केज-फ्री अंडा उत्पादन से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 60% तक बढ़ सकता है: ऑक्सफोर्ड शोध
सारांश
मुख्य बातें
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में हुए एक नए अध्ययन के अनुसार, केज-फ्री और फ्री-रेंज तरीके से अंडा उत्पादन — जिसे पशु कल्याण के लिहाज से बेहतर माना जाता है — पर्यावरण पर उल्लेखनीय रूप से अधिक बोझ डाल सकता है। शोध में पाया गया कि यदि पूरी तरह फ्री-रेंज और ऑर्गेनिक प्रणाली अपनाई जाए, तो मौजूदा व्यवस्था की तुलना में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन लगभग 60 प्रतिशत तक बढ़ सकता है और इसके लिए लगभग दोगुनी भूमि की आवश्यकता पड़ेगी।
अध्ययन की पृष्ठभूमि और कार्यप्रणाली
यह अध्ययन यूनाइटेड किंगडम (यूके) के आंकड़ों पर आधारित है और इसमें अंडा उत्पादन के चार प्रमुख मॉडलों की तुलना की गई — पारंपरिक केज सिस्टम, बार्न सिस्टम, फ्री-रेंज और ऑर्गेनिक फार्मिंग। तुलना को निष्पक्ष रखने के लिए सभी प्रणालियों में अंडों का उत्पादन स्तर समान रखा गया। शोध के प्रमुख लेखक ओलिवर मार्टिनिक, क्रोएशिया के एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं, और अध्ययन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्मिथ स्कूल ऑफ एंटरप्राइज एंड द एनवायरमेंट की वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. हैरियट बार्टलेट भी शामिल रहीं।
गौरतलब है कि इस अध्ययन में उपयोग किए गए आंकड़े 2009-10 के हैं। शोधकर्ताओं ने स्वयं स्वीकार किया कि तब से खेती और पशुपालन की तकनीकों में काफी सुधार हुआ है। फिर भी, ये आंकड़े यूके की लेयर मुर्गी उत्पादन प्रणाली पर उपलब्ध सबसे व्यापक और विश्वसनीय डेटा माने जाते हैं।
मुख्य निष्कर्ष: पर्यावरणीय लागत
शोध के अनुसार, वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला मानव गतिविधियों से होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा है। इसके अलावा जल स्रोतों में अत्यधिक पोषक तत्वों के पहुंचने (यूट्रोफिकेशन) की 78 प्रतिशत और मिट्टी के अम्लीकरण (टेरेस्ट्रियल एसिडिफिकेशन) की 32 प्रतिशत समस्या भी खाद्य उत्पादन से जुड़ी है।
यह ऐसे समय में आया है जब पिछले 50 वर्षों में दुनिया भर में अंडों का उत्पादन चार गुना बढ़ चुका है, जिससे इस उद्योग का पर्यावरणीय प्रभाव भी लगातार गहरा होता जा रहा है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि पूरी तरह फ्री-रेंज और ऑर्गेनिक प्रणालियों में मुर्गियों की मृत्यु दर अपेक्षाकृत अधिक रही — जो पशु कल्याण के दृष्टिकोण से भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
डॉ. हैरियट बार्टलेट ने कहा कि भविष्य की अंडा उत्पादन व्यवस्था तय करते समय केवल पशु कल्याण को ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और खाद्य उत्पादन — तीनों पहलुओं को साथ लेकर चलना होगा। उनके अनुसार, इन जटिल संतुलनों को समझना ही बेहतर और टिकाऊ नीतिगत फैसले लेने की कुंजी है।
प्रमुख शोधकर्ता ओलिवर मार्टिनिक ने कहा कि दुनिया भर में पिंजरों में मुर्गियाँ पालने की व्यवस्था समाप्त करने की माँग लगातार बढ़ रही है और पशु अधिकारों की यह चिंता पूरी तरह उचित भी है। लेकिन उनके मुताबिक, यदि बिना सभी पहलुओं पर विचार किए बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए, तो इसके कुछ अनचाहे परिणाम भी सामने आ सकते हैं।
आगे की राह: संतुलित नीति की ज़रूरत
यह शोध नीति-निर्माताओं, उपभोक्ताओं और खाद्य उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया है — कि पशु कल्याण और पर्यावरण संरक्षण, दोनों लक्ष्यों को एक साथ साधने के लिए अधिक समग्र और विज्ञान-आधारित दृष्टिकोण अपनाना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी नवाचार और बेहतर फार्म प्रबंधन के ज़रिए इस संतुलन को हासिल करना संभव है, बशर्ते निर्णय केवल भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि समग्र साक्ष्यों के आधार पर लिए जाएँ।