सुप्रीम कोर्ट सख्त: बिना सबूत जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप अस्वीकार्य, यूट्यूबर गुलशन पाहुजा को तत्काल राहत नहीं
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 जुलाई 2026 को यूट्यूबर गुलशन पाहुजा की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए कड़ा रुख अपनाया, जिसमें उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा आपराधिक अवमानना में दोषी ठहराए जाने और छह महीने के कारावास की सजा को चुनौती दी थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तत्काल राहत देने से स्पष्ट इनकार करते हुए पाहुजा को किसी भी राहत के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय का ही दरवाज़ा खटखटाने का निर्देश दिया।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा, 'हमें आपके प्रति सहानुभूति है, लेकिन आप बिना किसी ठोस सबूत के न्यायिक अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि ऐसे आरोपों का सोशल मीडिया पर क्या असर होता है? एक न्यायिक अधिकारी का पूरा करियर दांव पर लग जाता है और उन्हें इस तरह के आरोपों के साथ जीना पड़ता है।' पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं कर रही है।
मुख्य घटनाक्रम
पीठ ने रेखांकित किया कि पाहुजा पहले ही अवमानना के दोषी करार दिए जा चुके हैं और आत्मसमर्पण कर जेल जा चुके हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनकी सजा के निलंबन की अर्जी पहले स्वीकार की थी, परंतु आत्मसमर्पण की समय-सीमा बढ़ाने का अनुरोध खारिज होने के बाद उन्होंने स्वयं आत्मसमर्पण कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में इस स्तर पर तत्काल राहत देना उचित नहीं होगा।
अदालत ने यह भी बताया कि पाहुजा ने कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट के तहत अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए अपील दायर की है, किंतु याचिका में मौजूद तकनीकी खामियाँ दूर न होने के कारण उसे अभी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया जा सका है।
मामले की पृष्ठभूमि
गुलशन पाहुजा 'फाइट 4 ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स' नाम का एक यूट्यूब चैनल संचालित करते हैं। आरोप था कि उनके चैनल पर अपलोड किए गए कुछ वीडियो में न्यायपालिका और कुछ न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणियाँ की गई थीं। तीन न्यायिक अधिकारियों ने इन वीडियो को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की माँग की थी। चैनल पर दो वकीलों के साक्षात्कार भी प्रसारित किए गए थे, जिनमें कथित तौर पर न्यायपालिका के विरुद्ध आपत्तिजनक बातें कही गई थीं।
बाद में दोनों वकीलों ने बिना शर्त माफी माँग ली और अदालत को बताया कि उन्होंने वीडियो ऑनलाइन डालने की अनुमति नहीं दी थी तथा आपत्तिजनक शीर्षक या बैनर की जानकारी भी उन्हें नहीं थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनकी माफी स्वीकार कर उनके विरुद्ध कार्रवाई समाप्त कर दी।
वहीं, पाहुजा ने अपनी टिप्पणियों को न्यायिक सुधारों के अभियान का हिस्सा बताते हुए अपने बयान का बचाव किया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा था कि यदि ऐसे मामलों में सख्ती नहीं बरती गई तो भविष्य में न्यायपालिका के विरुद्ध इस तरह की टिप्पणियों को बढ़ावा मिल सकता है — इसी आधार पर उन्हें छह महीने के कारावास की सजा सुनाई गई।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार, पाहुजा को सजा के निलंबन या किसी अन्य राहत के लिए अब दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष अर्जी देनी होगी। उनकी अपील में तकनीकी खामियाँ दूर होने के बाद ही सर्वोच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई आगे बढ़ सकेगी। यह मामला सोशल मीडिया पर न्यायपालिका की आलोचना की सीमाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की बहस को नए सिरे से केंद्र में ला रहा है।