमजोर करती है। आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष की प्रतिक्रिया और इन याचिकाओं पर सुनवाई की तारीख तय होना इस प्रकरण की अगली महत्वपूर्ण कड़ी होगी।