27 अगस्त 2026
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दिल्ली दंगे 2020: हाईकोर्ट में पुलिस का दावा — शरजील इमाम और उमर खालिद थे मास्टरमाइंड, जमानत का विरोध

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दिल्ली दंगे 2020: हाईकोर्ट में पुलिस का दावा — शरजील इमाम और उमर खालिद थे मास्टरमाइंड, जमानत का विरोध

सारांश

दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में दाखिल जवाब में शरजील इमाम और उमर खालिद को 2020 दंगों का मास्टरमाइंड बताया और उनकी जमानत याचिकाओं को 'गैरकानूनी' करार दिया। पुलिस का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट की दो शर्तें अभी पूरी नहीं हुईं, इसलिए सुनवाई नहीं होनी चाहिए।

मुख्य बातें

दिल्ली पुलिस ने 27 अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल जवाब में शरजील इमाम और उमर खालिद को 2020 दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड बताया।
पुलिस के पास दंगों की योजना बनाने, लोगों को जुटाने और रणनीतिक भूमिका निभाने के 'अहम सबूत' होने का दावा।
दोनों की नई जमानत याचिकाओं को पुलिस ने 'गैरकानूनी' और अदालत को गुमराह करने वाला बताया।
सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी में जमानत के लिए दो शर्तें रखी थीं — अहम गवाहों के बयान और आदेश को एक वर्ष — जो अभी पूरी नहीं हुईं।
इस मामले में यूएपीए की धारा 43डी(5) लागू; फरवरी 2020 के दंगों में 50 से अधिक मौतें और सैकड़ों घायल हुए थे।

दिल्ली पुलिस ने 27 अगस्त 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल अपने जवाब में 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी शरजील इमाम और उमर खालिद को साजिश का मास्टरमाइंड करार दिया है। पुलिस ने दोनों की नई जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए अदालत से उन्हें खारिज करने की माँग की है।

पुलिस का अदालत में दावा

दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में कहा, 'शरजील इमाम और उमर खालिद दिल्ली दंगों के मास्टरमाइंड थे। पुलिस के पास इनके खिलाफ दंगों की योजना बनाने, लोगों को जुटाने और दंगों में रणनीतिक भूमिका निभाने से जुड़े अहम सबूत हैं।' पुलिस ने यह भी तर्क दिया कि दोनों की नई जमानत याचिकाएँ अपने आप में 'गैरकानूनी' हैं और न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास हैं।

सुप्रीम कोर्ट की शर्तों का हवाला

दिल्ली पुलिस ने अदालत को याद दिलाया कि जनवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी मामले में सह-आरोपियों को जमानत दे दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को इस आधार पर जमानत देने से इनकार किया था कि दंगों में इनकी भूमिका अन्य आरोपियों से 'अलग और अधिक गंभीर' है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना था कि इस केस में यूएपीए की धारा 43डी(5) लागू होती है, जिसमें जमानत के लिए अत्यंत कड़ी शर्तें निर्धारित हैं।

पुलिस के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी के अपने आदेश में नए सिरे से जमानत याचिका दाखिल करने के लिए दो स्पष्ट शर्तें रखी थीं — पहली, इस मामले में अहम गवाहों के बयान दर्ज हो जाएँ, और दूसरी, उक्त आदेश को एक वर्ष पूरा हो जाए। पुलिस का कहना है कि अभी तक दोनों में से कोई भी शर्त पूरी नहीं हुई है, इसलिए इस स्तर पर जमानत याचिकाओं पर सुनवाई नहीं होनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध के दौरान भड़के दंगों में 50 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। यह दिल्ली में दशकों की सबसे भीषण सांप्रदायिक हिंसा थी। गिरफ्तारी के बाद से उमर खालिद और शरजील इमाम न्यायिक हिरासत में हैं।

यह मामला ऐसे समय में सुर्खियों में है जब देश में यूएपीए के तहत लंबे समय तक बिना जमानत के हिरासत पर नागरिक अधिकार संगठनों की ओर से बहस तेज हो रही है। 31 जुलाई की पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने पुलिस को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था, जिसके बाद गुरुवार को यह जवाब प्रस्तुत किया गया।

आगे की सुनवाई

दिल्ली हाईकोर्ट अब दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जमानत याचिकाओं की सुनवाई जारी रखने या न रखने पर निर्णय करेगा। यह मामला न्यायपालिका, नागरिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के बीच संतुलन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असल सवाल यह है कि यूएपीए के तहत छह वर्षों से अधिक की बिना जमानत हिरासत न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर कितनी खरी उतरती है। सर्वोच्च न्यायालय ने सह-आरोपियों को जमानत दी, लेकिन इन दोनों को 'अलग भूमिका' के आधार पर नहीं — यह विभेद ही इस मामले का केंद्रीय कानूनी प्रश्न है। नागरिक अधिकार संगठन लंबे समय से तर्क देते रहे हैं कि यूएपीए की धारा 43डी(5) की कड़ी शर्तें व्यावहारिक रूप से जमानत को असंभव बना देती हैं। हाईकोर्ट का अगला कदम यह तय करेगा कि क्या प्रक्रियागत शर्तें न्यायिक स्वतंत्रता से ऊपर हैं।
RashtraPress
27 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में शरजील इमाम और उमर खालिद के बारे में क्या कहा?
दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में दाखिल जवाब में शरजील इमाम और उमर खालिद को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड बताया। पुलिस का दावा है कि उसके पास दोनों के खिलाफ दंगों की योजना बनाने, लोगों को जुटाने और रणनीतिक भूमिका निभाने के अहम सबूत हैं।
उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं पर पुलिस का क्या रुख है?
दिल्ली पुलिस ने दोनों की नई जमानत याचिकाओं को 'गैरकानूनी' और अदालत को गुमराह करने वाला बताते हुए विरोध किया है। पुलिस का तर्क है कि सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी में जो दो शर्तें रखी थीं — अहम गवाहों के बयान और आदेश को एक वर्ष पूरा होना — वे अभी पूरी नहीं हुई हैं।
2020 दिल्ली दंगे क्या थे और इनमें कितना नुकसान हुआ?
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध के दौरान सांप्रदायिक दंगे भड़के थे, जिनमें 50 से अधिक लोगों की मौत हुई और सैकड़ों घायल हुए। यह दिल्ली में दशकों की सबसे भीषण सांप्रदायिक हिंसा मानी जाती है।
यूएपीए की धारा 43डी(5) क्या है और यह इस मामले में क्यों अहम है?
यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) की धारा 43डी(5) के तहत जमानत के लिए अत्यंत कड़ी शर्तें हैं — अदालत को यह संतुष्ट होना होता है कि आरोप प्रथम दृष्टया सत्य नहीं हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि यह धारा इस मामले में लागू होती है, जिससे जमानत मिलना कानूनी रूप से बेहद कठिन हो जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने पहले इस मामले में क्या फैसला दिया था?
सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी में इसी मामले के सह-आरोपियों को जमानत दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को यह कहते हुए जमानत देने से इनकार किया कि दंगों में इनकी भूमिका अलग और अधिक गंभीर है। साथ ही नए सिरे से याचिका के लिए दो शर्तें निर्धारित की थीं।
राष्ट्र प्रेस
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