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बाराबंकी में घाघरा नदी का कहर: हेतमापुर-केदारीपुर में कटान से घर तोड़कर ईंटें बचाने को मजबूर ग्रामीण

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बाराबंकी में घाघरा नदी का कहर: हेतमापुर-केदारीपुर में कटान से घर तोड़कर ईंटें बचाने को मजबूर ग्रामीण

सारांश

घाघरा नदी की कटान ने बाराबंकी के हेतमापुर-केदारीपुर में तबाही मचा दी है। खेत जा चुके, अब पक्के मकानों की बारी है। ग्रामीण खुद अपने घर तोड़ रहे हैं — ईंटें बचाने के लिए। प्रशासन के दिशा-निर्देश हैं, लेकिन नदी की धारा के सामने उपाय बेअसर साबित हो रहे हैं।

मुख्य बातें

घाघरा (सरयू) नदी की कटान से बाराबंकी के हेतमापुर से केदारीपुर तक सैकड़ों बीघा उपजाऊ जमीन और फसल नदी में समा चुकी है।
कटान अब खेतों से आगे बढ़कर पक्के मकानों तक पहुँच गई है; ग्रामीण घर तोड़कर ईंटें और सामान सुरक्षित स्थानों पर ले जाने को मजबूर हैं।
मीरू शुक्ला और मोनू कुमार शुक्ला सहित प्रभावित ग्रामीणों ने प्रशासनिक उपायों को अपर्याप्त बताया।
1 सितंबर को एल्गिन ब्रिज पर नदी खतरे के निशान से ऊपर पहुँची; बैराजों से छोड़े पानी ने कटान और तेज की।
अपर जिलाधिकारी निरंकार सिंह ने संबंधित अधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी करने की बात कही, लेकिन स्थायी समाधान अभी तक नहीं।
विस्थापित परिवारों को जो जमीन आवंटित की गई है वह नाले के किनारे है, जहाँ बसना व्यावहारिक नहीं।

बाराबंकी जिले की रामनगर तहसील के तराई क्षेत्र में सरयू (घाघरा) नदी की कटान ने 2 सितंबर 2026 तक विकराल रूप ले लिया है — खेतों को निगलने के बाद अब नदी पक्के मकानों की नींव तक पहुँच चुकी है। सूरतगंज ब्लॉक के हेतमापुर से केदारीपुर तक के ग्रामीण अपने वर्षों की मेहनत से बने घरों को खुद तोड़कर ईंटें और जरूरी सामान सुरक्षित स्थानों पर ले जाने को विवश हैं।

मुख्य घटनाक्रम

घाघरा नदी का जलस्तर लगातार उतार-चढ़ाव में रहने के कारण सूरतगंज ब्लॉक क्षेत्र में कटान की रफ्तार तेज हो गई है। 1 सितंबर की रिपोर्टों के अनुसार, एल्गिन ब्रिज पर नदी खतरे के निशान से ऊपर पहुँच गई थी और बैराजों से छोड़े गए पानी ने भी जलस्तर को प्रभावित किया। हेतमापुर से केदारीपुर तक सैकड़ों बीघा उपजाऊ जमीन और खड़ी फसल नदी में समा चुकी है।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में हुआ है जब धान की फसल अभी पूरी तरह पकी नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि कटान इसी गति से जारी रही तो फसल हाथ से जाएगी — इसलिए वे अधपकी फसल को काटकर कम से कम पशुओं के चारे के रूप में उपयोग में लाने की कोशिश कर रहे हैं।

ग्रामीणों की पीड़ा

केदारीपुर निवासी मोनू कुमार शुक्ला ने बताया कि उन्होंने धान की फसल में काफी पूँजी लगाई थी, लेकिन कटान तेजी से उनके खेत की ओर बढ़ रही है। उनके परिवार में करीब 12-13 सदस्य हैं और अब फसल के साथ-साथ घर बचाने की चिंता भी सताने लगी है। उनके अनुसार, प्रशासन की ओर से कटान रोकने के पर्याप्त इंतजाम दिखाई नहीं दे रहे।

एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा कि नदी की तेज धारा के सामने कटान रोकने के लिए किए जा रहे उपाय टिक नहीं पा रहे हैं। खेतों के बाद अब मकानों की बारी आने से पूरे इलाके में भय का माहौल है।

