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विनीता सोरेन: गरीबी से एवरेस्ट तक — झारखंड की पहली आदिवासी महिला पर्वतारोही की ऐतिहासिक जीत

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विनीता सोरेन: गरीबी से एवरेस्ट तक — झारखंड की पहली आदिवासी महिला पर्वतारोही की ऐतिहासिक जीत

सारांश

झारखंड के एक छोटे से गांव से निकलकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक — विनीता सोरेन की कहानी सिर्फ पर्वतारोहण की नहीं, बल्कि सामाजिक सीमाओं को तोड़ने की है। 26 मई 2012 को एवरेस्ट फतह कर वे पहली आदिवासी महिला पर्वतारोही बनीं और लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का प्रतीक।

मुख्य बातें

विनीता सोरेन ने 26 मई 2012 को सुबह 6:50 बजे माउंट एवरेस्ट फतह कर एवरेस्ट विजय पाने वाली पहली आदिवासी महिला बनने का इतिहास रचा।
उनका जन्म 21 जून 1987 को झारखंड के सेराइकेला खरसावां जिले के केसोरसोरा गांव में एक साधारण आदिवासी किसान परिवार में हुआ था।
2004 में बछेंद्री पाल से मुलाकात के बाद पर्वतारोहण का लक्ष्य तय किया; बछेंद्री पाल ने ही उन्हें प्रशिक्षण दिया।
'इको एवरेस्ट स्प्रिंग अभियान' के तहत 20 मार्च 2012 को जमशेदपुर से यात्रा शुरू हुई; मेघलाल महतो और राजेंद्र सिंह पाल भी शिखर पर पहुंचे।
एवरेस्ट के बाद महिला थार मरुस्थल अभियान में भी भाग लिया — भुज से वाघा बॉर्डर तक 2,000 किलोमीटर की यात्रा 30 दिनों में पूरी की।

विनीता सोरेन ने 26 मई 2012 को सुबह 6:50 बजे माउंट एवरेस्ट की चोटी पर भारतीय तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया — वे एवरेस्ट फतह करने वाली पहली आदिवासी महिला बन गईं। झारखंड के एक साधारण किसान परिवार से निकलकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंचने की यह यात्रा सात साल की कठोर मेहनत, अदम्य साहस और अटूट संकल्प की गवाही देती है। 25 वर्ष की आयु में यह उपलब्धि हासिल कर विनीता ने देश की लाखों आदिवासी युवतियों के सामने एक नई राह खोली।

साधारण गांव से असाधारण सफर

झारखंड के सेराइकेला खरसावां जिले के राजनगर ब्लॉक स्थित केसोरसोरा गांव में 21 जून 1987 को एक आदिवासी किसान परिवार में जन्मी विनीता का बचपन गरीबी और सीमित संसाधनों के बीच बीता। उनके गांव और आसपास के इलाकों में लड़कियों के लिए शिक्षण या नर्सिंग ही करियर के विकल्प माने जाते थे। खेतों में काम करना और सीमित दायरे में जीना ही तब की वास्तविकता थी — लेकिन विनीता के सपने उस दायरे से कहीं ऊपर थे।

घर से बाहर निकलना भी उनके लिए एक चुनौती था, फिर भी परिवार ने उन पर भरोसा किया और आगे बढ़ने की हिम्मत दी। यह भरोसा ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी बना।

बछेंद्री पाल से मिली प्रेरणा, बदल गई ज़िंदगी

2004 में विनीता पहली बार बछेंद्री पाल से मिलीं — माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली प्रथम भारतीय महिला। उस मुलाकात ने विनीता की दिशा बदल दी। बछेंद्री पाल ने न केवल उन्हें प्रेरित किया, बल्कि स्वयं उन्हें पर्वतारोहण का प्रशिक्षण भी दिया। इसके बाद शुरू हुआ सात साल का अनुशासित और कठिन अभ्यास — जिसमें विनीता ने सीखा कि पर्वतारोहण केवल शारीरिक ताकत नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता, साहस और संकल्प की भी परीक्षा है।

भीषण ठंड, हिमस्खलन के खतरे और थकान भरे पलों के बीच कई बार मंजिल दूर लगी, लेकिन विनीता ने हार नहीं मानी।

