14 जुलाई 2026
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ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान: पाकिस्तान का प्रस्ताव ठुकराकर भारत के लिए शहीद हुए 'नौशेरा के शेर'

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ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान: पाकिस्तान का प्रस्ताव ठुकराकर भारत के लिए शहीद हुए 'नौशेरा के शेर'

सारांश

पाकिस्तान का उच्च पद ठुकराकर भारत को चुनने वाले ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने नौशेरा में 2,000 दुश्मन सैनिकों को परास्त किया। दुश्मन ने उनके सिर पर ₹50,000 का इनाम रखा, पर वे झुके नहीं — 3 जुलाई 1948 को मोर्चे पर शहीद हुए और 'नौशेरा के शेर' कहलाए।

मुख्य बातें

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जन्म 15 जुलाई 1912 को मऊ जिले , संयुक्त प्रांत में हुआ था।
उन्होंने 1947 में विभाजन के समय पाकिस्तानी सेना में उच्च पद का प्रस्ताव अस्वीकार कर भारत की सेवा को चुना।
नौशेरा की लड़ाई में करीब 2,000 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए; भारतीय पक्ष में केवल 33 जवान शहीद हुए।
पाकिस्तानी सेना ने उस्मान का सिर लाने वाले को ₹50,000 के इनाम की घोषणा की थी।
3 जुलाई 1948 को जम्मू-कश्मीर मोर्चे पर दुश्मन की गोलाबारी में वीरगति को प्राप्त हुए।
मरणोपरांत महावीर चक्र — भारत के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार — से सम्मानित किया गया।

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान भारतीय सेना के उन अमर योद्धाओं में से एक हैं, जिन्होंने 1947–48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जम्मू-कश्मीर की धरती पर अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। 15 जुलाई 1912 को जन्मे उस्मान ने विभाजन के समय पाकिस्तानी सेना में उच्च पद का प्रस्ताव ठुकराकर भारत की सेवा को चुना — और 3 जुलाई 1948 को मोर्चे पर दुश्मन की गोलाबारी में वीरगति को प्राप्त हुए। मरणोपरांत उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च वीरता सम्मान महावीर चक्र से नवाज़ा गया।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य करियर

ब्रिगेडियर उस्मान का जन्म ब्रिटिश भारत के संयुक्त प्रांत के मऊ जिले के गाँव बीबीपुर में हुआ था। उनके पिता पुलिस अधिकारी थे, और बचपन से ही उस्मान ने सेना में जाने का संकल्प ले लिया था। भारतीयों के लिए कमीशन रैंक पाने के सीमित अवसरों और कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद वे प्रतिष्ठित रॉयल मिलिट्री एकेडमी (RMAS) में प्रवेश पाने में सफल रहे।

उन्होंने 19 मार्च 1935 को भारतीय सेना में प्रवेश किया और 10वीं बलूच रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में तैनात हुए। 30 अप्रैल 1936 को लेफ्टिनेंट और 31 अगस्त 1941 को कैप्टन के पद पर पदोन्नत किए गए। 1942 में उन्होंने क्वेटा स्थित भारतीय सेना के स्टाफ कॉलेज में प्रशिक्षण लिया। अप्रैल 1944 तक वे अस्थायी मेजर के रूप में सेवारत थे, और अप्रैल 1945 से अप्रैल 1946 तक उन्होंने 10वीं बलूच रेजिमेंट की 14वीं बटालियन की कमान संभाली।

पाकिस्तान का प्रस्ताव और राष्ट्रनिष्ठा का परीक्षण

1947 में भारत विभाजन के समय सैन्य अधिकारियों को दोनों देशों में से एक चुनना था। ब्रिगेडियर उस्मान को पाकिस्तानी सेना में उच्च पद और आकर्षक सुविधाओं का प्रस्ताव दिया गया। उन्होंने इसे दृढ़तापूर्वक अस्वीकार कर दिया और भारत की सेवा को प्राथमिकता दी। यह निर्णय उनके अटूट राष्ट्रप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा का प्रमाण बना।

गौरतलब है कि यह वह दौर था जब सांप्रदायिक हिंसा और विभाजन की पीड़ा के बीच अनेक अधिकारी धर्म के आधार पर पाकिस्तान चले गए थे। उस्मान का भारत के साथ खड़े रहना इतिहास में एक असाधारण उदाहरण के रूप में दर्ज है।

