रांची छात्र प्रदर्शन पर आनंद दुबे का निशाना: 'देश को तिलचट्टे नहीं, तितलियाँ चाहिए'
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (यूबीटी) नेता आनंद दुबे ने 11 अगस्त को मुंबई में पत्रकारों से बातचीत में झारखंड के रांची में पेपर लीक के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो की सराहना की। साथ ही उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि देश को 'तिलचट्टे नहीं, तितलियाँ चाहिए।'
रांची प्रदर्शन की सराहना
दुबे ने कहा कि रांची में छात्रों का आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा — न किसी मीडियाकर्मी पर हमला हुआ, न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध कोई आपत्तिजनक टिप्पणी की गई और न ही किसी प्रकार की हिंसा हुई। उन्होंने कहा, 'चाहे रांची में विरोध प्रदर्शन हो या जंतर-मंतर पर, छात्रों की ओर से जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं, वे जायज हैं। सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए और प्रदर्शनकारियों से बातचीत करनी चाहिए।'
सीजेपी और अभिजीत दिपके पर निशाना
दुबे ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की आड़ में पुलिस और मीडियाकर्मियों पर हुए हमले देश नहीं भूला है। उन्होंने कहा, 'मैं समझता हूँ कि तिलचट्टे और तितली में अंतर होता है — देश को तिलचट्टे नहीं, तितली चाहिए।' दुबे ने यह भी कहा कि दिपके एक आम कार्यकर्ता हैं और उनके समर्थन या विरोध से किसी काम के होने या न होने का फैसला नहीं होता।
'वंदे मातरम' और नए कानून पर बयान
'वंदे मातरम' के मुद्दे पर दुबे ने कहा कि इससे संबंधित विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका है और अब एक नया कानून अस्तित्व में आ गया है, जिसके तहत बिना किसी रोक-टोक के 'वंदे मातरम' गाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री की अगुवाई में 'वंदे मातरम' गाया जाएगा, तो यह गर्व और खुशी की बात होगी।
संसद सत्र पर अपील
मानसून सत्र का उल्लेख करते हुए दुबे ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और नेता विपक्ष राहुल गांधी दोनों से अपील की कि वे सत्र के बचे हुए दिनों में सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाएँ। उन्होंने बताया कि संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई को शुरू हुआ था और अब केवल दो-तीन दिन शेष हैं। बार-बार कार्यवाही बाधित होने से कई पहली बार निर्वाचित सांसद — चाहे वे राज्यसभा में हों या लोकसभा में — अपने क्षेत्र के मुद्दे नहीं उठा सके। दुबे ने कहा कि बचे हुए दिनों में सदन चलाने से करोड़ों लोगों को फायदा होगा।