बेनीवाल ने लोकसभा में उठाया बाड़मेर में धार्मिक स्थल तोड़े जाने का मुद्दा, अमित शाह से की केंद्रीय टीम की मांग
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने मंगलवार, 11 अगस्त को लोकसभा में राजस्थान के सीमावर्ती जिलों, विशेषकर बाड़मेर संसदीय क्षेत्र, में मुस्लिम समुदाय से जुड़े धार्मिक स्थलों और आवासीय परिसरों को कथित तौर पर बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के गिराए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हुए प्रभावित स्थलों पर केंद्रीय जाँच टीम भेजने की माँग की।
मुख्य घटनाक्रम
बेनीवाल ने नियम 377 के तहत यह मामला सदन में रखा। उनके अनुसार, बाड़मेर जिले के विभिन्न हिस्सों में कई मस्जिदों और दरगाहों को कथित तौर पर ध्वस्त किया गया है। उन्होंने जिन स्थलों का विशेष रूप से उल्लेख किया, उनमें जामा मस्जिद सियाई, जामा मस्जिद मेकन का पार, जामा मस्जिद केरकोरी, जामा मस्जिद रामपुरा (दाहेवा), दरगाह सैयद गुल मोहम्मद शाह और भलगांव बखासर शामिल हैं।
बेनीवाल का पक्ष
बेनीवाल ने स्पष्ट किया कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मानते हैं, परंतु साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय संविधान नागरिकों को धर्म का अधिकार देता है और धार्मिक स्थलों की गरिमा की रक्षा करता है। उनका तर्क था कि सुरक्षा या प्रशासनिक कारणों से की गई किसी भी कार्रवाई को पारदर्शी और कानूनसम्मत प्रक्रिया के अंतर्गत ही अंजाम दिया जाना चाहिए।
स्थानीय आबादी पर असर
बेनीवाल के अनुसार, उचित कानूनी प्रक्रिया और स्थानीय निवासियों से पूर्व परामर्श के बिना की गई इन कार्रवाइयों से इलाके की आबादी के कुछ वर्गों में गहरा आक्रोश पैदा हुआ है। उन्होंने सरकार और प्रशासन से प्रभावित निवासियों की चिंताओं को प्राथमिकता के आधार पर सुनने और निपटाने का आग्रह किया।
सरकार से मांग
सांसद ने केंद्र से माँग की कि कथित तौर पर तोड़फोड़ की गई जगहों पर एक केंद्रीय टीम भेजी जाए, ताकि स्थिति का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन हो सके और धार्मिक स्थलों की पवित्रता सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने भविष्य में ऐसे मामलों में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और कानूनी प्रक्रिया के पालन की भी माँग रखी। बेनीवाल ने यह भी कहा कि वे सभी धर्मों और समुदायों को प्रभावित करने वाले अन्याय के मुद्दे उठाना जारी रखेंगे।
व्यापक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा बुनियादी ढाँचे के विस्तार को लेकर बहस तेज है। गौरतलब है कि राजस्थान के सीमावर्ती जिले — विशेषकर बाड़मेर और जैसलमेर — सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं और यहाँ किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई का स्थानीय सामाजिक ताने-बाने पर सीधा असर पड़ता है। आलोचकों का कहना है कि सुरक्षा आवश्यकताओं और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है।