मानसून सत्र में जनहित मुद्दों पर चर्चा की मांग, सीपीआई ने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा माँगा
सारांश
मुख्य बातें
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) ने 19 जुलाई को संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक में केंद्र सरकार से जनहित के अहम मुद्दों पर खुली और सार्थक संसदीय बहस की माँग की। पार्टी का स्पष्ट कहना है कि संसद लोकतांत्रिक जवाबदेही का सर्वोच्च मंच है और सरकार को जनता की चिंताओं से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।
सर्वदलीय बैठक में सीपीआई की माँगें
सर्वदलीय बैठक में राज्यसभा में सीपीआई के नेता पी. संतोष कुमार ने पार्टी का पक्ष रखा। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग करते हुए कहा कि लगातार हो रहे पेपर लीक, परीक्षाओं के रद्द होने और शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती अनियमितताओं ने लाखों छात्रों के भविष्य को संकट में डाल दिया है। पार्टी का आरोप है कि इन घटनाओं से देश की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।
सीपीआई ने महिला आरक्षण अधिनियम को शीघ्र लागू करने की भी माँग दोहराई। इसके साथ ही पार्टी ने राजनीतिक दल-बदल की बढ़ती घटनाओं, मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के दौरान कथित तौर पर बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर संसद में विस्तृत चर्चा की आवश्यकता बताई।
महंगाई, किसान और खाद्य सुरक्षा पर जोर
पार्टी ने महंगाई, खाद्य सुरक्षा और इथेनॉल मिश्रण नीति के किसानों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को भी संसद में उठाए जाने योग्य प्राथमिक मुद्दा बताया। सीपीआई के अनुसार इन विषयों का सीधा असर आम जनता और कृषि क्षेत्र पर पड़ रहा है, इसलिए सरकार को इन पर अपना स्पष्ट पक्ष रखना चाहिए।
यह ऐसे समय में आया है जब संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों (सीटीयू) ने 10 अगस्त को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है। सीपीआई ने इस प्रस्तावित आंदोलन को भी संसदीय विमर्श का हिस्सा बनाने की माँग की।
जम्मू-कश्मीर और विदेश नीति भी एजेंडे में
सीपीआई ने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने और सरकारी स्कूलों के बंद होने के मुद्दे पर भी संसद में विस्तृत चर्चा की माँग की। इसके अतिरिक्त, तेज़ी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की विदेश नीति और उसकी स्वतंत्र कूटनीतिक परंपराओं को बनाए रखने पर भी विचार-विमर्श की आवश्यकता पर बल दिया गया।
सरकार पर जवाबदेही से बचने का आरोप
सीपीआई ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार लगातार सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर संसदीय जाँच और बहस से बचने का प्रयास करती रही है। पार्टी का तर्क है कि संसद केवल विधेयक पारित करने का माध्यम नहीं, बल्कि सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह ठहराने की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक संस्था है।
पार्टी ने केंद्र सरकार से अपील की कि मानसून सत्र के दौरान सभी जनहित के मुद्दों पर पर्याप्त समय दिया जाए, पारदर्शी बहस सुनिश्चित की जाए और जनता की चिंताओं का उत्तर जिम्मेदारी के साथ दिया जाए। गौरतलब है कि विपक्षी दलों की यह एकजुट माँग मानसून सत्र के स्वर और दिशा को प्रभावित कर सकती है।