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बाबूराव पेंटर: कबाड़ से बनाया भारत का पहला स्वदेशी मूवी कैमरा, 1918 में रची सिनेमाई क्रांति

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बाबूराव पेंटर: कबाड़ से बनाया भारत का पहला स्वदेशी मूवी कैमरा, 1918 में रची सिनेमाई क्रांति

सारांश

भारतीय सिनेमा की असली नींव मुंबई नहीं, कोल्हापुर में पड़ी थी। बाबूराव पेंटर ने 1918 में कबाड़ बाजार के पुराने प्रोजेक्टर और खराद मशीन से देश का पहला स्वदेशी मूवी कैमरा बनाकर विदेशी तकनीकी एकाधिकार तोड़ा, महाराष्ट्र फिल्म कंपनी की स्थापना की और वी. शांतराम जैसे 500 से अधिक दिग्गजों को तराशा।

मुख्य बातें

बाबूराव पेंटर का जन्म 3 जून 1890 को कोल्हापुर के शिल्पकार परिवार में हुआ।
उन्होंने 1918 में कबाड़ से खरीदे प्रोजेक्टर और खराद मशीन से भारत का पहला स्वदेशी मूवी कैमरा बनाया, जो एक सेकंड में 16 बार लेंस खोल-बंद कर सकता था।
1 दिसंबर 1918 को ‘महाराष्ट्र फिल्म कंपनी’ की स्थापना; छत्रपति शाहू महाराज ने भूमि और जनरेटर देकर सहयोग किया।
उन्होंने भारतीय सिनेमा में स्टोरीबोर्डिंग और प्रोग्राम बुकलेट जैसी तकनीकों की शुरुआत की; 1924 की ‘कल्याण खजिना’ का पोस्टर देश का सबसे पुराना जीवित फिल्म पोस्टर है।
उनके स्टूडियो ने वी.
फत्तेलाल , भालजी पेंढारकर सहित 500 से अधिक सिनेमा हस्तियों को गढ़ा।
16 जनवरी 1954 को निधन; उनके शिष्यों ने 1929 में ‘प्रभात फिल्म कंपनी’ की नींव रखी।

भारतीय सिनेमा के अग्रदूत बाबूराव पेंटर ने वर्ष 1918 में कोल्हापुर में कबाड़ बाजार से खरीदे गए एक पुराने प्रोजेक्टर और साधारण खराद मशीन की मदद से देश का पहला स्वदेशी ‘मोशन पिक्चर कैमरा’ तैयार कर इतिहास रच दिया था। यह कैमरा एक सेकंड में 16 बार लेंस खोलने और बंद करने की क्षमता रखता था, और इसी अविष्कार ने भारतीय फिल्म उद्योग की तकनीकी आत्मनिर्भरता की नींव रखी।

शिल्पकार परिवार से सिनेमा तक का सफर

बाबूराव पेंटर का जन्म 3 जून 1890 को कोल्हापुर के एक पारंपरिक शिल्पकार (मेस्त्री) परिवार में हुआ। घर में ही बढ़ईगिरी, लोहारी, नक्काशी और चित्रकला का ऐसा परिवेश था कि बिना किसी औपचारिक स्कूल या आर्ट कॉलेज के ही उन्होंने कला और विज्ञान के बीच की कड़ियों को जोड़ना सीख लिया। यही अनूठा संगम आगे चलकर भारतीय सिनेमा की पहली प्रयोगशाला बना।

दो साल का संघर्ष और स्वदेशी कैमरे का जन्म

जब विदेशी कंपनियों ने कैमरा तकनीक के दरवाजे बंद कर दिए, तो बाबूराव ने स्वावलंबन का मार्ग चुना। अपने शिष्य वी. जी. दामले और बढ़ई मित्र ज्ञानबा सुतार के साथ मिलकर उन्होंने एक साधारण खराद मशीन पर दो वर्षों तक कड़ी मेहनत की। कबाड़ बाजार से खरीदे गए पुराने प्रोजेक्टर के चक्रों और गियर प्रणालियों का बारीकी से अध्ययन कर 1918 में स्वदेशी कैमरा तैयार हुआ। इसकी पहली परीक्षा रंकाला तालाब में तैरते बच्चों और पंचगंगा नदी के घाट पर कपड़े धोती महिलाओं के दृश्यों को रिकॉर्ड कर ली गई।

महाराष्ट्र फिल्म कंपनी और शाहू महाराज का संरक्षण

इस सफलता के बाद 1 दिसंबर 1918 को ‘महाराष्ट्र फिल्म कंपनी’ की स्थापना हुई। कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज के प्रगतिशील विचारों ने बाबूराव को गहराई से प्रभावित किया। महाराज ने मेस्त्री भाइयों को सिनेमाई प्रयोगों के लिए केवल भूमि ही नहीं दी, बल्कि बिजली का जनरेटर और अन्य आवश्यक सुविधाएं भी मुहैया कराईं। उस दौर में जब पर्दे पर पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते थे, बाबूराव ने इस रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ने का साहस दिखाया।

