भरत तिवारी एनकाउंटर: पूर्व डीजीपी अभयानंद ने SDM की मौजूदगी पर उठाए गंभीर सवाल
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में पूर्व डीजीपी अभयानंद ने 28 जून 2026 को पटना में बिहार पुलिस की कार्यशैली पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इस मामले में एसडीएम (SDM) की मौजूदगी उनकी समझ से परे है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भरत तिवारी को कितनी गोलियाँ लगीं, यह उतना अहम नहीं जितना यह जानना कि फायरिंग किस दूरी से की गई।
पुलिस एक्शन में SDM की मौजूदगी क्यों असामान्य है
पूर्व डीजीपी अभयानंद ने बताया कि पुलिस कार्रवाई दो प्रकार की होती है — एक जब भीड़ नियंत्रण या कानून-व्यवस्था की स्थिति हो, और दूसरी जब किसी व्यक्ति विशेष को पकड़ने जाना हो। उन्होंने कहा, 'इस केस में एक व्यक्ति को पकड़ने पुलिस गई थी। मुझे समझ नहीं आ रहा कि एसडीएम वहाँ क्या कर रहे थे। यह मजमा वाला मामला नहीं था।'
उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि जब भी किसी मजिस्ट्रेट को तैनात किया जाता है, तो डीएम और एसपी मिलकर संयुक्त आदेश (Joint Order) जारी करते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि इस मामले में ऐसा कोई आदेश जारी हुआ था या नहीं।
SDM और क्राइम ऑपरेशन का कोई संबंध नहीं: अभयानंद
अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर पूर्व डीजीपी ने कहा कि एसडीएम का क्राइम या रेड से कोई संबंध नहीं होता। उन्होंने कहा, 'हमने कभी नहीं देखा कि क्राइम या रेड के दौरान डीएम या एसडीएम साथ गए हों। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कभी-कभी डीएम रहते हैं, लेकिन यहाँ तो अलग मामला था।'
साजिश की संभावना से इनकार नहीं
अभयानंद ने इस पूरे प्रकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि 'यह मामला मेरे दिमाग में परेशानी पैदा कर रहा है। साजिश हो सकती है — इससे इनकार नहीं किया जा सकता।' उन्होंने यह भी कहा कि यदि जाँच टीम ठीक ढंग से जाँच करे तो सच्चाई जरूर सामने आएगी।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के संदर्भ में उन्होंने कहा कि उन्होंने रिपोर्ट नहीं देखी है, लेकिन गोली तीन लगी या पाँच, यह महत्वपूर्ण नहीं है — सबसे ज़रूरी यह है कि कितनी दूरी से गोली चलाई गई।
विपक्ष और पीड़ित परिवार के आरोप
भरत तिवारी के एनकाउंटर के बाद विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने बिहार पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। पीड़ित परिवार का आरोप है कि उन्हें पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा धमकाया जा रहा है, हालाँकि पुलिस ने इस आरोप को सिरे से नकारते हुए कहा है कि परिवार के किसी सदस्य को धमकाए जाने की बात गलत है।
आगे क्या होगा
सभी पक्षों की निगाहें अब जाँच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यह मामला बिहार में पुलिस एनकाउंटर की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर व्यापक बहस का केंद्र बन गया है। जाँच के नतीजे न केवल इस मामले की दिशा तय करेंगे, बल्कि राज्य में पुलिस-प्रशासन समन्वय पर भी सवाल खड़े करेंगे।