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कर्नाटक पीआरसी योजना पर भाजपा का कड़ा विरोध: आर. अशोक ने कानूनी आधार सार्वजनिक करने की मांग की

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कर्नाटक पीआरसी योजना पर भाजपा का कड़ा विरोध: आर. अशोक ने कानूनी आधार सार्वजनिक करने की मांग की

सारांश

कर्नाटक में मुख्यमंत्री शिवकुमार द्वारा पीआरसी योजना शुरू करते ही BJP नेता आर. अशोक ने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र, राष्ट्रीय सुरक्षा और मतदाता सूची संशोधन के बीच इसके समय पर गंभीर सवाल उठाए हैं — और कानूनी व राजनीतिक दोनों मोर्चों पर लड़ाई का ऐलान किया है।

मुख्य बातें

अशोक ने 20 जुलाई 2026 को कर्नाटक सरकार की पीआरसी योजना का कड़ा विरोध किया।
पीआरसी चुनाव आयोग द्वारा मान्य 11 दस्तावेजों में शामिल है, जो मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए वैध हैं।
अशोक का आरोप — नागरिकता और आव्रजन केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं, राज्य सरकार ने संवैधानिक सीमाएँ लाँघी हैं।
योजना का समय संदिग्ध — देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) अभियान के दौरान शुरुआत।
BJP ने राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर विरोध की चेतावनी दी; सरकार से पूरी नीति सार्वजनिक करने की माँग।

कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता और वरिष्ठ भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता आर. अशोक ने 20 जुलाई 2026 को बेंगलुरु में राज्य सरकार की घर-घर जाकर स्थायी निवास प्रमाण पत्र (पीआरसी) वितरित करने की योजना पर तीखी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि यह पहल संवैधानिक, कानूनी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल उठाती है। यह बयान उसी दिन आया जब मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इस योजना का औपचारिक शुभारंभ किया।

पीआरसी योजना पर मुख्य आपत्तियाँ

अशोक ने कहा कि स्थायी निवास प्रमाण पत्र उन 11 दस्तावेजों में शामिल है जिन्हें चुनाव आयोग (ECI) मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए वैध मानता है। उन्होंने सवाल किया कि राज्य सरकार को ऐसे प्रमाण पत्र जारी करने का संवैधानिक अधिकार किस प्रावधान के तहत प्राप्त है। उनकी माँग है कि जब तक इसका कानूनी आधार सार्वजनिक नहीं किया जाता, तब तक योजना को तत्काल स्थगित किया जाए।

अशोक ने अपने बयान में कहा, 'कर्नाटक सरकार ने एक खतरनाक संवैधानिक कदम उठाया है। यह कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया या सुधार नहीं है। इससे संविधान, कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल खड़े होते हैं, जिनका असर सिर्फ कर्नाटक ही नहीं, बल्कि पूरे देश पर पड़ सकता है।'

संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का सवाल

BJP नेता ने तर्क दिया कि संविधान के अनुसार नागरिकता, विदेशियों और आव्रजन से जुड़े मामले केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उनके अनुसार, कर्नाटक सरकार ने एक कार्यकारी आदेश के ज़रिए इन संवैधानिक सीमाओं को लाँघने की कोशिश की है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम राज्य के अधिकार क्षेत्र से परे जाकर उठाया गया है और इससे देश के संघीय ढाँचे पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

मतदाता सूची संशोधन के दौरान योजना के समय पर सवाल

अशोक ने इस पहल के समय को लेकर भी गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब पूरे देश में चुनाव आयोग मतदाता सूची का विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) अभियान चला रहा है। उन्होंने पूछा कि इतनी जल्दबाज़ी में पूरे राज्य में पीआरसी योजना शुरू करने की ज़रूरत क्यों पड़ी और इससे किसे फायदा होगा।

राष्ट्रीय सुरक्षा और दुरुपयोग की आशंका

अशोक ने चेतावनी दी कि बिना स्पष्ट संवैधानिक अधिकार और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के ऐसी योजना लागू करने से फर्जी दस्तावेज बनने और सरकारी व्यवस्था के दुरुपयोग का खतरा बढ़ सकता है। उनके अनुसार, पारदर्शिता और सार्वजनिक निगरानी के अभाव में यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी जोखिम पैदा कर सकती है।

BJP का आगे का रुख

अशोक ने स्पष्ट किया कि अगर राज्य सरकार उठाई गई चिंताओं पर ध्यान दिए बिना आगे बढ़ती है, तो BJP इस योजना का राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर विरोध करेगी। उन्होंने सरकार से माँग की कि वह तुरंत इस प्रक्रिया को रोके, पूरी नीति सार्वजनिक करे और यह स्पष्ट करे कि वह किस कानूनी अधिकार के तहत आगे बढ़ना चाहती है। गौरतलब है कि इस मुद्दे पर राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जिससे विवाद और गहरा होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी असली परत राजनीतिक है — मतदाता सूची संशोधन के ठीक बीच यह विवाद अकारण नहीं उठा। हालाँकि अशोक का संवैधानिक तर्क — कि नागरिकता और आव्रजन केंद्र के अधिकार क्षेत्र में हैं — कानूनी दृष्टि से जाँच का हकदार है, लेकिन राज्य सरकार ने अब तक इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया, जो पारदर्शिता की कमी को रेखांकित करता है। असली सवाल यह है कि क्या पीआरसी वास्तव में संघीय ढाँचे को चुनौती देती है या यह एक प्रशासनिक सुविधा है जिसे राजनीतिक रंग दिया जा रहा है — इसका जवाब तब मिलेगा जब सरकार पूरी नीति सार्वजनिक करे।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्नाटक की पीआरसी योजना क्या है?
स्थायी निवास प्रमाण पत्र (पीआरसी) योजना के तहत कर्नाटक सरकार घर-घर जाकर निवासियों को यह प्रमाण पत्र वितरित कर रही है। इसका शुभारंभ मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने 20 जुलाई 2026 को किया।
BJP को पीआरसी योजना से क्या आपत्ति है?
BJP नेता आर. अशोक का कहना है कि पीआरसी चुनाव आयोग द्वारा मान्य 11 दस्तावेजों में शामिल है, जिससे मतदाता सूची में नाम दर्ज हो सकता है। उनके अनुसार नागरिकता और आव्रजन केंद्र के अधिकार क्षेत्र में हैं, इसलिए राज्य सरकार को ऐसे प्रमाण पत्र जारी करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है।
पीआरसी योजना के समय पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
यह योजना ऐसे समय में शुरू की गई है जब पूरे देश में चुनाव आयोग मतदाता सूची का विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) अभियान चला रहा है। अशोक ने सवाल किया है कि इस संवेदनशील दौर में राज्य सरकार ने इतनी जल्दबाज़ी में यह कदम क्यों उठाया।
BJP इस योजना के खिलाफ क्या कदम उठाएगी?
आर. अशोक ने स्पष्ट किया है कि BJP इस योजना का राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर विरोध करेगी। उन्होंने सरकार से माँग की है कि वह योजना तत्काल रोके और पूरी नीति का कानूनी आधार सार्वजनिक करे।
कर्नाटक सरकार ने इन आरोपों पर क्या कहा?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 20 जुलाई 2026 तक कर्नाटक सरकार की ओर से BJP की आपत्तियों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
राष्ट्र प्रेस
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