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अरुणिमा सिन्हा: कृत्रिम पैरों से माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय दिव्यांग पर्वतारोही

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अरुणिमा सिन्हा: कृत्रिम पैरों से माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय दिव्यांग पर्वतारोही

सारांश

2011 में चलती ट्रेन से फेंकी गईं, पैर गँवाया — फिर भी 2013 में माउंट एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहराया। अरुणिमा सिन्हा की कहानी सिर्फ पर्वतारोहण की नहीं, बल्कि उस अदम्य इरादे की है जो हर त्रासदी को एक नई शुरुआत में बदल देता है।

मुख्य बातें

अरुणिमा सिन्हा 2013 में माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय दिव्यांग महिला बनीं।
अप्रैल 2011 में लखनऊ-दिल्ली ट्रेन में लुटेरों ने उन्हें चलती ट्रेन से फेंक दिया; पटरी पर पड़े रहने के दौरान 48 ट्रेनें उनके पास से गुजरीं।
हादसे में एक पैर कट गया और दूसरे की हड्डियाँ टूट गईं; डॉक्टरों ने कृत्रिम पैर लगाया।
उत्तरकाशी में टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन के शिविर में बछेंद्री पाल ने उन्हें प्रशिक्षित किया।
52 दिनों की चढ़ाई के बाद एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचकर उन्होंने इतिहास रचा।
वह 20 जुलाई 1989 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर में जन्मीं और राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी रही हैं।

अरुणिमा सिन्हा ने 2013 में माउंट एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया — वह कृत्रिम पैर के साथ दुनिया की सबसे ऊँची चोटी फतह करने वाली पहली भारतीय दिव्यांग महिला बनीं। 52 दिनों की अथक चढ़ाई और 11 अप्रैल 2011 की उस दर्दनाक रात से उबरकर उन्होंने साबित किया कि इरादे अगर पक्के हों तो हालात कितने भी विकट क्यों न हों, रास्ता ज़रूर निकलता है।

कौन हैं अरुणिमा सिन्हा

20 जुलाई 1989 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले के पंडाटोला में जन्मी अरुणिमा बचपन से ही खेलकूद में रुचि रखती थीं। उन्होंने वॉलीबॉल में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उनके इरादे और जुनून ने उन्हें एक साधारण खिलाड़ी से कहीं आगे ले जाने की नींव रखी।

वह रात जिसने ज़िंदगी बदल दी

अप्रैल 2011 में अरुणिमा लखनऊ से दिल्ली की ओर ट्रेन से जा रही थीं — दिल्ली में एक नौकरी के साक्षात्कार के लिए। ट्रेन में कुछ बदमाशों ने लूटपाट शुरू की। एक खिलाड़ी के स्वाभिमान ने उन्हें अपनी सोने की चेन बचाने के लिए प्रेरित किया, हाथापाई हुई और लुटेरों ने उन्हें चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया।

अरुणिमा ने उस घटना के बारे में एक साक्षात्कार में बताया था, 'मैं ट्रैक पर पड़ी रही और ट्रेनें गुजरती रहीं। एक पैर कट चुका था और दूसरे पैर की हड्डियाँ टूटकर बाहर आ चुकी थीं।' पूरी रात रेलवे पटरी पर पड़े रहने के दौरान उनके पास से 48 ट्रेनें गुजरीं। अगली सुबह गाँव के लोगों ने उन्हें देखा और बरेली के जिला अस्पताल पहुँचाया।

अस्पताल में इलाज की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने बताया, 'मैंने डॉक्टरों से खुद कहा कि पैर काट दो, क्योंकि दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा था।' डॉक्टरों को मजबूरन उनका एक पैर काटना पड़ा और उसकी जगह कृत्रिम पैर लगाया गया।

त्रासदी से एवरेस्ट तक का सफर

इस हादसे ने अरुणिमा को तोड़ा नहीं, बल्कि उन्होंने इसे अपनी नई शुरुआत का आधार बना लिया। उन्होंने उत्तरकाशी स्थित टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन के प्रशिक्षण शिविर में दाखिला लिया। यहाँ उन्हें माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल ने प्रशिक्षित किया। यह ऐसे समय में आया जब अधिकांश लोग उनकी शारीरिक स्थिति को देखते हुए इस सपने को असंभव मानते थे।

