26 अक्टूबर 2026
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रीवा में टाटा पावर परमाणु परियोजना: ग्राम सभा के विरोध के बावजूद NOC जारी होने पर कांग्रेस का हमला

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रीवा में टाटा पावर परमाणु परियोजना: ग्राम सभा के विरोध के बावजूद NOC जारी होने पर कांग्रेस का हमला

सारांश

रीवा में टाटा पावर की 440 MW परमाणु परियोजना के लिए ग्राम सभा के स्पष्ट इनकार के बावजूद NOC जारी होने का आरोप — कांग्रेस ने दस्तावेज़ी विरोधाभास उजागर किए और आदिवासी सरपंच की शिकायत का हवाला दिया। सवाल सिर्फ एक परियोजना का नहीं, आदिवासी सहमति के संवैधानिक अधिकार का है।

मुख्य बातें

कांग्रेस नेता उमंग सिंघार ने 26 अक्टूबर 2026 को आरोप लगाया कि रीवा के रोजहौही-सरई कला क्षेत्र में ग्राम सभा के इनकार के बाद भी NOC जारी की गई।
3 सितंबर को ग्राम सभा ने सर्वसम्मति से ड्रिलिंग अनुमति से इनकार किया; 5 सितंबर को कलेक्टर को सूचित किया गया।
23 सितंबर को NOC जारी हुई, जिसमें कथित तौर पर 4 सितंबर के सहमति-पत्र का हवाला दिया गया।
सरपंच कोमल संजय सिंह ने 8 अक्टूबर को संभागीय आयुक्त से सहमति-पत्र की जाँच और NOC रद्द करने की माँग की।
परियोजना में 220-220 मेगावाट की दो परमाणु इकाइयाँ प्रस्तावित हैं; आदिवासी महिला विमला कोल की आंदोलन के दौरान मृत्यु का भी उल्लेख किया गया।
सिंघार ने EIA, भूकंपीय जोखिम अध्ययन और जल उपलब्धता आकलन के पूरा होने की स्थिति भी सार्वजनिक करने की माँग की।

मध्य प्रदेश के रीवा जिले में टाटा पावर की प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजना के लिए प्रारंभिक ड्रिलिंग की अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी किए जाने पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) ने 26 अक्टूबर 2026 को सोमवार को तीखा विरोध दर्ज कराया। पार्टी का आरोप है कि यह अनुमति रोजहौही-सरई कला क्षेत्र की ग्राम सभा द्वारा सर्वसम्मति से इनकार किए जाने के बावजूद दी गई। यह मामला अब आदिवासी अधिकार, पर्यावरणीय मंजूरी और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही का गंभीर सवाल बन चुका है।

मुख्य घटनाक्रम

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भोपाल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यह मुद्दा उठाया। उन्होंने एक दिन पहले प्रस्तावित परियोजना स्थल का दौरा कर वहाँ आंदोलनरत आदिवासी ग्रामीणों से मुलाकात की थी।

सिंघार के अनुसार, 3 सितंबर को ग्राम सभा ने ड्रिलिंग की अनुमति देने से सर्वसम्मति से इनकार किया था। इसके बाद 5 सितंबर को ग्राम पंचायत ने पत्र के ज़रिए जिला कलेक्टर को यह निर्णय औपचारिक रूप से सूचित कर दिया था। इसके बावजूद 23 सितंबर को NOC जारी कर दिया गया, जिसमें कथित तौर पर 4 सितंबर के एक सहमति-पत्र का हवाला दिया गया है।

सिंघार ने सवाल किया, 'जब ग्राम सभा ने स्पष्ट रूप से सहमति देने से इनकार कर दिया था, तो फिर NOC किस आधार पर जारी किया गया? सरकार को इसकी परिस्थितियों की जानकारी देनी चाहिए और संबंधित दस्तावेज़ सार्वजनिक करने चाहिए।'

सरपंच की शिकायत और जाँच की माँग

सरपंच कोमल संजय सिंह ने 8 अक्टूबर को संभागीय आयुक्त और जिला कलेक्टर से संपर्क कर कथित सहमति-पत्र की सत्यता की जाँच कराने और NOC रद्द करने की माँग की थी। गौरतलब है कि यह मामला उस समय और पेचीदा हो जाता है जब दो परस्पर विरोधाभासी दस्तावेज़ — ग्राम सभा का इनकार और NOC में संदर्भित सहमति-पत्र — सरकारी रिकॉर्ड में एक साथ मौजूद बताए जा रहे हैं।

सिंघार ने सरकार से माँग की कि वह स्पष्ट करे कि परियोजना के लिए आवश्यक पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA), भूकंपीय जोखिम अध्ययन और जल उपलब्धता का आकलन पूरा किया गया है या नहीं।

