वृंदा करात का बड़ा बयान: धर्म की आड़ में महिलाओं को दबाना संविधान-विरोधी
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की वरिष्ठ नेता वृंदा करात ने 4 सितंबर को नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान केरल के एक धर्मगुरु की विवादास्पद टिप्पणियों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धर्म के नाम पर ऐसी कोई भी मान्यता नहीं थोपी जा सकती, जो भारतीय संविधान के मूल्यों के विरुद्ध हो।
मुख्य बयान: संविधान सर्वोच्च
वृंदा करात ने कहा, 'धर्म के नाम पर आप किसी ऐसी मान्यता को नहीं थोप सकते, जो विशुद्ध रूप से संविधान के विरुद्ध है।' उन्होंने मनुवाद के विरोध का संदर्भ देते हुए जोड़ा कि जिस तरह मनुवाद में महिलाओं को दबाने का प्रावधान है, उसी तरह धर्म की आड़ लेकर महिलाओं को दबाना भी किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि परंपराओं का इस्तेमाल महिलाओं के दमन के लिए नहीं किया जा सकता।
संवैधानिक अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता
करात ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था के अनुसार धर्म का पालन करने का अधिकार देता है और वे इसका पूर्ण समर्थन करती हैं। उनके अनुसार, 'हम उस स्थिति को कभी स्वीकार नहीं करेंगे जो मूल रूप से हमारे संविधान के विरोध में है।' उन्होंने यह भी कहा कि समाज में इस विषय पर चर्चा होना स्वाभाविक और स्वागत-योग्य है।
केरल के धर्मगुरु की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया
केरल के एक पादरी ने कथित तौर पर बयान दिया था कि विवाह से पूर्व सभी लोगों का एचआईवी परीक्षण होना चाहिए। इस पर करात ने कहा कि वे इस बयान को 'पूरी तरह से अस्वीकार्य' मानती हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी धार्मिक विषय की आंतरिक बहस में हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन जब बात संविधान और महिलाओं के अधिकारों की हो, तो वे खुलकर बोलेंगी।
समाज में बराबरी की अवधारणा ज़रूरी
करात ने अपनी बात को समेटते हुए कहा कि 'समाज में बराबरी की अवधारणा होनी चाहिए' और किसी भी ऐसी व्यवस्था को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता जिसमें महिलाओं को दबाने का प्रावधान हो। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब धर्म, परंपरा और महिला अधिकारों को लेकर देशभर में बहस तेज़ हो रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ और तीखी हो सकती हैं।