अजीत भारती को झटका: दिल्ली हाई कोर्ट ने SC/ST एक्ट मामले में अग्रिम जमानत खारिज की
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाई कोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को यूट्यूबर अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी, जिन पर सांसद चंद्रशेखर आजाद और अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों के विरुद्ध जातिसूचक एवं अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में एफआईआर दर्ज है। जस्टिस सौरभ बनर्जी की सिंगल जज बेंच ने माना कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराओं के तहत प्रथम दृष्टया अपराध बनता है और इस अधिनियम के अंतर्गत अग्रिम जमानत पर कानूनी रोक लागू होती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला नॉर्थ एवेन्यू पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर नंबर 30/2026 से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, भारती ने सोशल मीडिया पर प्रकाशित अपने एक कार्यक्रम के एपिसोड में आजाद और अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों के बारे में जातिवादी, अपमानजनक और नीचा दिखाने वाली टिप्पणियाँ कीं। उक्त सामग्री को सार्वजनिक मंच पर 23,000 से अधिक बार देखा गया।
भारती पर SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज है। उन्होंने पहले पटियाला हाउस कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दी थी, जिसे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह लालर ने 7 सितंबर को खारिज कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि SC/ST एक्ट की धारा 18 के तहत कानूनी रोक लागू होती है।
हाई कोर्ट का रुख और सुनवाई के अहम पल
16 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस बनर्जी ने स्पष्ट किया था कि भारती को ऐसी टिप्पणियाँ करते समय 'सावधानी' बरतनी चाहिए थी। उन्होंने दिल्ली पुलिस से यह भी पूछा था कि भारती को नोटिस क्यों नहीं भेजा गया। दिल्ली पुलिस ने बताया कि जाँच अधिकारी को भारती का पता केवल दो दिन पहले ही चला था।
जस्टिस बनर्जी ने यह भी कहा कि भारती के शब्द अपमानजनक थे और उनके वकील को टिप्पणियों के ट्रांसक्रिप्ट को लेकर संभावित अवमानना कार्रवाई की चेतावनी दी थी। अदालत ने यह भी पूछा था: 'क्या आपको कस्टोडियल पूछताछ की ज़रूरत नहीं है?'
बचाव पक्ष के तर्क
भारती के वकील जय अनंत देहादराई ने तर्क दिया कि SC/ST एक्ट के प्रावधान इस मामले में लागू नहीं होते, क्योंकि कथित टिप्पणियाँ आजाद की जातिगत पहचान के कारण उन्हें अपमानित करने के इरादे से नहीं की गई थीं। उनका कहना था कि ये टिप्पणियाँ भारती की बहन के बारे में सोशल मीडिया पर हुई कथित टिप्पणियों के संदर्भ में थीं।
देहादराई ने यह भी तर्क दिया कि महज अपशब्दों के प्रयोग से SC/ST एक्ट के तहत अपराध तब तक नहीं बनता, जब तक जाति के आधार पर अपमानित या नीचा दिखाने की मंशा स्पष्ट रूप से सिद्ध न हो।
अभियोजन पक्ष की दलीलें
दिल्ली पुलिस और शिकायतकर्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कथित टिप्पणियाँ एक विशेष जाति के विरुद्ध थीं और उन्हें सार्वजनिक मंच पर प्रकाशित किया गया था। शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उस सामग्री तक लगभग 23,000 लोगों की पहुँच थी और उसमें बार-बार जातियों के नाम तथा जाति-व्यवस्था एवं विवाह से जुड़े संदर्भों का उल्लेख था।
आगे क्या होगा
दिल्ली हाई कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा था और अब याचिका खारिज कर दी है। हाई कोर्ट का विस्तृत लिखित आदेश अभी प्रतीक्षित है, जो SC/ST एक्ट के तहत अग्रिम जमानत की सीमाओं पर महत्त्वपूर्ण व्याख्या प्रदान कर सकता है। भारती अब सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने का विकल्प चुन सकते हैं, हालाँकि इस बारे में अभी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।