11 जुलाई 2026
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क्या ब्यावर में गोवर्धन पूजा पर सदियों पुरानी परंपरा का पालन किया गया?

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क्या ब्यावर में गोवर्धन पूजा पर सदियों पुरानी परंपरा का पालन किया गया?

सारांश

ब्यावर में गोवर्धन पूजा परंपरा की अनोखी विशेषताएँ और रस्में दर्शाती हैं कि कैसे ग्वाला समाज अपनी प्राचीन विरासत को सहेजता है। यह पूजा न केवल संस्कृति को जीवित रखती है, बल्कि इसमें शामिल रस्में भी युवाओं के लिए एक खास महत्व रखती हैं।

मुख्य बातें

ब्यावर में गोवर्धन पूजा की अनोखी परंपरा सदियों पुरानी है।
महिलाएं पूजा की तैयारी करती हैं, जबकि पुरुष पूजा का मुख्य कार्य करते हैं।
कुंवारे युवक विशेष रस्म के माध्यम से जल्दी शादी की इच्छा व्यक्त करते हैं।
यह आयोजन संस्कृति की गहराई और सामूहिकता का प्रतीक है।
समापन देव उठनी एकादशी के दिन होता है।

ब्यावर, 22 अक्टूबर (राष्ट्र प्रेस)। आधुनिकता के इस युग में, राजस्थान के ब्यावर में ग्वाला समाज आज भी अपनी लगभग एक हजार वर्ष पुरानी अनोखी विरासत को बनाए रखे हुए है। यह परंपरा, जो ब्रिटिश काल से भी पहले शुरू हुई थी, गोवर्धन पूजा के अवसर पर पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। बुधवार को विधि विधान से गोवर्धन पूजा का आयोजन हुआ।

गोवर्धन पूजा की तैयारियों में समाज की महिलाएं गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाती हैं और इसे पुष्प, दीपक और रंगोली से सजाती हैं। साथ ही, वे प्रसाद के लिए पूड़ी और खीर भी बनाती हैं।

इस परंपरा की खासियत यह है कि पूजा का मुख्य कार्य समाज के पुरुषों द्वारा किया जाता है, जबकि महिलाएं सिर्फ तैयारी और सजावट का काम संभालती हैं। यह आयोजन न केवल संस्कृति की गहराई को दर्शाता है, बल्कि इसमें शामिल रस्में भी कौतूहल का विषय बनती हैं।

पूजन के बाद सभी श्रद्धालु धन और समृद्धि के प्रतीक गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करके नमन करते हैं। इस दौरान एक अनूठी रस्म निभाई जाती है, जिसमें अविवाहित युवक प्रसाद में चढ़ाई गई पूड़ी को अपने मुंह से उठाने का प्रयास करते हैं। मान्यता है कि जो युवक एक बार में पूड़ी उठाने में सफल हो जाता है, उसका विवाह शीघ्र संपन्न होता है।

पूजन के बाद गोवर्धन जी को कपड़े से ढक दिया जाता है। इस परंपरा का समापन देव उठनी एकादशी के दिन होता है, जब एक बैल द्वारा विशेष विधि संपन्न कराई जाती है। इसके बाद ग्वाला समाज में विवाह समारोह और अन्य शुभ मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है।

ग्वाला मोहनलाल ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में कहा कि यह परंपरा कई वर्षों से मनाई जा रही है। इसमें मान्यता है कि कुंवारे युवक मुंह से प्रसाद उठाते हैं, जिससे उनकी शादी जल्द हो जाए। हम अपने ईस्ट देवा की पूजा करते हैं।

रामकिशोर ने बताया कि ग्वाला समाज इस पूजा को सदियों से कर रहा है। यह परंपरा घर के बच्चे, बड़े और महिलाएं सब एक साथ मनाते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह एकता और सामूहिकता का भी प्रतीक है। यह आयोजन समाज के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, जो उन्हें अपनी विरासत को बनाए रखने का मौका देता है।
RashtraPress
11 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गोवर्धन पूजा का महत्व क्या है?
गोवर्धन पूजा का महत्व धन और समृद्धि के प्रतीक गोवर्धन पर्वत की पूजा में है। यह भारतीय संस्कृति की गहराई को दर्शाता है।
ग्वाला समाज की यह परंपरा कब से चली आ रही है?
यह परंपरा लगभग एक हजार वर्ष पुरानी है और ब्रिटिश काल से भी पहले शुरू हुई थी।
क्या महिलाएं पूजा में भाग लेती हैं?
महिलाएं पूजा में सीधे तौर पर भाग नहीं लेतीं, बल्कि तैयारी और सजावट का कार्य करती हैं।
कुंवारे युवकों के लिए विशेष रस्म क्या होती है?
कुंवारे युवक प्रसाद में चढ़ाई गई पूड़ी को मुंह से उठाने का प्रयास करते हैं, जो उनकी जल्द शादी का प्रतीक है।
इस परंपरा का समापन कब होता है?
इस परंपरा का समापन देव उठनी एकादशी के दिन होता है।
राष्ट्र प्रेस
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