गौरतलब है कि कृत्रिम पैर के साथ पहाड़ की चढ़ाई करना किसी भी प्रशिक्षित पर्वतारोही के लिए असाधारण चुनौती है। अरुणिमा ने न केवल यह चुनौती स्वीकार की, बल्कि 52 दिनों की कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के साथ 2013 में माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचकर इतिहास रच दिया।

उनका जीवन-दर्शन

अरुणिमा सिन्हा का मानना है, 'जो आप नहीं कर सकते, उसे उस काम के आड़े न आने दें जो आप कर सकते हैं।' यह सोच उनके पूरे जीवन की धुरी है। एवरेस्ट फतह के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और वह दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरणापुंज बन गई हैं।

विरासत और प्रेरणा

अरुणिमा सिन्हा की यह यात्रा केवल पर्वतारोहण की उपलब्धि नहीं है — यह उन लाखों लोगों के लिए एक जीवंत उदाहरण है जो विपरीत परिस्थितियों में हार मान लेते हैं। उनकी कहानी भारत के दिव्यांग समुदाय में नई ऊर्जा भरती है और यह बताती है कि इरादा अगर पक्का हो तो शरीर की सीमाएँ मन की उड़ान को नहीं रोक सकतीं। आने वाली पीढ़ियों के लिए अरुणिमा का नाम साहस और संघर्ष का पर्याय बना रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका असली महत्व उससे कहीं गहरा है — यह भारत की दिव्यांग नीति और खेल अवसंरचना की खामियों को भी उजागर करती है। जिस अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया गया वहाँ पर्याप्त इलाज की व्यवस्था नहीं थी, और एक राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी को रात भर रेलवे पटरी पर अकेले पड़े रहना पड़ा — ये सवाल आज भी प्रासंगिक हैं। उनकी सफलता व्यक्तिगत इच्छाशक्ति की जीत है, लेकिन यह सवाल भी उठाती है कि ऐसी इच्छाशक्ति को संस्थागत समर्थन क्यों नहीं मिला।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अरुणिमा सिन्हा कौन हैं और उन्होंने क्या उपलब्धि हासिल की?
अरुणिमा सिन्हा भारत की पहली दिव्यांग महिला पर्वतारोही हैं, जिन्होंने 2013 में कृत्रिम पैर के साथ माउंट एवरेस्ट फतह किया। वह उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर की रहने वाली हैं और राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी रही हैं।
अरुणिमा सिन्हा का पैर कैसे कटा?
अप्रैल 2011 में लखनऊ से दिल्ली जाते समय ट्रेन में लुटेरों ने उन्हें चलती ट्रेन से फेंक दिया। रेलवे पटरी पर पड़े रहने के दौरान एक पैर कट गया और दूसरे की हड्डियाँ टूट गईं, जिसके बाद डॉक्टरों को एक पैर काटकर कृत्रिम पैर लगाना पड़ा।
अरुणिमा सिन्हा को एवरेस्ट की ट्रेनिंग किसने दी?
उन्हें उत्तरकाशी स्थित टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन के प्रशिक्षण शिविर में माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल ने प्रशिक्षित किया।
अरुणिमा सिन्हा ने एवरेस्ट कितने दिनों में फतह किया?
अरुणिमा सिन्हा ने 52 दिनों की कड़ी चढ़ाई के बाद 2013 में माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचकर इतिहास रचा। यह उपलब्धि उन्होंने कृत्रिम पैर के साथ हासिल की।
अरुणिमा सिन्हा की कहानी क्यों प्रेरणादायक मानी जाती है?
एक जानलेवा हादसे में पैर गँवाने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और कृत्रिम पैर के साथ दुनिया की सबसे ऊँची चोटी फतह की। उनका जीवन-दर्शन — 'जो आप नहीं कर सकते, उसे उस काम के आड़े न आने दें जो आप कर सकते हैं' — लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
राष्ट्र प्रेस
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