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6 सितंबर 2026 पंचांग: दशमी-एकादशी तिथि, विष्णु-लक्ष्मी पूजा शुभ, पश्चिम दिशा में यात्रा वर्जित

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6 सितंबर 2026 पंचांग: दशमी-एकादशी तिथि, विष्णु-लक्ष्मी पूजा शुभ, पश्चिम दिशा में यात्रा वर्जित

सारांश

6 सितंबर 2026 को भाद्रपद कृष्ण दशमी रात 7:29 बजे तक रहेगी, फिर एकादशी आरंभ होगी। संध्याकाल में विष्णु-लक्ष्मी पूजा शुभ है। अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 से 12:49 बजे तक। व्यतीपात योग और पश्चिम दिशाशूल के कारण इस दिशा में यात्रा से परहेज करें।

मुख्य बातें

6 सितंबर 2026 (रविवार) को भाद्रपद कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि रात 7:29 बजे तक, तत्पश्चात एकादशी आरंभ।
संध्याकाल में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी।
अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:00–12:49 बजे ; अमृत काल सुबह 10:32–12:02 बजे ।
राहुकाल शाम 5:03–6:36 बजे ; यमगंड दोपहर 12:25–1:58 बजे — नए कार्य वर्जित।
इस दिन व्यतीपात योग रहेगा और पश्चिम दिशा में दिशाशूल — यात्रा से बचें।
सूर्य सिंह राशि व पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र में; चंद्रमा मिथुन राशि व आर्द्रा/पुनर्वसु नक्षत्र में।

हिंदू पंचांग के अनुसार 6 सितंबर 2026 (रविवार) को भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि रात 7:29 बजे तक रहेगी, जिसके पश्चात एकादशी तिथि का आरंभ होगा। इस दिन संध्याकाल में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना को विशेष रूप से फलदायी माना गया है।

सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्र स्थिति

रविवार को सूर्योदय सुबह 6:14 बजे और सूर्यास्त शाम 6:36 बजे होगा। चंद्रोदय रात 12:48 बजे तथा चंद्रास्त दोपहर 3:05 बजे रहेगा। नक्षत्र की दृष्टि से सूर्य पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र में विराजमान रहेगा, जबकि चंद्रमा रात 7:52 बजे तक आर्द्रा नक्षत्र में और उसके बाद पुनर्वसु नक्षत्र में संचरण करेगा। राशि की स्थिति में सूर्य सिंह राशि में और चंद्रमा मिथुन राशि में स्थित रहेंगे।

शुभ मुहूर्त और अमृत काल

इस दिन का सर्वाधिक शुभ समय अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:00 बजे से 12:49 बजे तक रहेगा। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार यह दिन का सबसे उत्तम काल माना जाता है। इसके अतिरिक्त अमृत काल सुबह 10:32 बजे से दोपहर 12:02 बजे तक रहेगा, जो शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए अनुकूल है।

अशुभ काल — राहुकाल, गुलिक और यमगंड

पंचांग के अनुसार राहुकाल शाम 5:03 बजे से 6:36 बजे तक रहेगा। गुलिक काल दोपहर 3:30 बजे से 5:03 बजे तथा यमगंड काल दोपहर 12:25 बजे से 1:58 बजे तक रहेगा। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इन कालखंडों में कोई नया कार्य आरंभ करना उचित नहीं माना जाता।

योग और दिशाशूल

इस दिन व्यतीपात योग रहेगा। ज्योतिषीय दृष्टि से पश्चिम दिशा में दिशाशूल रहेगा, अतः इस दिशा में यात्रा करने से बचने की सलाह दी जाती है। यदि पश्चिम दिशा में यात्रा अनिवार्य हो, तो ज्योतिष शास्त्र में वर्णित विशेष उपायों को अपनाकर प्रस्थान किया जा सकता है।

आस्था और व्यावहारिक उपयोग

गौरतलब है कि पंचांग हिंदू काल-गणना की वह पद्धति है जो सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों की खगोलीय स्थिति पर आधारित है। शुभ कार्य, विवाह, गृह-प्रवेश, निवेश अथवा यात्रा से पहले पंचांग का परामर्श लेना हिंदू परंपरा का अभिन्न अंग है। आने वाले दिनों में भाद्रपद की एकादशी तिथि धार्मिक दृष्टि से और भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो धार्मिक आस्था और दैनिक जीवन की व्यावहारिकता को एक साथ साधती है। इस खबर की असली उपयोगिता इसकी सटीक समय-सारणी में है — अभिजित मुहूर्त, राहुकाल और दिशाशूल जैसी जानकारियाँ लाखों परिवारों के दिन की योजना तय करती हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि व्यतीपात योग को पारंपरिक रूप से सावधानी का योग माना जाता है, जो इस दिन की धार्मिक महत्ता को और गहरा करता है।
RashtraPress
5 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

6 सितंबर 2026 को कौन-सी तिथि है?
6 सितंबर 2026 को भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि रात 7:29 बजे तक रहेगी। इसके बाद एकादशी तिथि का आरंभ होगा।
6 सितंबर 2026 का अभिजित मुहूर्त कब है?
इस दिन अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:00 बजे से 12:49 बजे तक रहेगा, जो दिन का सर्वाधिक शुभ समय माना जाता है। अमृत काल सुबह 10:32 से दोपहर 12:02 बजे तक रहेगा।
6 सितंबर 2026 को राहुकाल कितने बजे है?
6 सितंबर 2026 को राहुकाल शाम 5:03 बजे से 6:36 बजे तक रहेगा। गुलिक काल दोपहर 3:30 से 5:03 बजे और यमगंड काल दोपहर 12:25 से 1:58 बजे तक रहेगा।
6 सितंबर को पश्चिम दिशा में यात्रा क्यों नहीं करनी चाहिए?
इस दिन पश्चिम दिशा में दिशाशूल है, जिसे ज्योतिष और वास्तु शास्त्र में अशुभ माना जाता है। यदि यात्रा अनिवार्य हो, तो ज्योतिषीय उपायों को अपनाकर प्रस्थान किया जा सकता है।
6 सितंबर 2026 को किस देवता की पूजा करना शुभ है?
6 सितंबर 2026 की संध्या को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष रूप से फलदायी मानी गई है। एकादशी तिथि के निकट होने के कारण यह दिन वैष्णव परंपरा में महत्त्वपूर्ण है।
राष्ट्र प्रेस
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