नौशेरा की लड़ाई: 'नौशेरा के शेर' का उदय

1947–48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में ब्रिगेडियर उस्मान ने जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर की रक्षा का नेतृत्व किया। पाकिस्तान-समर्थित कबायली लड़ाकों और सैनिकों ने इस क्षेत्र पर कब्ज़े के लिए लगातार हमले किए, लेकिन उस्मान की सूझबूझ और साहस के सामने हर आक्रमण विफल रहा।

इस लड़ाई में करीब 2,000 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, जबकि भारतीय पक्ष में केवल 33 जवान शहीद और 102 जवान घायल हुए। इस निर्णायक विजय ने युद्ध की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी शौर्य के कारण उन्हें 'नौशेरा का शेर' की उपाधि मिली। नौशेरा की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी सेना ने उस्मान का सिर काटकर लाने वाले को ₹50,000 के इनाम का ऐलान किया था — यह इस बात का प्रमाण था कि दुश्मन उनसे कितना भयभीत था।

ब्रिगेडियर उस्मान ने प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक झांगर को पाकिस्तानी कब्ज़े से मुक्त नहीं करा लेंगे, चैन से नहीं बैठेंगे।

शहादत और राष्ट्रीय सम्मान

3 जुलाई 1948 को जम्मू-कश्मीर में मोर्चे पर तैनात रहते हुए दुश्मन की गोलाबारी में ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान वीरगति को प्राप्त हुए। वे स्वतंत्र भारत के सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों में से एक थे जिन्होंने रणभूमि में प्राण न्यौछावर किए। उनकी शहादत ने पूरे देश को भावुक कर दिया।

मरणोपरांत उन्हें महावीर चक्र — भारत के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार — से सम्मानित किया गया। उनका बलिदान आज भी भारतीय सेना की परंपरा और राष्ट्रनिष्ठा का प्रतीक है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस भारत की आत्मा है जिसे विभाजन की आँधी भी नहीं डिगा सकी। जब धर्म के नाम पर सीमाएँ खिंच रही थीं, तब एक मुस्लिम अधिकारी ने पाकिस्तान का प्रलोभन ठुकराकर साबित किया कि राष्ट्रनिष्ठा किसी पहचान से बड़ी होती है। दुर्भाग्यवश, मुख्यधारा की कवरेज अक्सर उनके जन्मदिन पर औपचारिक श्रद्धांजलि तक सिमट जाती है — उस रणनीतिक महत्व पर कम ध्यान जाता है जो नौशेरा की जीत ने कश्मीर अभियान को दिया था। उनका बलिदान आज के राजनीतिक विमर्श में और भी प्रासंगिक है, जब राष्ट्रीय पहचान और धर्म को लेकर बहसें तेज़ हैं।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को 'नौशेरा का शेर' क्यों कहा जाता है?
1947–48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में ब्रिगेडियर उस्मान ने जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर की रक्षा करते हुए पाकिस्तान-समर्थित लगभग 2,000 सैनिकों को परास्त किया। उनकी इसी अदम्य वीरता और नेतृत्व के कारण उन्हें 'नौशेरा का शेर' की उपाधि दी गई।
ब्रिगेडियर उस्मान ने पाकिस्तान का प्रस्ताव क्यों ठुकराया?
1947 में विभाजन के समय उन्हें पाकिस्तानी सेना में उच्च पद और सुविधाओं का प्रस्ताव दिया गया था। उन्होंने इसे अस्वीकार कर भारत की सेवा को चुना, जो उनके गहरे राष्ट्रप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा का प्रमाण था।
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की शहादत कब और कैसे हुई?
3 जुलाई 1948 को जम्मू-कश्मीर में मोर्चे पर तैनात रहते हुए दुश्मन की गोलाबारी में ब्रिगेडियर उस्मान वीरगति को प्राप्त हुए। वे स्वतंत्र भारत के सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों में से एक थे जिन्होंने रणभूमि में प्राण न्यौछावर किए।
ब्रिगेडियर उस्मान को कौन-सा वीरता पुरस्कार मिला?
मरणोपरांत उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह सम्मान नौशेरा की लड़ाई में उनके असाधारण नेतृत्व और साहस के लिए दिया गया।
नौशेरा की लड़ाई में पाकिस्तान ने ब्रिगेडियर उस्मान पर क्या इनाम रखा था?
नौशेरा की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी सेना ने ब्रिगेडियर उस्मान का सिर काटकर लाने वाले को ₹50,000 के इनाम की घोषणा की थी। यह इस बात का प्रमाण था कि दुश्मन उनकी रणनीतिक क्षमता और नेतृत्व से कितना भयभीत था।
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