अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला लखनऊ में बोले: 'अल्फा-जेनजी दोनों स्मार्ट, सही दिशा की है जरूरत'
सारांश
मुख्य बातें
अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने 15 सितंबर 2026 को लखनऊ के गोमती बुक फेस्टिवल में अपनी पुस्तक का लोकार्पण किया और स्कूली विद्यार्थियों के साथ सीधा संवाद किया। इस अवसर पर उन्होंने अपने अंतरिक्ष मिशन, नई पीढ़ी की संभावनाओं और सफलता में परिवार की भूमिका पर खुलकर बात की। उन्होंने बच्चों को संदेश दिया कि बड़े सपने देखना और सही दिशा में निरंतर प्रयास करना — दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।
लखनऊ में पुस्तक लोकार्पण का विशेष महत्व
शुक्ला ने बताया कि उनकी पुस्तक का पहला लोकार्पण 25 जून को नई दिल्ली में हो चुका था, परंतु लखनऊ में लॉन्च उनके लिए व्यक्तिगत रूप से विशेष था, क्योंकि उनकी अपनी यात्रा की शुरुआत इसी शहर से हुई। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक को लिखने का मकसद बच्चों में यह विश्वास जगाना है कि सफलता की राह कहीं से भी, किसी भी क्लासरूम से शुरू हो सकती है।
'यदि एक साधारण क्लासरूम से निकला विद्यार्थी अंतरिक्ष तक पहुँच सकता है, तो आज स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भी कोई भी बड़ा लक्ष्य असंभव नहीं है,' — शुक्ला ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा। उन्होंने उम्मीद जताई कि अधिक से अधिक बच्चे उनकी पुस्तक से प्रेरणा लेकर देश के विकास में योगदान देंगे।
बच्चों की जिज्ञासा और व्यावहारिक सवाल
फेस्टिवल में शुक्ला के विद्यालय सहित कई अन्य विद्यालयों के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। बच्चों ने अंतरिक्ष विज्ञान, करियर-निर्माण और भविष्य की दिशा को लेकर सवाल पूछे। शुक्ला ने बताया कि विद्यार्थियों के प्रश्न काफी व्यावहारिक थे — वे जानना चाहते थे कि ISRO और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भागीदारी के लिए किस राह पर चलना होगा।
शुक्ला के अनुसार बच्चों की यह जिज्ञासा इस बात का प्रमाण है कि नई पीढ़ी आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति रखती है। अब जिम्मेदारी बड़ों पर है कि एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार हो जहाँ स्कूल के बाद विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में करियर बनाने के अवसर सुलभ हों।
अल्फा और जेनजी — दोनों पीढ़ियों पर नजरिया
नई पीढ़ी की क्षमताओं पर शुक्ला ने स्पष्ट कहा कि उनके अनुसार कोई भी एक पीढ़ी दूसरी से कमतर नहीं है। उन्होंने कहा, 'अल्फा और जेनजी — दोनों स्मार्ट हैं और संभावनाओं से भरी पीढ़ियाँ हैं। जरूरत सिर्फ उन्हें सही दिशा देने और उनकी ऊर्जा को सकारात्मक लक्ष्यों की ओर मोड़ने की है।'
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि आज के दौर में बच्चों के पास जानकारी, तकनीक और संसाधन तो हैं, लेकिन ध्यान भटकाने वाले कारण भी उतने ही अधिक हैं। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि किस चीज़ पर ध्यान केंद्रित किया जाए — और यहीं बच्चों का मार्गदर्शन करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
सफलता में परिवार और टीम की भूमिका
अपने मिशन की सफलता के पीछे के योगदान की चर्चा करते हुए शुक्ला ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की उपलब्धि केवल उसकी व्यक्तिगत मेहनत का नतीजा नहीं होती। उनके अंतरिक्ष मिशन में इसरो की टीम, Axiom Space की टीम, मित्रों और परिवार — हजारों लोगों का परिश्रम शामिल था। उन्होंने कहा कि इन सबके समर्थन के बिना यह उपलब्धि संभव नहीं होती।
बच्चों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में मुश्किल दौर आने पर किसी एक क्षण की परेशानी को अपनी पूरी यात्रा का निष्कर्ष नहीं मानना चाहिए। लंबे नजरिए से देखा जाए तो परिवार का साथ सबसे बड़ी ताकत है, क्योंकि संकट में वही सबसे मजबूती से साथ खड़ा रहता है।
आगे की राह
शुक्ला का यह संवाद ऐसे समय में आया है जब भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊँचाइयों तक ले जाने की दिशा में काम कर रहा है और युवाओं में STEM करियर के प्रति रुचि बढ़ाना राष्ट्रीय प्राथमिकता बन रही है। गौरतलब है कि इस तरह के सीधे संवाद न केवल प्रेरणा देते हैं, बल्कि विज्ञान और तकनीक को लेकर बच्चों की धारणा को भी आकार देते हैं। आने वाले समय में उनकी पुस्तक के और लोकार्पण और स्कूल-कॉलेजों में संवाद कार्यक्रमों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।