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पौड़ी का भैरव गढ़ी मंदिर: गढ़वाल के 52 गढ़ों में से एक, जहाँ गोरखा सेना को मिली थी हार

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पौड़ी का भैरव गढ़ी मंदिर: गढ़वाल के 52 गढ़ों में से एक, जहाँ गोरखा सेना को मिली थी हार

सारांश

पौड़ी गढ़वाल का भैरव गढ़ी मंदिर महज एक धार्मिक स्थल नहीं — यह गढ़वाल के उस गौरवशाली प्रतिरोध की गवाही है जब 2 वर्षों की घेराबंदी के बाद भी गोरखा सेना मात्र 28 दिनों में पराजित हो गई। 2,400 मीटर ऊँचाई पर बसा यह गढ़ आज भी आस्था और इतिहास का जीवंत संगम है।

मुख्य बातें

भैरव गढ़ी मंदिर (लंगूर गढ़ी) उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गाँव में 2,400 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
यह मंदिर गढ़वाल के 52 ऐतिहासिक गढ़ों में से एक — लंगूर गढ़ — माना जाता है।
लगभग 1791 में नेपाल के गोरखाओं ने 2 वर्षों की घेराबंदी के बाद यहाँ आक्रमण किया, लेकिन मात्र 28 दिनों में पराजित हुए।
पराजित गोरखा अधिकारी थापा ने भैरवनाथ को लगभग 40 किलो का ताम्र-पत्र भेंट किया था।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक्स पर वीडियो साझा कर श्रद्धालुओं से मंदिर दर्शन की अपील की।
हर वर्ष जून (ज्येष्ठ मास) में भव्य मेला और सावन माह में विशेष कीर्तन-भंडारे आयोजित होते हैं।

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गाँव में स्थित भैरव गढ़ी मंदिर — जिसे लंगूर गढ़ी के नाम से भी जाना जाता है — गढ़वाल के 52 ऐतिहासिक गढ़ों (किलों) में से एक माना जाता है। समुद्र तल से लगभग 2,400 मीटर (9,000 फीट) की ऊँचाई पर स्थित यह धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल अपने आध्यात्मिक महत्व के साथ-साथ एक गौरवशाली युद्ध-इतिहास के लिए भी विख्यात है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

18वीं शताब्दी के अंत (लगभग 1791) और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में नेपाल के गोरखाओं ने गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्रों पर आक्रमण किया था। इतिहास के अनुसार, सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस लंगूर गढ़ को जीतने के लिए गोरखा सेना ने लगभग दो वर्षों तक घेराबंदी की। इसके बावजूद, युद्ध आरंभ होते ही मात्र 28 दिनों के भीतर गोरखा सेना को पराजय का सामना करना पड़ा।

यह ऐसे समय में हुआ जब गोरखाओं का उत्तराखंड के अन्य क्षेत्रों में विस्तार जारी था — ऐसे में लंगूर गढ़ की यह रक्षा स्थानीय जनमानस में भैरवनाथ के चमत्कार के रूप में दर्ज हो गई।

गोरखा अधिकारी की भेंट और आस्था का जन्म

मान्यता के अनुसार, इस युद्ध में भैरवनाथ की शक्ति से प्रभावित होकर गोरखा सेना के एक अधिकारी (थापा) ने मंदिर में लगभग 40 किलो वजनी ताम्र-पत्र (तांबे की प्लेट) भेंट किया था। तभी से इस क्षेत्र में भैरव गढ़ी को 'गढ़वाल के रक्षक' के रूप में पूजा जाने लगा। गौरतलब है कि यह ताम्र-पत्र आज भी मंदिर की ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा माना जाता है।

मंदिर की धार्मिक परंपराएँ

यहाँ विराजमान कालनाथ भैरव को काली वस्तुएँ प्रिय मानी जाती हैं। इसी मान्यता के अनुसार, मंडुए (रागी) के आटे से बनी रोटी — जिसे स्थानीय भाषा में 'रोट' कहते हैं — यहाँ प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है। यह परंपरा इस मंदिर की विशिष्ट पहचान है, जो इसे उत्तराखंड के अन्य भैरव मंदिरों से अलग करती है।

