बाबूराव पेंटर: कबाड़ से बनाया भारत का पहला स्वदेशी मूवी कैमरा, 1918 में रची सिनेमाई क्रांति
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सिनेमा के अग्रदूत बाबूराव पेंटर ने वर्ष 1918 में कोल्हापुर में कबाड़ बाजार से खरीदे गए एक पुराने प्रोजेक्टर और साधारण खराद मशीन की मदद से देश का पहला स्वदेशी ‘मोशन पिक्चर कैमरा’ तैयार कर इतिहास रच दिया था। यह कैमरा एक सेकंड में 16 बार लेंस खोलने और बंद करने की क्षमता रखता था, और इसी अविष्कार ने भारतीय फिल्म उद्योग की तकनीकी आत्मनिर्भरता की नींव रखी।
शिल्पकार परिवार से सिनेमा तक का सफर
बाबूराव पेंटर का जन्म 3 जून 1890 को कोल्हापुर के एक पारंपरिक शिल्पकार (मेस्त्री) परिवार में हुआ। घर में ही बढ़ईगिरी, लोहारी, नक्काशी और चित्रकला का ऐसा परिवेश था कि बिना किसी औपचारिक स्कूल या आर्ट कॉलेज के ही उन्होंने कला और विज्ञान के बीच की कड़ियों को जोड़ना सीख लिया। यही अनूठा संगम आगे चलकर भारतीय सिनेमा की पहली प्रयोगशाला बना।
दो साल का संघर्ष और स्वदेशी कैमरे का जन्म
जब विदेशी कंपनियों ने कैमरा तकनीक के दरवाजे बंद कर दिए, तो बाबूराव ने स्वावलंबन का मार्ग चुना। अपने शिष्य वी. जी. दामले और बढ़ई मित्र ज्ञानबा सुतार के साथ मिलकर उन्होंने एक साधारण खराद मशीन पर दो वर्षों तक कड़ी मेहनत की। कबाड़ बाजार से खरीदे गए पुराने प्रोजेक्टर के चक्रों और गियर प्रणालियों का बारीकी से अध्ययन कर 1918 में स्वदेशी कैमरा तैयार हुआ। इसकी पहली परीक्षा रंकाला तालाब में तैरते बच्चों और पंचगंगा नदी के घाट पर कपड़े धोती महिलाओं के दृश्यों को रिकॉर्ड कर ली गई।
महाराष्ट्र फिल्म कंपनी और शाहू महाराज का संरक्षण
इस सफलता के बाद 1 दिसंबर 1918 को ‘महाराष्ट्र फिल्म कंपनी’ की स्थापना हुई। कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज के प्रगतिशील विचारों ने बाबूराव को गहराई से प्रभावित किया। महाराज ने मेस्त्री भाइयों को सिनेमाई प्रयोगों के लिए केवल भूमि ही नहीं दी, बल्कि बिजली का जनरेटर और अन्य आवश्यक सुविधाएं भी मुहैया कराईं। उस दौर में जब पर्दे पर पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते थे, बाबूराव ने इस रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ने का साहस दिखाया।
स्टोरीबोर्डिंग और पोस्टर कला के जनक
बाबूराव केवल फिल्म निर्देशक या मैकेनिक नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के पहले विजुअल आर्टिस्ट भी थे। उन्होंने उद्योग को पहली बार ‘स्टोरीबोर्डिंग’ (स्टेनोग्राफिक पद्धति) से परिचित कराया और शूटिंग से पहले ही हर शॉट का स्केच तैयार करते थे, जिससे कच्चे फिल्म रोल की बर्बादी रुकती थी। विश्व प्रसिद्ध फिल्मकार सर्गेई आइंस्टीन ने भी कथित तौर पर इस तकनीक की प्रशंसा की थी। 1921-22 के दौरान वे दर्शकों को लुभाने के लिए बहुपृष्ठीय ‘कार्यक्रम पुस्तिकाएं’ बांटने वाले पहले निर्माता बने। वर्ष 1924 में आई फिल्म ‘कल्याण खजिना’ का उनका तैयार किया पोस्टर आज भी भारतीय सिनेमा का सबसे पुराना जीवित चित्र-पोस्टर माना जाता है।
500 से अधिक दिग्गजों की पहली पाठशाला
बाबूराव पेंटर का स्टूडियो भारतीय सिनेमा की पहली व्यावहारिक अकादमी बना, जिसने वी. शांतराम, एस. फत्तेलाल और भालजी पेंढारकर जैसे 500 से अधिक दिग्गजों को तराशा। उनके शिष्यों ने 1 जून 1929 को ‘प्रभात फिल्म कंपनी’ की नींव रखी, और 1931 में महाराष्ट्र फिल्म कंपनी पर ताला लग गया। बाद में वी. शांतराम के आग्रह पर उन्होंने लोकप्रिय सवाक फिल्म ‘लोकशाहीर रामजोशी’ (1947) का निर्देशन किया, परंतु उनका मन अंततः चित्रकला और मूर्तिकला के शांत संसार में ही रमा रहा। 16 जनवरी 1954 को कला का यह चितेरा हमेशा के लिए इतिहास में विलीन हो गया, परंतु उनका स्वदेशी स्वाभिमान आज भी भारतीय सिनेमा के कैमरे में कैद है।