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परंदूर एयरपोर्ट भूमि विवाद: सीपीआई-एम ने किसानों को जमीन वापसी की मांग की, औद्योगिक उपयोग का विरोध

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परंदूर एयरपोर्ट भूमि विवाद: सीपीआई-एम ने किसानों को जमीन वापसी की मांग की, औद्योगिक उपयोग का विरोध

सारांश

परंदूर एयरपोर्ट रद्द होने के बाद अब उसकी जमीन पर नई लड़ाई शुरू हो गई है। सीपीआई-एम ने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 का हवाला देते हुए माँग की है कि यह जमीन किसानों को वापस हो, न कि किसी दूसरे उद्योग को सौंपी जाए। किसानों का लंबा संघर्ष अब कानूनी मोड़ पर आ गया है।

मुख्य बातें

सीपीआई-एम के तमिलनाडु राज्य सचिव पी.
शनमुगम ने परंदूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट की अधिग्रहित जमीन किसानों को वापस करने की माँग की।
तमिलनाडु विधानसभा में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान उद्योग मंत्री ने संकेत दिया कि जमीन का उपयोग अन्य औद्योगिक परियोजनाओं के लिए किया जा सकता है।
शनमुगम ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 का हवाला देते हुए कहा कि परियोजना रद्द होने पर जमीन मूल मालिकों को लौटाना कानूनी अनिवार्यता है।
कानून के अनुसार, किसी परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि यदि पाँच वर्ष तक उपयोग न हो या परियोजना छोड़ दी जाए, तो वह मूल भूमि-स्वामियों को वापस करनी होती है।
परंदूर के किसानों और निवासियों ने एयरपोर्ट परियोजना के दौरान उपजाऊ भूमि, आजीविका और जल निकायों के नुकसान के खिलाफ लंबा विरोध किया था।

तमिलनाडु में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्य सचिव पी. शनमुगम ने 27 अगस्त 2026 को राज्य सरकार से स्पष्ट माँग की कि परंदूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई कृषि भूमि तत्काल मूल किसान-मालिकों को वापस लौटाई जाए। उन्होंने एयरपोर्ट योजना के रद्द होने के बाद उसी जमीन को वैकल्पिक औद्योगिक परियोजनाओं में इस्तेमाल करने के किसी भी प्रस्ताव को कानूनी और नैतिक दोनों आधारों पर अस्वीकार्य बताया।

विधानसभा में उठा मुद्दा

तमिलनाडु विधानसभा में बुधवार को इस मुद्दे पर चर्चा हुई, जहाँ विधायकों ने सरकार से पूछा कि एयरपोर्ट के लिए पहले ही ली जा चुकी भूमि का भविष्य में क्या किया जाएगा। सवालों के जवाब में उद्योग मंत्री ने संकेत दिया कि इस जमीन का उपयोग अन्य औद्योगिक उद्यमों के लिए किया जा सकता है। इसी बयान पर सीपीआई-एम (CPI-M) ने कड़ी आपत्ति जताई।

कानूनी आधार पर आपत्ति

शनमुगम ने अपनी माँग को कानूनी ढाँचे से जोड़ते हुए 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस कानून के तहत किसी विशेष परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि — यदि पाँच वर्षों तक उपयोग न हो या परियोजना ही छोड़ दी जाए — तो उसे मूल भूमि-स्वामियों को वापस करना अनिवार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून अधिकारियों को ऐसी जमीन अनिश्चितकाल तक अपने पास रखने या किसी असंबंधित योजना में हस्तांतरित करने की अनुमति नहीं देता।

किसानों का लंबा संघर्ष

गौरतलब है कि परंदूर में प्रस्तावित एयरपोर्ट के लिए चिह्नित गाँवों के किसानों और निवासियों ने लंबे समय तक संगठित विरोध किया था। प्रदर्शनकारियों ने बार-बार आगाह किया था कि इस परियोजना से उपजाऊ कृषि भूमि, घर और आजीविका नष्ट होगी, साथ ही स्थानीय जल निकायों और पर्यावरण पर भी गंभीर असर पड़ेगा। अब जब एयरपोर्ट परियोजना रद्द हो चुकी है, तो किसानों की यह आशंका और गहरी हो गई है कि उनकी जमीन बिना उनकी सहमति के किसी और काम में लगाई जाएगी।

