भगवान नरसिंह की शालिग्राम पत्थर से बनी अद्भुत मूर्ति, जो समेटे है गूढ़ रहस्यों का खजाना

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भगवान नरसिंह की शालिग्राम पत्थर से बनी अद्भुत मूर्ति, जो समेटे है गूढ़ रहस्यों का खजाना

सारांश

नरसिंह मंदिर उत्तराखंड में शांत रूप में भगवान नरसिंह की पूजा का अद्भुत स्थल है। जानें इस प्राचीन मंदिर के रहस्यों और धार्मिक महत्व के बारे में।

Key Takeaways

  • नरसिंह मंदिर का स्थापत्य कला अद्भुत है।
  • यह प्राचीन मंदिर 1200 वर्ष पुराना है।
  • भगवान नरसिंह की मूर्ति शालिग्राम पत्थर से बनी है।
  • मंदिर में सर्दियों में बद्रीनाथ की पूजा होती है।
  • मूर्ति की बाईं कलाई धीरे-धीरे पतली होती जा रही है।

उत्तराखंड, 3 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत के विभिन्न मंदिरों में भगवान नरसिंह के उग्र रूप की पूजा की जाती है, लेकिन देवभूमि उत्तराखंड के चमोली जिले के ज्योतिर्मठ में स्थित नरसिंह मंदिर एक ऐसा पवित्र स्थल है, जहाँ भगवान नरसिंह को शांत और सौम्य रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। यह मंदिर बद्रीनाथ धाम के मार्ग पर स्थित है, इसलिए बद्रीनाथ के दर्शन के लिए आने वाले भक्त पहले यहाँ अवश्य आते हैं।

यह प्राचीन मंदिर लगभग 1200 वर्ष पुराना है। मान्यता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने स्वयं इस स्थान पर भगवान नरसिंह की स्थापना की थी। यहाँ स्थापित भगवान नरसिंह की मूर्ति शालिग्राम पत्थर से बनी है, जो लगभग 10 इंच (25 सेंटीमीटर) ऊँची है, और भगवान कमलासन पर शांत मुद्रा में विराजमान हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी, जबकि इतिहासकार इसे आठवीं शताब्दी में कश्मीर के प्रसिद्ध राजा ललितादित्य के शासनकाल से जोड़ते हैं।

गुरुवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मंदिर के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक विशेष वीडियो साझा किया। मुख्यमंत्री ने अपनी पोस्ट में लिखा, "चमोली जनपद के ज्योतिर्मठ में स्थित नरसिंह मंदिर भगवान श्री हरि विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित एक अत्यंत पावन और प्राचीन स्थल है। अद्भुत स्थापत्य कला से सुसज्जित यह मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और विश्वास का केंद्र है। चमोली यात्रा के दौरान इस दिव्य स्थल के दर्शन अवश्य करें।"

यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को भी समृद्ध करता है। हिमालय की गोद में बसा यह स्थल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक शक्ति का अनोखा संगम है।

कहा जाता है कि शीतकाल के दौरान जब बद्रीनाथ धाम बंद होता है, तब भगवान बद्रीनाथ का अस्थायी निवास यहीं होता है, जहाँ उनकी पूजा की जाती है।

सर्दियों में, बद्रीनाथ की मूर्ति को यहाँ लाया जाता है, और नरसिंह भगवान के साथ बद्रीनाथ की पूजा होती है।

इस मंदिर में भगवान नरसिंह की एक प्रसिद्ध मूर्ति स्थापित है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह धीरे-धीरे छोटी होती जा रही है। खासकर मूर्ति की बाईं कलाई पतली होती जा रही है और हर दिन और पतली होती जा रही है।

मान्यता है कि जिस दिन भगवान नरसिंह की यह कलाई टूटकर गिर जाएगी, उस दिन नर और नारायण (जय और विजय) नाम के पर्वत आपस में मिल जाएंगे और बद्रीनाथ धाम जाने का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। इसके बाद जोशीमठ से लगभग 23 किमी दूर ‘भविष्य बद्री’ में नए बद्रीनाथ धाम की स्थापना होगी।

Point of View

बल्कि यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह स्थल श्रद्धालुओं को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करता है, जो आध्यात्मिकता और प्राकृतिक सुंदरता का संगम है।
NationPress
05/04/2026

Frequently Asked Questions

नरसिंह मंदिर का इतिहास क्या है?
नरसिंह मंदिर लगभग 1200 वर्ष पुराना है और मान्यता है कि इसे आदि गुरु शंकराचार्य ने स्थापित किया था।
यहाँ भगवान नरसिंह की मूर्ति किससे बनी है?
यह मूर्ति शालिग्राम पत्थर से बनी है और लगभग 10 इंच ऊँची है।
सर्दियों में बद्रीनाथ की पूजा कैसे होती है?
सर्दियों में बद्रीनाथ की मूर्ति को नरसिंह मंदिर लाया जाता है, जहाँ दोनों की पूजा होती है।
क्या नरसिंह की मूर्ति में कोई विशेष बात है?
मूर्ति की बाईं कलाई धीरे-धीरे पतली होती जा रही है, जो एक मान्यता से जुड़ी है।
नरसिंह मंदिर का महत्व क्या है?
यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है और उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध करता है।
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