स्टोरीबोर्डिंग और पोस्टर कला के जनक

बाबूराव केवल फिल्म निर्देशक या मैकेनिक नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के पहले विजुअल आर्टिस्ट भी थे। उन्होंने उद्योग को पहली बार ‘स्टोरीबोर्डिंग’ (स्टेनोग्राफिक पद्धति) से परिचित कराया और शूटिंग से पहले ही हर शॉट का स्केच तैयार करते थे, जिससे कच्चे फिल्म रोल की बर्बादी रुकती थी। विश्व प्रसिद्ध फिल्मकार सर्गेई आइंस्टीन ने भी कथित तौर पर इस तकनीक की प्रशंसा की थी। 1921-22 के दौरान वे दर्शकों को लुभाने के लिए बहुपृष्ठीय ‘कार्यक्रम पुस्तिकाएं’ बांटने वाले पहले निर्माता बने। वर्ष 1924 में आई फिल्म ‘कल्याण खजिना’ का उनका तैयार किया पोस्टर आज भी भारतीय सिनेमा का सबसे पुराना जीवित चित्र-पोस्टर माना जाता है।

500 से अधिक दिग्गजों की पहली पाठशाला

बाबूराव पेंटर का स्टूडियो भारतीय सिनेमा की पहली व्यावहारिक अकादमी बना, जिसने वी. शांतराम, एस. फत्तेलाल और भालजी पेंढारकर जैसे 500 से अधिक दिग्गजों को तराशा। उनके शिष्यों ने 1 जून 1929 को ‘प्रभात फिल्म कंपनी’ की नींव रखी, और 1931 में महाराष्ट्र फिल्म कंपनी पर ताला लग गया। बाद में वी. शांतराम के आग्रह पर उन्होंने लोकप्रिय सवाक फिल्म ‘लोकशाहीर रामजोशी’ (1947) का निर्देशन किया, परंतु उनका मन अंततः चित्रकला और मूर्तिकला के शांत संसार में ही रमा रहा। 16 जनवरी 1954 को कला का यह चितेरा हमेशा के लिए इतिहास में विलीन हो गया, परंतु उनका स्वदेशी स्वाभिमान आज भी भारतीय सिनेमा के कैमरे में कैद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि कैमरा निर्माण की तकनीकी आत्मनिर्भरता उन्हीं की देन है। यह विडंबना है कि स्टोरीबोर्डिंग जैसी जिस तकनीक का श्रेय हॉलीवुड को दिया जाता है, उसका प्रयोग कोल्हापुर के एक मेस्त्री परिवार के व्यक्ति ने एक सदी पहले कर दिखाया था। आज जब ‘मेक इन इंडिया’ और स्वदेशी तकनीक की बात होती है, तो 1918 का यह कोल्हापुर मॉडल — संरक्षण, शिल्प और प्रयोग का त्रिकोण — एक नज़ीर बनकर सामने आता है। उनकी विरासत को सिर्फ जयंती तक सीमित न रखकर सिनेमा शिक्षा के पाठ्यक्रम में स्थान देना जरूरी है।
RashtraPress
18 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बाबूराव पेंटर कौन थे और उनका भारतीय सिनेमा में क्या योगदान है?
बाबूराव पेंटर भारतीय सिनेमा के अग्रदूत, चित्रकार और तकनीशियन थे जिन्होंने 1918 में देश का पहला स्वदेशी मोशन पिक्चर कैमरा बनाया था। उन्होंने महाराष्ट्र फिल्म कंपनी की स्थापना की और स्टोरीबोर्डिंग, फिल्म पोस्टर तथा प्रोग्राम बुकलेट जैसी कई तकनीकों को भारतीय सिनेमा में पहली बार पेश किया।
भारत का पहला स्वदेशी मूवी कैमरा कब और कैसे बना?
भारत का पहला स्वदेशी मूवी कैमरा वर्ष 1918 में कोल्हापुर में बनाया गया। बाबूराव पेंटर ने अपने शिष्य वी. जी. दामले और बढ़ई मित्र ज्ञानबा सुतार के साथ मिलकर कबाड़ बाजार से खरीदे एक पुराने प्रोजेक्टर और साधारण खराद मशीन की मदद से दो वर्षों की मेहनत के बाद यह कैमरा तैयार किया, जो एक सेकंड में 16 बार लेंस खोल-बंद कर सकता था।
महाराष्ट्र फिल्म कंपनी की स्थापना कब हुई और इसमें छत्रपति शाहू महाराज की क्या भूमिका थी?
महाराष्ट्र फिल्म कंपनी की स्थापना 1 दिसंबर 1918 को कोल्हापुर में हुई थी। छत्रपति शाहू महाराज ने सिनेमाई प्रयोगों के लिए न केवल भूमि उपलब्ध कराई, बल्कि बिजली का जनरेटर और अन्य आवश्यक संसाधन भी मुहैया कराए, जिससे स्वदेशी फिल्म निर्माण की नींव मजबूत हुई।
बाबूराव पेंटर के प्रमुख शिष्य कौन-कौन थे?
उनके स्टूडियो ने वी. शांतराम, एस. फत्तेलाल और भालजी पेंढारकर जैसे 500 से अधिक सिनेमा हस्तियों को तराशा। इन्हीं शिष्यों ने आगे चलकर 1 जून 1929 को ‘प्रभात फिल्म कंपनी’ की स्थापना की, जो भारतीय सिनेमा का एक और महत्वपूर्ण अध्याय बनी।
बाबूराव पेंटर का निधन कब हुआ और उनकी अंतिम चर्चित फिल्म कौन-सी थी?
बाबूराव पेंटर का निधन 16 जनवरी 1954 को हुआ था। उनकी अंतिम प्रमुख कृति वी. शांतराम के आग्रह पर निर्देशित सवाक फिल्म ‘लोकशाहीर रामजोशी’ (1947) रही, हालांकि उनके जीवन का अधिकांश समय चित्रकला और मूर्तिकला को समर्पित रहा।
राष्ट्र प्रेस
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