परंदूर एयरपोर्ट भूमि विवाद: सीपीआई-एम ने किसानों को जमीन वापसी की मांग की, औद्योगिक उपयोग का विरोध
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्य सचिव पी. शनमुगम ने 27 अगस्त 2026 को राज्य सरकार से स्पष्ट माँग की कि परंदूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई कृषि भूमि तत्काल मूल किसान-मालिकों को वापस लौटाई जाए। उन्होंने एयरपोर्ट योजना के रद्द होने के बाद उसी जमीन को वैकल्पिक औद्योगिक परियोजनाओं में इस्तेमाल करने के किसी भी प्रस्ताव को कानूनी और नैतिक दोनों आधारों पर अस्वीकार्य बताया।
विधानसभा में उठा मुद्दा
तमिलनाडु विधानसभा में बुधवार को इस मुद्दे पर चर्चा हुई, जहाँ विधायकों ने सरकार से पूछा कि एयरपोर्ट के लिए पहले ही ली जा चुकी भूमि का भविष्य में क्या किया जाएगा। सवालों के जवाब में उद्योग मंत्री ने संकेत दिया कि इस जमीन का उपयोग अन्य औद्योगिक उद्यमों के लिए किया जा सकता है। इसी बयान पर सीपीआई-एम (CPI-M) ने कड़ी आपत्ति जताई।
कानूनी आधार पर आपत्ति
शनमुगम ने अपनी माँग को कानूनी ढाँचे से जोड़ते हुए 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस कानून के तहत किसी विशेष परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि — यदि पाँच वर्षों तक उपयोग न हो या परियोजना ही छोड़ दी जाए — तो उसे मूल भूमि-स्वामियों को वापस करना अनिवार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून अधिकारियों को ऐसी जमीन अनिश्चितकाल तक अपने पास रखने या किसी असंबंधित योजना में हस्तांतरित करने की अनुमति नहीं देता।
किसानों का लंबा संघर्ष
गौरतलब है कि परंदूर में प्रस्तावित एयरपोर्ट के लिए चिह्नित गाँवों के किसानों और निवासियों ने लंबे समय तक संगठित विरोध किया था। प्रदर्शनकारियों ने बार-बार आगाह किया था कि इस परियोजना से उपजाऊ कृषि भूमि, घर और आजीविका नष्ट होगी, साथ ही स्थानीय जल निकायों और पर्यावरण पर भी गंभीर असर पड़ेगा। अब जब एयरपोर्ट परियोजना रद्द हो चुकी है, तो किसानों की यह आशंका और गहरी हो गई है कि उनकी जमीन बिना उनकी सहमति के किसी और काम में लगाई जाएगी।
सीपीआई-एम की माँग
शनमुगम ने तर्क दिया कि किसानों ने अपनी जमीन केवल इसलिए दी थी क्योंकि उसे एयरपोर्ट के लिए अधिग्रहित किया जा रहा था। उनके अनुसार, जब वह मूल उद्देश्य समाप्त हो गया, तो राज्य की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह जमीन किसानों को वापस करे — न कि उनकी मंजूरी के बिना किसी अन्य कार्य में इस्तेमाल करे। उन्होंने प्रशासन से माँग की कि वैकल्पिक औद्योगिक उपयोग का कोई भी प्रस्ताव तत्काल वापस लिया जाए और भूमि-वापसी की प्रक्रिया शुरू की जाए।
आगे की राह
यह मामला भूमि अधिग्रहण कानून की व्याख्या और किसानों के अधिकारों के व्यापक प्रश्न को केंद्र में ला खड़ा करता है। यदि सरकार जमीन को औद्योगिक उपयोग के लिए रखती है, तो कानूनी चुनौती की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। तमिलनाडु सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।