विश्व हेपेटाइटिस दिवस 2026: एम्स विशेषज्ञों की चेतावनी — फैटी लिवर और हेपेटाइटिस बी-सी को नज़रअंदाज़ करना पड़ सकता है भारी
सारांश
मुख्य बातें
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने 28 जुलाई को विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर वायरल हेपेटाइटिस, फैटी लिवर और अल्कोहलिक लिवर रोग को लेकर देशवासियों को गंभीर रूप से सतर्क किया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में दुनियाभर में वायरल हेपेटाइटिस के कारण लगभग 13 लाख लोगों की मृत्यु हुई — एक संख्या जो इस बीमारी की वैश्विक गंभीरता को रेखांकित करती है। विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर जाँच, सटीक निदान और नियमित उपचार से इन मौतों की एक बड़ी संख्या को टाला जा सकता है।
हेपेटाइटिस के प्रकार और उनके खतरे
एम्स के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. प्रमोद गर्ग ने बताया कि हेपेटाइटिस का अर्थ है लिवर में सूजन या इंफ्लेमेशन, और इसके तीन प्रमुख कारण हैं — वायरल संक्रमण, अत्यधिक शराब का सेवन, तथा फैटी लिवर डिजीज। उन्होंने स्पष्ट किया कि हेपेटाइटिस ए और ई वायरस आमतौर पर तीव्र (एक्यूट) संक्रमण करते हैं, जिसमें कुछ ही सप्ताह में भूख न लगना, उल्टी, पीलिया और कमज़ोरी जैसे लक्षण उभरते हैं।
वहीं, हेपेटाइटिस बी और सी वायरस शरीर में लंबे समय तक बने रहते हैं और क्रोनिक हेपेटाइटिस का रूप ले लेते हैं। डॉ. गर्ग के अनुसार, यदि इनका समय पर इलाज न हो, तो ये सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी जानलेवा स्थितियों में बदल सकते हैं।
फैटी लिवर: एक उभरती महामारी
डॉ. गर्ग ने चेताया कि फैटी लिवर डिजीज आज भारत में एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। मोटापा, डायबिटीज, शारीरिक निष्क्रियता, लंबे समय तक बैठे रहने की आदत और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड व अधिक कैलोरी वाले भोजन का बढ़ता चलन इसके प्रमुख कारण हैं। यह ऐसे समय में आया है जब भारत में शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण इन जोखिम कारकों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है।
उन्होंने विशेष रूप से आगाह किया कि फैटी लिवर को मामूली समस्या मानना घातक भूल हो सकती है। लंबे समय तक उपेक्षित रहने पर यह स्टेआटोहेपेटाइटिस, सिरोसिस और अंततः लिवर कैंसर में परिवर्तित हो सकती है। गौरतलब है कि पहले लिवर कैंसर मुख्यतः हेपेटाइटिस बी और सी के मरीजों में देखा जाता था, लेकिन अब फैटी लिवर के मरीजों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं।
डॉ. गर्ग के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का वज़न लगातार बढ़ रहा हो, पेट बाहर निकल रहा हो, या हल्की अपच, खाने के बाद भारीपन और पेट में जलन जैसी शिकायतें हों, तो इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। इस बीमारी की पुष्टि अल्ट्रासाउंड और रक्त जाँच से की जाती है।
टीकाकरण: हेपेटाइटिस बी से बचाव का सबसे कारगर उपाय
एम्स गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग के प्रो. डॉ. शालिमार ने हेपेटाइटिस बी से बचाव के लिए टीकाकरण को सर्वाधिक प्रभावी उपाय बताया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत नवजात शिशु को जन्म के 12 से 24 घंटे के भीतर पहली खुराक दी जाती है, इसके बाद एक महीने और छह महीने पर दो अतिरिक्त खुराकें लगाई जाती हैं। तीनों खुराकें पूरी होने पर 95 प्रतिशत से अधिक सुरक्षा मिलती है और संक्रमण का खतरा न्यूनतम रह जाता है।
हेपेटाइटिस बी के इलाज में नई उम्मीद
डॉ. शालिमार ने हाल ही में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय क्लिनिकल ट्रायल का उल्लेख करते हुए बताया कि एक नए अणु (मॉलिक्यूल) ने हेपेटाइटिस बी के उपचार में उत्साहजनक परिणाम दिए हैं। उन्होंने बताया कि अब तक उपलब्ध दवाइयाँ वायरस को केवल नियंत्रित करती थीं, लेकिन शरीर से पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाती थीं। इस नई दवा के 72 सप्ताह तक उपयोग के बाद लगभग 20 प्रतिशत मरीजों में वायरस के पूर्णतः समाप्त होने की संभावना देखी गई। डॉ. शालिमार ने उम्मीद जताई कि यह दवा शीघ्र ही भारत में भी उपलब्ध होगी।
2030 तक उन्मूलन का लक्ष्य: कितना संभव?
WHO ने वर्ष 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस के उन्मूलन का लक्ष्य रखा है। डॉ. गर्ग के अनुसार, यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, बशर्ते हेपेटाइटिस बी और सी की समय पर जाँच और उपचार सुनिश्चित हो। उन्होंने स्वीकार किया कि भारत में संक्रमण के मामलों में कमी आई है, लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, टीकाकरण और नियमित स्क्रीनिंग इस लक्ष्य को हासिल करने की कुंजी हैं।