असम CM हिमंता बिस्वा सरमा ने 'गाय-कुर्बानी मुक्त ईद' की अपील का किया स्वागत, कई ईदगाह समितियाँ आगे आईं
सारांश
मुख्य बातें
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने मंगलवार, 27 मई 2026 को राज्य की कई ईदगाह समितियों और मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा ईद पर गाय की कुर्बानी से बचने की अपील का खुले दिल से स्वागत किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पहल असम में सांस्कृतिक सौहार्द और सामाजिक एकता को और अधिक मज़बूत करेगी।
मुख्य घटनाक्रम
सरमा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए बताया कि असम की अनेक ईदगाह समितियों ने पहले ही समुदाय के लोगों से गाय की कुर्बानी से परहेज़ करने की अपील की थी। उन्होंने लिखा कि अब कई स्थानों पर मुस्लिम समुदाय के लोग स्वयं आगे आकर इस अपील का समर्थन कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने धुबरी टाउन ईदगाह समिति की अपील का विशेष उल्लेख करते हुए एक अलग पोस्ट साझा किया। उनके अनुसार, समिति ने लोगों से हिंदू समुदाय की भावनाओं का सम्मान करने और कानून का पालन करने के लिए गाय की कुर्बानी न देने का आग्रह किया है।
किन जिलों से आई सकारात्मक प्रतिक्रिया
सरमा ने कहा कि बरपेटा, लखीमपुर, होजाई और कामरूप समेत कई जिलों से गाय संरक्षण को लेकर सकारात्मक संदेश मिल रहे हैं। उन्होंने कहा, 'मैं सभी समितियों और जागरूक नागरिकों का दिल से धन्यवाद करता हूँ।'
मुख्यमंत्री ने असम की समस्त ईद समितियों से अपील की कि वे इस बार 'गाय की कुर्बानी मुक्त' ईद मनाने में अग्रणी भूमिका निभाएँ।
कानूनी पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि असम में असम कैटल प्रिज़र्वेशन एक्ट, 2021 के तहत पशुओं की हत्या, बिक्री और परिवहन पर कड़े प्रतिबंध लागू हैं। राज्य में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार इन कानूनों को सख्ती से लागू करने पर लगातार ज़ोर देती रही है।
राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ
इस घटनाक्रम के बाद असम में राजनीतिक और सामाजिक चर्चा तेज़ हो गई है। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने को लेकर प्रशासन और समाज दोनों स्तरों पर प्रयास जारी हैं। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की अपीलें स्वैच्छिक होने पर ही वास्तविक सामाजिक एकता का प्रतीक बनती हैं।
आगे की राह
मुख्यमंत्री सरमा की अपील के बाद यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि ईद के अवसर पर राज्य के अन्य जिलों की ईदगाह समितियाँ और स्थानीय समुदाय किस हद तक इस पहल से जुड़ते हैं। यह कदम असम में अंतर-धार्मिक संवाद की दिशा में एक उल्लेखनीय संकेत के रूप में देखा जा रहा है।