टी-72 और टी-90 टैंक सीमा पर लोहे की दीवार: राजनाथ सिंह ने जबलपुर में ₹472 करोड़ परियोजना का शिलान्यास किया
सारांश
मुख्य बातें
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 27 अगस्त 2026 को जबलपुर में ₹472 करोड़ की टैंक नवीनीकरण परियोजना का शिलान्यास करते हुए स्पष्ट किया कि जमीनी युद्ध में टी-72 और टी-90 टैंकों की भूमिका न केवल प्रासंगिक है, बल्कि अपरिहार्य भी है। उन्होंने कहा कि ये टैंक भारत की सीमाओं पर 'लोहे की दीवार' बनकर खड़े हैं और देश की रक्षा नीति की रीढ़ हैं।
परियोजना का विवरण और क्षमता विस्तार
राजनाथ सिंह ने बताया कि इस परियोजना के पूरा होने पर वाहन कारखाना जबलपुर में प्रतिवर्ष 80 टैंकों के नवीनीकरण की अतिरिक्त क्षमता तैयार होगी। इसे भारी वाहन कारखाना (HVF) अवाडी की 150 टैंकों की मौजूदा क्षमता के साथ जोड़ने पर देश की कुल वार्षिक नवीनीकरण क्षमता 230 टैंक प्रतिवर्ष हो जाएगी। रक्षा मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि पिछले 40 वर्षों में HVF ने भारतीय सेना को लगभग 4,400 टैंकों की आपूर्ति की है।
आत्मनिर्भर रक्षा क्षेत्र: आँकड़े जो बोलते हैं
राजनाथ सिंह ने घरेलू रक्षा उत्पादन में आई उल्लेखनीय वृद्धि का हवाला दिया। उनके अनुसार, 2014 में भारत का घरेलू रक्षा उत्पादन मात्र ₹46,000 करोड़ था, जो अब बढ़कर ₹1 लाख 77 हज़ार करोड़ से अधिक हो चुका है। इसी तरह, रक्षा निर्यात ₹1,000 करोड़ से कम से बढ़कर रिकॉर्ड ₹38,424 करोड़ तक पहुँच गया है। उन्होंने कहा कि दुनिया अब भारत को एक विनिर्माण शक्ति, प्रौद्योगिकी साझेदार और विश्वसनीय रक्षा साझेदार के रूप में देख रही है।
टैंक बनाम ड्रोन: एकीकृत युद्ध दृष्टिकोण
रक्षा मंत्री ने आधुनिक युद्ध की जटिलताओं को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि भारत की रक्षा नीति किसी एक प्लेटफॉर्म को दूसरे का विकल्प नहीं मानती। उन्होंने कहा, 'हमें ड्रोन भी चाहिए, मिसाइल भी चाहिए, तोपखाना भी चाहिए, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध भी चाहिए, ऊर्जा हथियार भी चाहिए और आधुनिकीकरण किए गए टैंक भी चाहिए।' यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर यूक्रेन संघर्ष के बाद टैंकों की प्रासंगिकता पर बहस तेज़ हुई है। राजनाथ सिंह ने इस बहस को सिरे से खारिज करते हुए एकीकृत और बहु-आयामी युद्ध क्षमता पर बल दिया।
मध्यप्रदेश में रक्षा विनिर्माण का नया केंद्र
इस परियोजना का महत्व केवल सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं है। राजनाथ सिंह ने बताया कि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में 3,073 हेक्टेयर भूमि पर रक्षा विनिर्माण की संभावनाएँ तलाशी जा रही हैं और ₹16,960 करोड़ से अधिक का निवेश प्रस्तावित है। उन्होंने कहा कि यह परियोजना जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों के किसानों, मज़दूरों, युवाओं और छोटे उद्यमियों के लिए रोज़गार और समृद्धि के नए द्वार खोलेगी। गौरतलब है कि यह प्रयास मध्यप्रदेश को भारत के अगले प्रमुख रक्षा एवं एयरोस्पेस विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक ठोस कदम है।
युवाओं और स्थानीय प्रतिभा को अवसर
रक्षा मंत्री ने इस परियोजना में स्थानीय तकनीकी कार्यबल और युवाओं की भागीदारी को विशेष महत्व दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय युवाओं में कौशल की कोई कमी नहीं है — आवश्यकता केवल सही अवसर, प्रौद्योगिकी और पारिस्थितिकी तंत्र देने की है। आने वाले समय में जबलपुर की यह सुविधा देश की एकीकृत रक्षा तैयारी को और मज़बूत करेगी।