दीवान रंजीत राय: 1947 में बारामूला के उस फैसले ने कश्मीर को पाकिस्तान के चंगुल से बचाया
सारांश
मुख्य बातें
लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय ने अक्टूबर 1947 में जम्मू-कश्मीर की धरती पर वह पराक्रम दिखाया, जिसने भारत के नवजात गणराज्य की पहली सैन्य परीक्षा में इतिहास की दिशा बदल दी। पहली सिख रेजिमेंट के इस कमांडिंग ऑफिसर ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर बारामूला को पाकिस्तानी घुसपैठियों से मुक्त कराया और 27 अक्टूबर 1947 को वीरगति प्राप्त की। उनके शौर्य को देश ने मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया।
कश्मीर संकट की पृष्ठभूमि
भारत की आज़ादी की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान समर्थित कबाइली लड़ाकों ने जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ कर दी। यह वही पड़ोसी देश था जो भारत से महज़ कुछ घंटों पहले एक अलग मुल्क बना था। स्थानीय कबाइलियों के भेष में छिपी पाकिस्तानी फ़ौज ने निर्दोष नागरिकों पर कहर बरपाना शुरू कर दिया।
पाकिस्तानी ब्रिगेडियर अकबर खान ने अपनी किताब 'रेडर्स इन कश्मीर' में स्वीकार किया है कि इस हमले में तकरीबन 11,000 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। उस समय जम्मू-कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी और वहाँ के शासक महाराजा हरि सिंह ने भारत या पाकिस्तान — किसी भी देश में तत्काल विलय से परहेज़ किया था। लेकिन पाकिस्तान की मंशा शुरू से ही उस रियासत को हड़पने की थी।
विलय-पत्र और भारतीय सेना का प्रवेश
24 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार को टेलीग्राम भेजकर तत्काल सैन्य सहायता की अपील की। इसके दो दिन बाद, 26 अक्टूबर 1947 को, उन्होंने भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए और जम्मू-कश्मीर आधिकारिक रूप से भारत का अभिन्न अंग बन गया।
बिना एक पल गँवाए, नई दिल्ली के पालम हवाई अड्डे से DC-3 विमान में पहली सिख रेजिमेंट की दो कंपनियाँ श्रीनगर की ओर रवाना हुईं। कश्मीरी जनता ने इन भारतीय फ़ौजियों को अपना रक्षक और मुहाफ़िज़ माना — और इस विश्वास को सार्थक करने की ज़िम्मेदारी आ पड़ी लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय पर।
बारामूला का वह निर्णायक फ़ैसला
दीवान रंजीत राय ने श्रीनगर में रुककर मोर्चाबंदी करने की बजाय एक साहसिक और रणनीतिक फ़ैसला लिया — वे सीधे बारामूला की ओर बढ़ गए, जहाँ पाकिस्तानी घुसपैठिए तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे। यह निर्णय उन्होंने अपने सैन्य अनुभव और परिस्थितियों की सटीक समझ के आधार पर लिया।
इतिहासकारों का मानना है कि यदि उस समय बारामूला को नहीं रोका जाता, तो घुसपैठिए श्रीनगर तक पहुँच सकते थे और घाटी का भविष्य बिल्कुल अलग होता। रंजीत राय के इसी साहसिक क़दम ने पाकिस्तानी रणनीति को धूल चटाई।
वीरगति और महावीर चक्र
भीषण युद्ध में अग्रिम मोर्चे पर डटकर दुश्मन से लोहा लेते हुए लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय 27 अक्टूबर 1947 को वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बलिदान ने भारतीय सेना को वह समय दिया जिसमें घाटी को सुरक्षित किया जा सका।
भारत सरकार ने उनकी असाधारण वीरता और अदम्य साहस को मान्यता देते हुए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र — देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार — से सम्मानित किया। आज भी 26 अक्टूबर — जम्मू-कश्मीर के विलय की वर्षगाँठ — पर उनकी शहादत को याद किया जाता है।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
1947 का कश्मीर युद्ध स्वतंत्र भारत की पहली सैन्य कार्रवाई था और दीवान रंजीत राय उसके पहले शहीद अधिकारियों में से एक। यह ऐसे समय में आया जब नवगठित भारतीय सेना के पास संसाधन सीमित थे और चुनौती असाधारण। गौरतलब है कि उनकी बारामूला यात्रा का फ़ैसला सैन्य पाठ्यक्रमों में आज भी रणनीतिक निर्णय-क्षमता के उदाहरण के रूप में पढ़ाया जाता है। उनकी शहादत भारत की संप्रभुता की नींव में उन अनगिनत नामों में से एक है, जिन्हें इतिहास के पन्ने अक्सर उतनी जगह नहीं दे पाते जितनी वे माँगती हैं।