सीपीआई-एम की माँग

शनमुगम ने तर्क दिया कि किसानों ने अपनी जमीन केवल इसलिए दी थी क्योंकि उसे एयरपोर्ट के लिए अधिग्रहित किया जा रहा था। उनके अनुसार, जब वह मूल उद्देश्य समाप्त हो गया, तो राज्य की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह जमीन किसानों को वापस करे — न कि उनकी मंजूरी के बिना किसी अन्य कार्य में इस्तेमाल करे। उन्होंने प्रशासन से माँग की कि वैकल्पिक औद्योगिक उपयोग का कोई भी प्रस्ताव तत्काल वापस लिया जाए और भूमि-वापसी की प्रक्रिया शुरू की जाए।

आगे की राह

यह मामला भूमि अधिग्रहण कानून की व्याख्या और किसानों के अधिकारों के व्यापक प्रश्न को केंद्र में ला खड़ा करता है। यदि सरकार जमीन को औद्योगिक उपयोग के लिए रखती है, तो कानूनी चुनौती की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। तमिलनाडु सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन राज्य सरकारें अक्सर 'सार्वजनिक हित' की व्यापक परिभाषा की आड़ में इससे बचने का रास्ता ढूँढती हैं। तमिलनाडु सरकार का औद्योगिक उपयोग का संकेत — बिना किसी पारदर्शी परामर्श के — उन किसानों के साथ विश्वासघात जैसा है जिन्होंने एयरपोर्ट के नाम पर जमीन दी थी। अगर सरकार इस जमीन को बिना कानूनी प्रक्रिया के रोकती है, तो न्यायालय में चुनौती लगभग अवश्यंभावी है।
RashtraPress
26 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

परंदूर एयरपोर्ट भूमि विवाद क्या है?
तमिलनाडु सरकार ने परंदूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट परियोजना के लिए किसानों की कृषि भूमि अधिग्रहित की थी। परियोजना रद्द होने के बाद अब सरकार उस जमीन को औद्योगिक उपयोग के लिए रखने का संकेत दे रही है, जिसका सीपीआई-एम और किसान विरोध कर रहे हैं।
सीपीआई-एम की माँग क्या है और इसका कानूनी आधार क्या है?
सीपीआई-एम के राज्य सचिव पी. शनमुगम ने माँग की है कि परंदूर की अधिग्रहित जमीन तुरंत मूल किसान-मालिकों को वापस की जाए। उन्होंने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 का हवाला दिया, जिसके तहत परियोजना रद्द होने पर जमीन मूल मालिकों को लौटाना अनिवार्य है।
भूमि अधिग्रहण कानून 2013 इस मामले में कैसे लागू होता है?
कानून के अनुसार, यदि किसी विशिष्ट परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि पाँच वर्षों तक उपयोग न हो या परियोजना ही छोड़ दी जाए, तो वह जमीन मूल भूमि-स्वामियों को वापस करनी होती है। कानून सरकार को उस जमीन को किसी असंबंधित परियोजना में स्थानांतरित करने की अनुमति नहीं देता।
परंदूर के किसानों ने एयरपोर्ट परियोजना का विरोध क्यों किया था?
परंदूर और आसपास के गाँवों के किसानों और निवासियों ने एयरपोर्ट परियोजना के खिलाफ लंबे समय तक विरोध किया था। उनकी मुख्य आपत्तियाँ थीं — उपजाऊ कृषि भूमि का नुकसान, घरों और आजीविका पर असर, और स्थानीय जल निकायों तथा पर्यावरण को होने वाली क्षति।
तमिलनाडु सरकार इस जमीन का क्या करना चाहती है?
तमिलनाडु विधानसभा में उद्योग मंत्री ने संकेत दिया कि एयरपोर्ट परियोजना रद्द होने के बाद अधिग्रहित भूमि का उपयोग अन्य औद्योगिक उद्यमों के लिए किया जा सकता है। सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक विस्तृत योजना सार्वजनिक नहीं की गई है।
राष्ट्र प्रेस
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