प्रस्तावित परियोजना और स्थानीय विरोध

प्रस्तावित परियोजना में 220-220 मेगावाट की दो परमाणु ऊर्जा इकाइयों की स्थापना की योजना है। स्थानीय निवासी — जिनमें आदिवासी परिवार, छोटे किसान और कृषि मज़दूर शामिल हैं — सुरक्षा, पानी की उपलब्धता, कृषि आजीविका और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं।

सिंघार ने आंदोलन के दौरान आदिवासी महिला विमला कोल की मृत्यु का भी उल्लेख किया और प्रदर्शनकारियों की चिंताओं पर गंभीरता से ध्यान देने की माँग की। यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में परमाणु परियोजनाओं को लेकर सामुदायिक सहमति और PESA अधिनियम के तहत ग्राम सभाओं की शक्तियों पर बहस तेज़ हो रही है।

आम जनता और पर्यावरण पर असर

सिंघार ने आपदा प्रबंधन की तैयारियों, प्रस्तावित रिएक्टरों के स्थान और सुरक्षा क्षेत्र के दायरे में आने वाले गाँवों तथा परिवारों की संख्या की जानकारी भी माँगी। उन्होंने कहा, 'सरकार को बताना चाहिए कि आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी और आदिवासी परिवारों तथा किसानों के हितों की रक्षा किस प्रकार होगी।'

उन्होंने एक तीखा सवाल भी उठाया: 'जहाँ दूषित पानी पीने से लोगों की मौत हो जाती है और ज़हरीले कफ सिरप से मासूम बच्चों की जान चली जाती है, वहाँ सरकार परमाणु ऊर्जा संयंत्र की सुरक्षा की गारंटी कैसे दे सकती है?'

क्या होगा आगे

फिलहाल मध्य प्रदेश सरकार और टाटा पावर की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। NOC की वैधता और कथित सहमति-पत्र की प्रामाणिकता की जाँच की माँग के साथ यह विवाद अदालत या विधानसभा में बड़ा मुद्दा बन सकता है। प्रभावित ग्रामीणों और आदिवासी संगठनों का आंदोलन जारी रहने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो यह प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि दस्तावेज़ी गड़बड़ी का गंभीर मामला है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर टिकी रहती है, जबकि असली सवाल यह है कि EIA, भूकंपीय अध्ययन और विस्थापन योजना — जो किसी भी परमाणु स्थल के लिए अनिवार्य हैं — पूरे हुए हैं या नहीं। टाटा पावर और राज्य सरकार की चुप्पी इस संदेह को और गहरा करती है।
RashtraPress
26 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रीवा में टाटा पावर की परमाणु ऊर्जा परियोजना क्या है?
यह मध्य प्रदेश के रीवा जिले के रोजहौही-सरई कला क्षेत्र में टाटा पावर द्वारा प्रस्तावित परियोजना है, जिसमें 220-220 मेगावाट की दो परमाणु ऊर्जा इकाइयाँ स्थापित करने की योजना है। फिलहाल प्रारंभिक ड्रिलिंग के लिए NOC जारी की गई है, जो विवाद का केंद्र बनी है।
ग्राम सभा और NOC के बीच विरोधाभास क्या है?
कांग्रेस के अनुसार, 3 सितंबर को ग्राम सभा ने ड्रिलिंग से इनकार किया और 5 सितंबर को कलेक्टर को सूचित किया, लेकिन 23 सितंबर को जारी NOC में 4 सितंबर के एक सहमति-पत्र का हवाला दिया गया है। यह दस्तावेज़ी विरोधाभास ही मुख्य विवाद का आधार है।
सरपंच ने क्या माँग की है?
सरपंच कोमल संजय सिंह ने 8 अक्टूबर को संभागीय आयुक्त और जिला कलेक्टर से कथित सहमति-पत्र की सत्यता की जाँच कराने और NOC रद्द करने की माँग की थी। अब तक प्रशासन की ओर से कोई सार्वजनिक कार्रवाई की जानकारी नहीं है।
स्थानीय निवासी परियोजना का विरोध क्यों कर रहे हैं?
आदिवासी परिवार, छोटे किसान और कृषि मज़दूर सुरक्षा जोखिम, पानी की उपलब्धता, कृषि आजीविका पर असर और पर्यावरणीय नुकसान को लेकर इस परियोजना के विरोध में हैं। आंदोलन के दौरान आदिवासी महिला विमला कोल की मृत्यु ने विरोध को और तीव्र किया है।
कांग्रेस ने सरकार से कौन-कौन से दस्तावेज़ माँगे हैं?
कांग्रेस ने पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA), भूकंपीय जोखिम अध्ययन, जल उपलब्धता आकलन, आपदा प्रबंधन योजना, सुरक्षा क्षेत्र में आने वाले गाँवों की संख्या और कथित सहमति-पत्र की मूल प्रति सार्वजनिक करने की माँग की है।
राष्ट्र प्रेस
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