मीरू शुक्ला ने बताया कि वे पक्का घर तोड़कर सामान निकाल रही हैं, लेकिन जाएँ तो जाएँ कहाँ — प्रशासन ने जो जमीन आवंटित की है वह नाले के किनारे है, जहाँ परिवार को बसाना संभव नहीं। बारिश के बीच रहने की यह चिंता परिवार को और कमजोर कर रही है।

सरकार की प्रतिक्रिया

अपर जिलाधिकारी निरंकार सिंह ने बताया कि नदी का जलस्तर घटने-बढ़ने के कारण कुछ स्थानों पर कटान की स्थिति बन रही है। उन्होंने कहा कि रामनगर और रामसनेहीघाट तहसीलें बाढ़ प्रभावित क्षेत्र हैं और वर्तमान में जलस्तर खतरे के निशान के आसपास बना हुआ है। हेतमापुर के आसपास आबादी के निकट कटान को देखते हुए संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।

आम जनता पर असर

सैकड़ों बीघा उपजाऊ कृषि भूमि पहले ही नदी में समा चुकी है। जिन परिवारों ने वर्षों की बचत से पक्के मकान बनाए थे, वे अब उन्हें खुद तोड़ने पर मजबूर हैं ताकि कम से कम निर्माण सामग्री बचाई जा सके। विस्थापित परिवारों के सामने बरसात के मौसम में आश्रय की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है।

क्या होगा आगे

यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश के कई जिलों में मानसूनी बाढ़ का दबाव बना हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार, बैराजों से पानी छोड़े जाने और लगातार बारिश के बीच घाघरा के जलस्तर में उतार-चढ़ाव अगले कुछ दिनों तक जारी रह सकता है, जिससे कटान का खतरा और बढ़ सकता है। प्रशासन की ओर से स्थायी समाधान न होने तक प्रभावित ग्रामीणों की मुश्किलें बनी रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

प्रशासन दिशा-निर्देश जारी करता है, और ग्रामीण खुद अपने घर तोड़ते हैं। असली सवाल यह है कि दशकों से बाढ़-प्रभावित घोषित इन तहसीलों में स्थायी तटबंध या पुनर्वास नीति क्यों नहीं बन पाई। नाले के किनारे जमीन देकर विस्थापन को 'हल' बताना न केवल अपर्याप्त है, बल्कि यह उस व्यवस्थागत विफलता को उजागर करता है जो हर साल किसानों और परिवारों को शून्य से शुरुआत करने पर मजबूर करती है।
RashtraPress
17 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बाराबंकी में घाघरा नदी की कटान से कौन-कौन से गाँव प्रभावित हैं?
सूरतगंज ब्लॉक क्षेत्र के हेतमापुर और केदारीपुर गाँव सबसे अधिक प्रभावित हैं, जहाँ नदी लगातार किनारे की जमीन काट रही है। रामनगर और रामसनेहीघाट तहसीलें भी बाढ़-प्रभावित क्षेत्र घोषित हैं।
ग्रामीण अपने घर खुद क्यों तोड़ रहे हैं?
घाघरा की कटान इतनी तेज है कि पक्के मकान नदी में समाने का खतरा है। ग्रामीण घर तोड़कर ईंटें और जरूरी सामान सुरक्षित स्थानों पर ले जा रहे हैं ताकि वर्षों की मेहनत से बनी निर्माण सामग्री कम से कम बचाई जा सके।
घाघरा नदी का जलस्तर अभी कहाँ है?
2 सितंबर 2026 तक जलस्तर खतरे के निशान के आसपास बना हुआ है। 1 सितंबर को एल्गिन ब्रिज पर नदी खतरे के निशान से ऊपर पहुँच गई थी और बैराजों से छोड़े गए पानी ने भी जलस्तर को प्रभावित किया।
प्रशासन ने कटान रोकने के लिए क्या कदम उठाए हैं?
अपर जिलाधिकारी निरंकार सिंह के अनुसार, हेतमापुर के आसपास आबादी के निकट कटान को देखते हुए संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। हालाँकि ग्रामीणों का कहना है कि किए जा रहे उपाय नदी की तेज धारा के सामने टिक नहीं पा रहे।
विस्थापित ग्रामीणों को कहाँ बसाया जा रहा है?
प्रशासन ने विस्थापित परिवारों को जमीन आवंटित की है, लेकिन ग्रामीण मीरू शुक्ला के अनुसार यह जमीन नाले के किनारे है जहाँ परिवार को बसाना व्यावहारिक नहीं है। बारिश के मौसम में आश्रय की गंभीर समस्या बनी हुई है।
राष्ट्र प्रेस
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