हर वर्ष जून माह (ज्येष्ठ मास) में यहाँ एक भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुँचते हैं। सावन माह में भी मंदिर परिसर में विशेष कीर्तन और भंडारे आयोजित किए जाते हैं।

मुख्यमंत्री धामी की अपील

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक विशेष वीडियो साझा करते हुए लिखा: 'पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गाँव में मौजूद भैरव गढ़ी मंदिर, कुदरती खूबसूरती से भरे पहाड़ों के बीच है। भगवान भैरव को गढ़वाल का रक्षक माना जाता है। पौड़ी गढ़वाल जिले में आने पर, इस पवित्र मंदिर के दर्शन जरूर करें।' उनकी इस अपील से मंदिर एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

पर्यटन और सांस्कृतिक महत्व

प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण पहाड़ी चोटी पर बसा यह मंदिर धार्मिक पर्यटन के लिहाज़ से भी उल्लेखनीय है। गढ़वाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में 52 गढ़ों का विशेष स्थान है, और भैरव गढ़ी उनमें से एक ऐसा गढ़ है जो आज भी जीवंत आस्था और इतिहास का संगम बना हुआ है। आने वाले समय में इसे उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन सर्किट में शामिल किए जाने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर इसकी उपस्थिति नगण्य है। मुख्यमंत्री धामी की सोशल मीडिया अपील स्वागत योग्य है, परंतु असली ज़रूरत है — इन स्थलों तक पहुँच मार्ग, व्याख्या केंद्र और ऐतिहासिक दस्तावेज़ीकरण। बिना ढाँचागत निवेश के, ये पोस्ट क्षणिक ध्यान से आगे नहीं जाएँगी।
RashtraPress
2 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भैरव गढ़ी मंदिर कहाँ स्थित है और इसकी ऊँचाई कितनी है?
भैरव गढ़ी मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गाँव में समुद्र तल से लगभग 2,400 मीटर (9,000 फीट) की ऊँचाई पर एक पहाड़ी चोटी पर स्थित है। इसे लंगूर गढ़ी के नाम से भी जाना जाता है।
गढ़वाल के 52 गढ़ क्या हैं और भैरव गढ़ी उनमें कहाँ आती है?
गढ़वाल के 52 गढ़ वे ऐतिहासिक किले और सामरिक चौकियाँ हैं जो गढ़वाल राजाओं के शासनकाल में क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे। भैरव गढ़ी (लंगूर गढ़) इन्हीं 52 गढ़ों में से एक मानी जाती है और इसका विशेष सामरिक महत्व रहा है।
गोरखाओं को भैरव गढ़ी में हार क्यों माननी पड़ी थी?
इतिहास के अनुसार लगभग 1791 में नेपाल के गोरखाओं ने लंगूर गढ़ को जीतने के लिए करीब दो वर्षों तक घेराबंदी की, लेकिन युद्ध शुरू होने के मात्र 28 दिनों के भीतर उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह भैरवनाथ के चमत्कार का परिणाम था।
भैरव गढ़ी मंदिर में कौन-सा प्रसाद चढ़ाया जाता है और यहाँ कौन-से त्योहार मनाए जाते हैं?
यहाँ कालनाथ भैरव को मंडुए (रागी) के आटे से बनी रोटी — जिसे 'रोट' कहते हैं — का प्रसाद चढ़ाया जाता है, क्योंकि मान्यता है कि उन्हें काली वस्तुएँ प्रिय हैं। हर वर्ष जून (ज्येष्ठ मास) में भव्य मेला और सावन माह में विशेष कीर्तन व भंडारे आयोजित होते हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भैरव गढ़ी मंदिर के बारे में क्या कहा?
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक्स पर मंदिर का वीडियो साझा करते हुए लिखा कि भगवान भैरव को गढ़वाल का रक्षक माना जाता है और पौड़ी गढ़वाल आने पर इस पवित्र मंदिर के दर्शन अवश्य करें। उन्होंने मंदिर की प्राकृतिक सुंदरता का भी उल्लेख किया।
राष्ट्र प्रेस
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