31 जुलाई 2026
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सीआईपी रांची को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित करे केंद्र — राज्यसभा में सांसद प्रदीप वर्मा की मांग

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सीआईपी रांची को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित करे केंद्र — राज्यसभा में सांसद प्रदीप वर्मा की मांग

सारांश

108 वर्ष पुराना सीआईपी रांची हर साल 1.17 लाख मरीज़ों की सेवा करता है — फिर भी उसे निमहांस और एम्स जैसी स्वायत्तता नहीं मिली। राज्यसभा सांसद डॉ. प्रदीप वर्मा ने यह खाई पाटने की माँग उठाई है, साथ ही 339 एकड़ से अधिक 'लापता' भूमि की स्वतंत्र जाँच की भी।

मुख्य बातें

झारखंड से राज्यसभा सांसद डॉ.
प्रदीप कुमार वर्मा ने 31 जुलाई 2026 को शून्यकाल में सीआईपी रांची को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित करने की माँग उठाई।
वर्ष 1918 में स्थापित सीआईपी में प्रतिवर्ष 1.17 लाख से अधिक मरीज़ों का इलाज होता है; लगभग 80% मरीज़ SC/ST/OBC वर्ग से हैं।
एनसीआरबी 2024 के अनुसार देश में 1,70,746 आत्महत्या के मामले दर्ज — मानसिक स्वास्थ्य संकट हर वर्ग को प्रभावित कर रहा है।
संसदीय स्थायी समिति की 148वीं रिपोर्ट में भी सीआईपी को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा देने की सिफारिश की जा चुकी है।
सीआईपी और रिनपास की भूमि के अभिलेखों में 339.302 एकड़ का अंतर; सांसद ने स्वतंत्र जाँच की माँग की।

झारखंड से राज्यसभा सांसद डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा ने 31 जुलाई 2026 को राज्यसभा के शून्यकाल में रांची स्थित केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान (सीआईपी) को संसद के पृथक अधिनियम के ज़रिए राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित करने की माँग उठाई। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि 108 वर्ष पुराने इस संस्थान को वैधानिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करने के लिए समयबद्ध पहल की जाए।

सीआईपी की स्थापना और महत्व

वर्ष 1918 में स्थापित सीआईपी देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में गिना जाता है। यह संस्थान मानसिक रोगों के उपचार के अतिरिक्त मनोचिकित्सा, नैदानिक मनोविज्ञान, मनोचिकित्सीय सामाजिक कार्य, नर्सिंग, पुनर्वास, तंत्रिका विज्ञान और जन-मानसिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहा है।

डॉ. वर्मा ने सदन को बताया कि संस्थान में प्रतिवर्ष 1.17 लाख से अधिक मरीज़ों का इलाज होता है, जिनमें लगभग 80 प्रतिशत मरीज़ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं। यह आँकड़ा इस संस्थान की सामाजिक प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।

मानसिक स्वास्थ्य संकट के राष्ट्रीय आँकड़े

सांसद ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट 'एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया-2024' का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2024 में देशभर में 1,70,746 आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए।

इनमें 52,910 दिहाड़ी मज़दूर, 22,113 गृहिणियाँ, 17,886 स्वरोज़गार से जुड़े लोग, 16,905 वेतनभोगी एवं पेशेवर, 14,778 बेरोज़गार, 14,488 विद्यार्थी, 12,811 निजी क्षेत्र के कर्मचारी, 11,015 व्यवसायी और 10,546 कृषि क्षेत्र से जुड़े लोग शामिल थे। डॉ. वर्मा के अनुसार ये आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य का संकट समाज के लगभग हर वर्ग को प्रभावित कर रहा है।

संसदीय समिति की सिफारिश

डॉ. वर्मा ने यह भी बताया कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी विभागीय संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 148वीं रिपोर्ट 'मेंटल हेल्थ केयर एंड इट्स मैनेजमेंट इन कंटेम्पररी टाइम्स' में भी सीआईपी को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित करने की सिफारिश की है। उन्होंने तर्क दिया कि संसद पूर्व में निमहांस और एम्स जैसे संस्थानों को पृथक कानून बनाकर यह दर्जा दे चुकी है, और सीआईपी के साथ भी इसी तर्ज पर व्यवहार किया जाना चाहिए।