एवरेस्ट अभियान और ऐतिहासिक क्षण

विनीता सोरेन ने 'इको एवरेस्ट स्प्रिंग अभियान' के तहत 20 मार्च 2012 को अपने दो साथियों के साथ जमशेदपुर से यात्रा शुरू की। दो महीने से अधिक के इस कठिन अभियान के बाद, 26 मई 2012 को सुबह 6:50 बजे विनीता और मेघलाल महतो ने राजेंद्र सिंह पाल के साथ माउंट एवरेस्ट के शिखर पर भारतीय ध्वज फहराया। यह क्षण न केवल उनकी व्यक्तिगत जीत था, बल्कि भारत की आदिवासी समुदाय के लिए एक ऐतिहासिक पल था।

एवरेस्ट के बाद भी जारी रहा साहस का सफर

एवरेस्ट विजय के बाद भी विनीता रुकी नहीं। वे भारत की महिला थार मरुस्थल अभियान टीम का हिस्सा बनीं, जिसने गुजरात के भुज से पंजाब के वाघा बॉर्डर तक लगभग 2,000 किलोमीटर की यात्रा मात्र 30 दिनों में पूरी की। यह अभियान उनकी बहुआयामी साहसिक क्षमता का प्रमाण था।

आदिवासी युवाओं के लिए प्रेरणा का प्रतीक

विनीता सोरेन की यह उपलब्धि एक व्यक्तिगत सफलता से कहीं अधिक है। यह उन लाखों आदिवासी लड़कियों और युवाओं के लिए संदेश है जो सामाजिक और आर्थिक बाधाओं के बीच बड़े सपने देखने से डरते हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि दृढ़ इच्छाशक्ति और कठोर परिश्रम के सामने कोई भी परिस्थिति स्थायी बाधा नहीं बन सकती। उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

ऐसी उपलब्धियां अपवाद बनकर रह जाती हैं — आदर्श नहीं। विनीता की विरासत तभी पूरी होगी जब उनके जैसे और नाम सामने आएंगे।
RashtraPress
9 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विनीता सोरेन कौन हैं और उन्होंने क्या उपलब्धि हासिल की?
विनीता सोरेन झारखंड की आदिवासी पर्वतारोही हैं, जिन्होंने 26 मई 2012 को माउंट एवरेस्ट फतह कर एवरेस्ट विजय पाने वाली पहली आदिवासी महिला बनने का इतिहास रचा। उस समय उनकी आयु 25 वर्ष थी।
विनीता सोरेन ने एवरेस्ट पर कब और किसके साथ चढ़ाई की?
विनीता सोरेन ने 26 मई 2012 को सुबह 6:50 बजे मेघलाल महतो और राजेंद्र सिंह पाल के साथ माउंट एवरेस्ट के शिखर पर भारतीय ध्वज फहराया। यह अभियान 'इको एवरेस्ट स्प्रिंग अभियान' के तहत 20 मार्च 2012 को जमशेदपुर से शुरू हुआ था।
विनीता सोरेन को पर्वतारोहण की प्रेरणा कहाँ से मिली?
2004 में विनीता की मुलाकात एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल से हुई, जिसने उनकी जीवन-दिशा बदल दी। बछेंद्री पाल ने ही विनीता को पर्वतारोहण का प्रशिक्षण दिया और उन्हें इस लक्ष्य के लिए तैयार किया।
विनीता सोरेन का पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि कैसी थी?
विनीता का जन्म 21 जून 1987 को झारखंड के सेराइकेला खरसावां जिले के केसोरसोरा गांव में एक गरीब आदिवासी किसान परिवार में हुआ। उनके क्षेत्र में लड़कियों के लिए शिक्षण या नर्सिंग ही करियर माने जाते थे, लेकिन परिवार के भरोसे ने उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति दी।
एवरेस्ट विजय के अलावा विनीता सोरेन ने और कौन से अभियानों में हिस्सा लिया?
एवरेस्ट के बाद विनीता भारत की महिला थार मरुस्थल अभियान टीम का हिस्सा बनीं, जिसने गुजरात के भुज से पंजाब के वाघा बॉर्डर तक लगभग 2,000 किलोमीटर की यात्रा 30 दिनों में पूरी की।
राष्ट्र प्रेस
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