दीपावली पर पद्मावती अम्मावारी मंदिर: तिरुचानूर में 'सारे' की परंपरा और 'दीपावली आस्थानम' का महत्व
सारांश
मुख्य बातें
आंध्र प्रदेश के तिरुचानूर स्थित श्री पद्मावती अम्मावारी मंदिर में दीपावली का पर्व विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, क्योंकि यह मंदिर देवी लक्ष्मी के अवतार माता पद्मावती को समर्पित है। 3 नवंबर 2026 को दीपावली के अवसर पर यहाँ हजारों श्रद्धालु उमड़े, और विशेष रस्में मंदिर परिसर को एक अलौकिक आभा से जीवंत कर रही हैं। यह मंदिर अपनी भव्यता, आध्यात्मिक गहराई और एक अनूठी परंपरा — 'सारे' — के लिए पूरे देश में जाना जाता है।
क्या है 'सारे' की परंपरा
दीपावली के शुभ अवसर पर तिरुमाला पहाड़ियों पर विराजमान श्री वेंकटेश्वर स्वामी (भगवान बालाजी) के मुख्य मंदिर से उनकी पत्नी देवी पद्मावती के लिए एक विशेष उपहार भेजा जाता है, जिसे 'सारे' कहा जाता है। इस भेंट में पट्टू साड़ी (रेशमी वस्त्र), आभूषण, कुमकुम, हल्दी और विशेष नैवेद्य (प्रसाद) शामिल होते हैं।
इस भेंट को धूमधाम से गाजे-बाजे के साथ तिरुमाला से तिरुचानूर लाया जाता है और अम्मावारी (देवी) को समर्पित किया जाता है। यह परंपरा भगवान वेंकटेश्वर और देवी पद्मावती के दिव्य दांपत्य प्रेम की प्रतीक है और पीढ़ियों से अटूट श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
दीपावली आस्थानम और विशेष धार्मिक आयोजन
दीपावली पर मंदिर के पुजारियों द्वारा 'दीपावली आस्थानम' नामक एक विशेष धार्मिक सभा का आयोजन किया जाता है, जिसमें देवी पद्मावती के गर्भगृह में महा मंगल आरती, विशेष पूजा-अर्चना और वैदिक मंत्रोच्चार किए जाते हैं।
शाम के समय 'सहस्र दीपलंकरण सेवा' — हजारों दीयों के बीच देवी की सेवा — का आयोजन होता है। मंदिर परिसर को हजारों पारंपरिक तेल के दीयों (दीपम) और रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है, जो पूरे वातावरण को स्वर्णिम आभा में डुबो देता है। गौरतलब है कि दीपावली से ही पवित्र कार्तिक मास के दीपदान की शुरुआत मानी जाती है, इसलिए इस मंदिर में इस पर्व की आध्यात्मिक गहराई और बढ़ जाती है।
पुरुषकारम: माता की मध्यस्थता का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तिरुमाला जाने वाले भक्तों की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक वे तिरुचानूर में देवी पद्मावती के दर्शन नहीं कर लेते। माना जाता है कि एक सामान्य भक्त सीधे भगवान वेंकटेश्वर के उग्र और ऐश्वर्यपूर्ण रूप के सामने जाने की पात्रता आसानी से नहीं पाता।
इसलिए माता पद्मावती पहले भक्त की भक्ति को स्वीकार कर अपने पति भगवान वेंकटेश्वर से उसके लिए सिफारिश करती हैं — इस प्रक्रिया को 'पुरुषकारम' कहा जाता है। इस मंदिर को लक्ष्मी-नारायण के पुनर्मिलन का पवित्र स्थल भी माना जाता है।
पौराणिक कथा: माता पद्मावती का अवतरण
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर लात मार दी। भगवान विष्णु के हृदय में माता लक्ष्मी का वास होने के कारण उन्होंने इसे अपना अपमान माना। भगवान विष्णु द्वारा ऋषि को दंड न दिए जाने से रुष्ट होकर माता लक्ष्मी वैकुंठ छोड़कर पृथ्वी लोक (कोल्हापुर) चली आईं और वहाँ तपस्या करने लगीं।
भगवान विष्णु भी उनकी तलाश में शेषाचल पर्वत (तिरुमाला) पर 'वेंकटेश्वर' नाम से निवास करने लगे। इस बीच नारायणवनम के राजा आकाशराज संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे। जब वे भूमि जोत रहे थे, तो उन्हें पद्म सरोवर में एक सुनहरे कमल पर एक दिव्य कन्या मिली। कमल (पद्म) से प्रकट होने के कारण उसका नाम 'पद्मावती' रखा गया, जो वास्तव में माता लक्ष्मी का ही रूप थीं।
बड़ी होने पर पद्मावती की जंगल में भगवान वेंकटेश्वर से भेंट हुई। दोनों ने एक-दूसरे को पहचाना और देवताओं की उपस्थिति में उनका भव्य विवाह हुआ। चूँकि माता लक्ष्मी धरती पर पहले आई थीं और उन्होंने ही इस लीला की शुरुआत की थी, इसलिए भक्तों के लिए परंपरा बनाई गई कि वे भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन से पहले माता पद्मावती के चरणों में शीश नवाएँ।
आम भक्तों पर असर और आस्था का केंद्र
दीपावली के अवसर पर तिरुचानूर में भक्तों की अभूतपूर्व भीड़ उमड़ती है। यह मंदिर न केवल आंध्र प्रदेश के श्रद्धालुओं के लिए, बल्कि देशभर के उन तीर्थयात्रियों के लिए भी अनिवार्य पड़ाव बन गया है जो तिरुपति की यात्रा पर आते हैं। इस दिन की विशेष सेवाओं और परंपराओं में भाग लेना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। आने वाले दिनों में कार्तिक मास की पूजा-परंपराएँ इस मंदिर में और भी विशेष रूप लेती रहेंगी।