भूमि विवाद की जाँच की माँग

सांसद ने सीआईपी और रिनपास (RINPAS) की भूमि से जुड़ा एक अहम मुद्दा भी उठाया। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार दोनों संस्थानों के पास वर्तमान में कुल 552.23 एकड़ भूमि दर्ज है, जबकि पुराने गजट और भूमि अभिलेखों में 891.532 एकड़ भूमि का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार दोनों आँकड़ों के बीच 339.302 एकड़ भूमि का अंतर है, जिसकी स्वतंत्र जाँच कराने की उन्होंने माँग की।

आगे की राह

यह ऐसे समय में आया है जब देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की माँग लगातार बढ़ रही है और विशेषज्ञ संस्थानों की कमी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। गौरतलब है कि यदि केंद्र सरकार इस माँग पर सकारात्मक कदम उठाती है, तो सीआईपी को मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षण, प्रशिक्षण, अनुसंधान और रोगी देखभाल के क्षेत्र में व्यापक स्वायत्तता मिलेगी, जो इसकी सेवा क्षमता को कई गुना बढ़ा सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

एनसीआरबी के चौंकाने वाले आँकड़े और एम्स-निमहांस जैसी मिसालें — तीनों मिलकर सीआईपी के लिए एक मज़बूत तर्क बनाते हैं, फिर भी यह माँग वर्षों से लंबित है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार केवल शून्यकाल की सुनवाई से आगे बढ़कर विधायी कार्रवाई करेगी। भूमि विवाद का मुद्दा और भी गंभीर है — 339 एकड़ से अधिक की 'अदृश्य' ज़मीन का जवाब सरकारी अभिलेखों में होना चाहिए, और इसकी जाँच में देरी संस्थागत जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान (सीआईपी) रांची क्या है?
सीआईपी रांची वर्ष 1918 में स्थापित देश का एक प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य संस्थान है, जो मनोचिकित्सा, नैदानिक मनोविज्ञान, तंत्रिका विज्ञान और पुनर्वास के क्षेत्र में सेवाएँ देता है। यहाँ प्रतिवर्ष 1.17 लाख से अधिक मरीज़ों का उपचार होता है, जिनमें लगभग 80% SC/ST/OBC वर्ग से हैं।
सांसद डॉ. प्रदीप वर्मा ने राज्यसभा में क्या माँग उठाई?
डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा ने 31 जुलाई 2026 को राज्यसभा के शून्यकाल में माँग की कि केंद्र सरकार संसद के पृथक अधिनियम के ज़रिए सीआईपी रांची को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित करे और उसे वैधानिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक व वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करे।
संसदीय समिति ने सीआईपी के बारे में क्या सिफारिश की है?
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी विभागीय संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 148वीं रिपोर्ट 'मेंटल हेल्थ केयर एंड इट्स मैनेजमेंट इन कंटेम्पररी टाइम्स' में सीआईपी को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित करने की सिफारिश की है। यह सिफारिश सांसद की माँग को संसदीय समर्थन देती है।
सीआईपी और रिनपास की भूमि विवाद क्या है?
वर्तमान अभिलेखों में सीआईपी और रिनपास के पास कुल 552.23 एकड़ भूमि दर्ज है, जबकि पुराने गजट और भूमि अभिलेखों में 891.532 एकड़ का उल्लेख है। इस प्रकार 339.302 एकड़ भूमि के अंतर की स्वतंत्र जाँच की माँग सांसद ने राज्यसभा में उठाई।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट कितना गंभीर है?
एनसीआरबी की 'एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया-2024' रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में देश में 1,70,746 आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए। इनमें दिहाड़ी मज़दूरों से लेकर विद्यार्थियों, गृहिणियों और व्यवसायियों तक — समाज का हर वर्ग प्रभावित है।
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