नमक्कल में दशहरा उत्सव: किन्नर समुदाय ने देवी काली रूप धारणकर 'तीचट्टी' के साथ पूरी कीं मन्नतें
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के नमक्कल जिले में परमथी वेलूर के निकट स्थित अरुनागिरी सुल्लीपालयम में इस वर्ष दशहरा उत्सव असाधारण धार्मिक उत्साह और सामुदायिक सहभागिता के साथ मनाया गया। श्री शिवशक्ति अर्धनारी निरंतर अघोरी सिद्धर पीठम में आयोजित इस उत्सव में किन्नर समुदाय के सदस्यों समेत आसपास के गाँवों से हज़ारों श्रद्धालु एकत्रित हुए और देवी काली की आराधना कर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण कीं।
उत्सव का आरंभ और अनुष्ठान क्रम
उत्सव की विधिवत शुरुआत 7 अक्टूबर की रात को ग्रामशांति अनुष्ठानों से हुई, जिनका उद्देश्य गाँव की शुद्धि और उत्सव के निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना करना था। इसके पश्चात 10 अक्टूबर को कावेरी नदी से पवित्र जल लाकर 'तीर्थकुडम' स्थापित किया गया। इस अनुष्ठान के साथ ही भक्तों ने उपवास प्रारंभ किया और विशेष धार्मिक मालाएँ धारण कर देवी की आराधना में लीन हो गए।
11 से 19 अक्टूबर तक प्रतिदिन मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में धार्मिक कार्यक्रमों एवं शोभायात्राओं का आयोजन किया गया। इस पूरे कालखंड में भक्तिमय वातावरण और धार्मिक जागरण बना रहा।
किन्नर समुदाय की विशेष भूमिका
उत्सव का सर्वाधिक चर्चित पक्ष रहा किन्नर समुदाय की सक्रिय भागीदारी। समुदाय के अनेक सदस्यों ने देवी काली का स्वरूप धारण किया और जलते अंगारों से भरे पारंपरिक पात्र — जिन्हें स्थानीय परंपरा में 'तीचट्टी' कहा जाता है — उठाकर शोभायात्रा में भाग लिया। भक्त नाचते-गाते और देवी के जयघोष करते हुए आगे बढ़े। श्रद्धालुओं ने इसे आस्था की अभिव्यक्ति और मन्नतें पूरी होने पर की जाने वाली परंपरागत धार्मिक प्रतिज्ञापूर्ति के रूप में निभाया।
गौरतलब है कि यह पीठम सामाजिक समावेश की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ किन्नर समुदाय को धार्मिक अनुष्ठानों में अग्रणी भूमिका दी जाती है — जो बड़े धार्मिक स्थलों पर अपेक्षाकृत दुर्लभ है।
शोभायात्रा और देवी दर्शन
प्रतिदिन की शोभायात्राओं में देवी काली की प्रतिमा के साथ भक्तों का विशाल जनसमूह चलता रहा। श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि एवं मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना की। इस दौरान धार्मिक भजनों और देवी के जयकारों से समूचा क्षेत्र गुंजायमान रहा।
उत्सव के अंतिम दिन सबसे विशेष धार्मिक दृश्य देखने को मिला, जब एकसाथ बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने 'तीचट्टी' लेकर यात्रा में भाग लिया। यह दृश्य क्षेत्र की पारंपरिक धार्मिक आस्था और सामूहिक उपासना-शैली का प्रतीक बना।
आयोजन और अन्नदान
इस समूचे धार्मिक आयोजन का संचालन श्रीला श्री अरुणा नायक किन्नर स्वामीगा की ओर से किया गया। उत्सव का समापन अन्नदान के साथ हुआ, जिसमें उपस्थित हज़ारों श्रद्धालुओं को भोजन वितरित किया गया — यह परंपरा सामुदायिक सद्भाव और सेवाभाव का प्रतीक मानी जाती है।
यह उत्सव आने वाले वर्षों में भी इसी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाए जाने की परंपरा को आगे बढ़ाने का संकेत देता है, और क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन को भी प्रोत्साहन दे सकता है।