दिल्ली हाई कोर्ट ने सदानंद मास्टर के राज्यसभा नामांकन पर PIL खारिज, अनुच्छेद 80(3) विवाद समाप्त
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 29 मई 2026 को सी. सदानंद मास्टर के राज्यसभा नामांकन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि याचिका में उठाए गए तर्क कानूनी कसौटी पर टिकने में असफल रहे। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा माँगी गई राहत किसी भी आधार पर स्वीकार नहीं की जा सकती।
याचिका में क्या था आरोप
यह जनहित याचिका नई दिल्ली के वकील सुभाष थीक्कादन ने दायर की थी। उनका तर्क था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80(3) के अंतर्गत राज्यसभा में मनोनीत होने के लिए साहित्य, विज्ञान, कला या समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर की विशेष विशेषज्ञता अनिवार्य है।
याचिकाकर्ता के अनुसार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में सी. सदानंद मास्टर के इन क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। इसी आधार पर उनके नामांकन को असंवैधानिक बताया गया था।
अदालत की टिप्पणी और फैसला
दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुनवाई के शुरुआती चरण में ही याचिका पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि क्या ऐसे मामलों में किसी नामांकन को चुनौती देने के लिए न्यायिक रूप से स्वीकार्य और स्पष्ट मानक मौजूद हैं।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इस प्रकार के विषयों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ होती हैं। अंतिम फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी नियुक्ति पर केवल सार्वजनिक असहमति या सवाल उठाना उसे अवैध साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
सदानंद मास्टर का नामांकन
सी. सदानंद मास्टर को 12 जुलाई 2025 को भारत के राष्ट्रपति ने राज्यसभा के लिए मनोनीत किया था। उनके नामांकन की घोषणा के बाद सार्वजनिक क्षेत्र में बहस छिड़ी थी, जिसके बाद यह याचिका दायर की गई थी।
गौरतलब है कि राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में मनोनयन की परंपरा संविधान निर्माताओं की उस मंशा को दर्शाती है जिसमें विशिष्ट क्षेत्रों के विशेषज्ञों को संसद में प्रतिनिधित्व देने की कल्पना की गई थी। हालाँकि, इस मानक की व्याख्या को लेकर समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं।
न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ
यह फैसला उस व्यापक कानूनी प्रश्न को भी रेखांकित करता है कि राष्ट्रपति के मनोनयन अधिकार की न्यायिक समीक्षा किस हद तक संभव है। अदालत का रुख यह रहा कि संवैधानिक नियुक्तियों में न्यायपालिका का हस्तक्षेप तभी उचित है जब कोई स्पष्ट संवैधानिक उल्लंघन सिद्ध हो — मात्र असहमति नहीं।
इस फैसले के बाद सी. सदानंद मास्टर का राज्यसभा सदस्य के रूप में मनोनयन कानूनी रूप से निर्विवाद हो गया है। भविष्य में ऐसी किसी भी याचिका के लिए यह निर्णय एक महत्त्वपूर्ण मिसाल के रूप में काम कर सकता है।