असम बाढ़: CM हिमंता का बड़ा फैसला — पीड़ित परिवारों को पोस्टमॉर्टम से छूट, मानवीय रवैये के निर्देश
सारांश
मुख्य बातें
असम में जारी बाढ़ संकट के बीच मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 28 जुलाई 2026 को एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की और अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि बाढ़ में जान गँवाने वाले पीड़ितों के मामलों में पोस्टमॉर्टम की अनिवार्यता माफ की जाए। उनका कहना था कि संकट की इस घड़ी में प्रशासन की प्रतिक्रिया नियम-पुस्तिका से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना से संचालित होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री का निर्देश: क्या बदला
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए कहा कि 'संकट के समय सरकार की प्रतिक्रिया दया और संवेदना पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल नौकरशाही प्रक्रियाओं पर।' उन्होंने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने को कहा कि शोकाकुल परिवारों को अनावश्यक प्रशासनिक औपचारिकताओं से न गुज़रना पड़े और राहत सहायता बिना किसी टाली जा सकने वाली देरी के पहुँचे।
यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब राज्य के कई ज़िलों में बाढ़ का पानी घरों और खेतों में घुसा हुआ है और हज़ारों परिवार विस्थापित हैं। पोस्टमॉर्टम की शर्त हटाने से अब परिवार अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार बिना सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे कर सकेंगे।
असम में बाढ़: एक वार्षिक संकट
असम में मानसून के दौरान बाढ़ एक दशकों पुरानी और आवर्ती आपदा है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ हर वर्ष उफनती हैं, जिससे कामरूप, मोरीगाँव, नगाँव, बरपेटा सहित दर्जनों ज़िले प्रभावित होते हैं। विस्थापन, फसल नुकसान और जनहानि इस मौसमी त्रासदी के स्थायी साथी बन चुके हैं। गौरतलब है कि प्रशासनिक जटिलताएँ अक्सर राहत वितरण को धीमा कर देती हैं, जिससे पीड़ितों की पीड़ा और बढ़ जाती है।
सरकार की प्रतिक्रिया और राहत कार्य
राज्य सरकार ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव कार्यों की निगरानी तेज़ कर दी है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि प्रभावित परिवारों की ज़रूरतों को प्राथमिकता दी जाए और सहायता प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि आपदा प्रबंधन में संवेदनशीलता उतनी ही ज़रूरी है जितनी दक्षता।
यह ऐसे समय में आया है जब राज्य सरकार पर बाढ़ पीड़ितों को त्वरित और पारदर्शी राहत देने का दबाव है। पोस्टमॉर्टम छूट जैसे कदम न केवल प्रशासनिक बोझ घटाते हैं, बल्कि शोक में डूबे परिवारों को मनोवैज्ञानिक राहत भी देते हैं।
आम जनता पर असर
पोस्टमॉर्टम की अनिवार्यता हटने से उन परिवारों को सबसे अधिक राहत मिलेगी जिनके सदस्य बाढ़ के पानी में बह गए या डूब गए। ऐसे मामलों में पहले परिवारों को पुलिस रिपोर्ट, अस्पताल की प्रक्रियाएँ और पोस्टमॉर्टम — सब एक साथ संभालना पड़ता था। अब यह बाधा हटने से अंतिम संस्कार और मुआवज़े की प्रक्रिया दोनों तेज़ होंगी।
आगे क्या
मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद अब ज़िला प्रशासन को इन्हें ज़मीनी स्तर पर लागू करना होगा। राज्य सरकार की ओर से राहत कार्यों की निरंतर निगरानी जारी रहेगी। बाढ़ की स्थिति में सुधार और प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुँचाना फिलहाल प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है।