भारत सरकार ने कैप्टिव पावर नियमों में किए महत्वपूर्ण संशोधन
सारांश
Key Takeaways
- कैप्टिव पावर व्यवस्था को मजबूत करने के लिए नए नियम लागू किए गए हैं।
- उद्योगों के लिए बिजली उत्पादन को सरल बनाने का उद्देश्य है।
- कैप्टिव स्टेटस का सत्यापन पूरे वित्तीय वर्ष के लिए होगा।
- सस्ती और भरोसेमंद बिजली उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
- भारत को स्वावलंबी ऊर्जा भविष्य की ओर अग्रसर करेगा।
नई दिल्ली, 14 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। भारत सरकार ने इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) रूल्स, 2026 को अधिसूचित किया है, जिसमें इलेक्ट्रिसिटी रूल्स, 2005 के रूल 3 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं। ये संशोधन कैप्टिव जनरेटिंग प्लांट से जुड़े नियमों को और अधिक स्पष्ट और सहज बनाने के लिए किए गए हैं। इनका उद्देश्य उद्योगों के लिए बिजली उत्पादन को सरल बनाना, नियमों में स्पष्टता लाना और भारत के ऊर्जा संक्रमण तथा औद्योगिक विकास के लक्ष्यों के अनुकूल कैप्टिव जनरेशन की संरचना तैयार करना है।
कैप्टिव पावर, अर्थात अपने उपयोग के लिए स्वयं बिजली का उत्पादन, इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 के अंतर्गत उद्योगों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। इससे उद्योगों को बिजली की आपूर्ति में आने वाली समस्याओं और लागत में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में सहायता प्राप्त होती है। वर्तमान में, भारतीय उद्योग गैर-फॉसिल ईंधन आधारित ऊर्जा का उपयोग करके स्थिरता और लागत में कमी ला रहे हैं। इस संदर्भ में, कैप्टिव पावर के लिए स्पष्ट, पूर्वानुमानित और लागू करने योग्य नियमों का होना अत्यंत आवश्यक है।
बिजली का उत्पादन नजदीकी स्थान पर करने से ट्रांसमिशन लॉस में कमी आती है, सिस्टम की दक्षता बढ़ती है और ग्रिड मजबूत होता है। नए नियमों के तहत कैप्टिव पावर के नियमों को लागू करने में स्पष्टता आएगी तथा स्वामित्व और खपत से संबंधित कानूनी सुरक्षा भी बनी रहेगी।
अब कैप्टिव प्लांट के स्वामित्व में सहायक कंपनियों, होल्डिंग कंपनियों और उनकी अन्य सहायक कंपनियों को भी शामिल किया गया है। इससे कॉर्पोरेट समूहों द्वारा किए गए निवेशों को कैप्टिव स्टेटस देने में कोई कठिनाई नहीं होगी। इसके साथ ही, कैप्टिव स्टेटस का सत्यापन पूरे वित्तीय वर्ष के लिए किया जाएगा। पहले या अंतिम वर्ष में केवल संबंधित हिस्से के लिए सत्यापन किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त, समूह कैप्टिव प्रोजेक्ट में लचीलापन बढ़ाया गया है। सदस्य अपनी आवश्यकता के अनुसार बिजली का उपयोग कर सकते हैं। 26 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सेदारी वाले सदस्य पूरे खपत को कैप्टिव मान सकते हैं। 1 अप्रैल 2026 से राज्य/संघ राज्य सरकारें इंट्रा-स्टेट कैप्टिव खपत का सत्यापन करने के लिए नोडल एजेंसी नियुक्त कर सकती हैं। इंटर-स्टेट खपत के लिए सत्यापन एनएलडीसी द्वारा किया जाएगा। किसी विवाद के लिए ग्रीवांस रेड्रेसल समिति का गठन किया जाएगा।
सत्यापन तक सीएसएस और एएस नहीं लगाए जाएंगे, बशर्ते उपयोगकर्ता सही घोषणा करें। यदि बाद में प्लांट कैप्टिव नहीं पाया जाता है तो सीएसएस/एएस लेट पेमेंट चार्ज के साथ देना होगा।
एसोसिएशन ऑफ पर्सन्स से जुड़ी खपत, सत्यापन और सीएसएस/एएस से संबंधित प्रावधान 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे। अन्य बदलाव तुरंत प्रभावी होंगे।
ये संशोधन उद्योगों को सस्ती और भरोसेमंद बिजली उपलब्ध कराने, उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमताओं को मजबूत करने और भारत को सतत तथा स्वावलंबी ऊर्जा भविष्य की दिशा में ले जाने में सहायता करेंगे।