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बिहार: छठ पर्व की खरना पूजा संपन्न, श्रद्धालुओं ने शुरू किया 36 घंटे का निर्जला व्रत

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बिहार: छठ पर्व की खरना पूजा संपन्न, श्रद्धालुओं ने शुरू किया 36 घंटे का निर्जला व्रत

सारांश

बिहार में छठ पर्व का दूसरा दिन 'खरना पूजा' के साथ आरंभ हुआ। श्रद्धालुओं ने 36 घंटे का निर्जला उपव्रत शुरू किया, जिसमें पवित्र स्नान और प्रसाद का विशेष महत्व है।

मुख्य बातें

छठ पर्व का महत्व: धार्मिक आस्था और पारंपरिक मान्यताएँ।
36 घंटे का निर्जला व्रत श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक।
प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग वातावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाता है।
खरना पूजा में प्रसाद का महत्व और उसकी तैयारी।
पारिवारिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का दृश्य।

पटना, 23 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। चैती छठ का पवित्र पर्व अपने दूसरे दिन में प्रवेश कर चुका है, जिसकी शुरुआत 'खरना पूजा' से हुई। इसके बाद श्रद्धालु 36 घंटे का 'निर्जला' (बिना पानी का) उपव्रत आरंभ करते हैं।

इस अवसर पर, भक्तों ने दूध और गुड़ से बनी रोटी और खीर का प्रसाद तैयार किया, जिसे पहले सूर्य देव को अर्पित किया गया और फिर परिवार के सदस्यों और मेहमानों के बीच वितरित किया गया। प्रसाद ग्रहण करने के बाद, भक्तों ने सुख, समृद्धि और कल्याण के लिए प्रार्थना की।

दूसरे दिन, जिसे 'लोहंडा' भी कहा जाता है, भक्तों ने नदियों, तालाबों या कुओं में पवित्र स्नान किया। इसके बाद उन्होंने अत्यंत पवित्रता और भक्ति के साथ पूजा की सामग्री तैयार की।

पटना जैसे क्षेत्रों में आध्यात्मिक वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय हो चुका है, जहां लोग व्रत रखने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए एक-दूसरे के घरों में जा रहे हैं। इसके बाद, मंगलवार को भक्त डूबते हुए सूर्य को 'अर्घ्य' देंगे। फिर बुधवार को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा और अंत में 'पारण' के साथ व्रत का समापन होगा।

इस त्योहार की शुरुआत रविवार को 'नहाय-खाय' की रस्म के साथ हुई। इस दौरान भक्तों ने कद्दू-भात (कद्दू और चावल) का सादा भोजन किया।

पवित्रता पर विशेष जोर देने वाला 'चैती छठ' त्योहार, प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल सामग्रियों के उपयोग को भी बढ़ावा देता है। बांस की टोकरियां (दौरा) और सूप (अनाज फटकने का पात्र) इस पूजा में गहरा धार्मिक महत्व रखते हैं, और इन्हें पवित्रता तथा समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

मसौढ़ी स्थित 'श्री राम जानकी ठाकुरबाड़ी मंदिर' के आचार्य गोपाल पांडे के अनुसार, हिंदू मान्यताओं में बांस को वंश-वृद्धि और विकास से जोड़ा जाता है। पांडे ने कहा कि जिस तरह बांस तेजी से बढ़ता है, उसी तरह यह किसी भी परिवार के विस्तार और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसलिए, बांस से बनी वस्तुएं शुभ मानी जाती हैं और पूजा-पाठ के दौरान अर्घ्य देने के लिए अनिवार्य होती हैं।

पटना, मुजफ्फरपुर, गया, दरभंगा और भागलपुर जैसे शहरों में भारी भीड़ देखने को मिल रही है, जहां भक्त बांस की टोकरियां, फल और पूजा-पाठ की अन्य आवश्यक सामग्री खरीद रहे हैं। इस पर्व के दौरान विशेष रूप से प्लास्टिक या धातु से बनी वस्तुओं का उपयोग करने से बचा जाता है, जिससे इस पर्व का पर्यावरण-अनुकूल और पारंपरिक स्वरूप और भी सुदृढ़ होता है।

'चैती छठ' लोक-आस्था पर आधारित सबसे प्रतिष्ठित त्योहारों में से एक है। इस पर्व में कठोर अनुशासन, पवित्रता और भक्ति ही पूजा-पाठ का मूल आधार होते हैं, जो पूरे क्षेत्र में आध्यात्मिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का अद्भुत वातावरण निर्मित करते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ाता है। इस पर्व के दौरान प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग करना और पवित्रता बनाए रखना भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

छठ पर्व कब मनाया जाता है?
छठ पर्व मुख्यतः कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।
खरना पूजा का क्या महत्व है?
खरना पूजा के दिन भक्त दूध और गुड़ से बने प्रसाद का भोग लगाते हैं और फिर व्रत का आरंभ करते हैं।
निर्जला व्रत क्या होता है?
निर्जला व्रत का अर्थ है कि भक्त 36 घंटे तक बिना पानी के उपव्रत रखते हैं।
छठ पर्व में किन सामग्रियों का उपयोग किया जाता है?
छठ पर्व में मुख्यतः बांस की टोकरियों, फल, और पूजा सामग्री का उपयोग किया जाता है।
छठ पर्व का सांस्कृतिक महत्व क्या है?
यह पर्व परिवार की एकता, समृद्धि और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने का प्रतीक है।
राष्ट्र प्रेस
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