डीपीडीपी कानून मीडिया की आज़ादी पर असर नहीं डालता, पत्रकारिता संविधान से सुरक्षित: अश्विनी वैष्णव
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो मीडिया की स्वतंत्र रूप से समाचार प्रकाशित करने की क्षमता को बाधित करे। उन्होंने जोर देकर कहा कि पत्रकारिता की आज़ादी संविधान से मिली हुई है और यह कानून उसे पूरी तरह सुरक्षित रखता है।
मंत्री का बयान और विवाद की पृष्ठभूमि
मंत्री वैष्णव का यह बयान ऐसे समय में आया है जब डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने इस कानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। 21 प्रमुख समाचार संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस संगठन का तर्क है कि कानून में पत्रकारिता संबंधी गतिविधियों के लिए स्पष्ट छूट न होने से खोजी पत्रकारिता और जनहित की खबरों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार, 27 अक्टूबर को डीएनपीए की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था, जिसके एक दिन बाद ही मंत्री ने यह सफाई दी।
पत्रकारों को किसकी अनुमति लेनी होगी?
मीडिया संगठनों की चिंताओं को सीधे संबोधित करते हुए वैष्णव ने कहा कि इस कानून के तहत किसी पत्रकार को किसी व्यक्ति पर खबर प्रकाशित करने से पहले उससे अनुमति लेने की कोई बाध्यता नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो पत्रकारों को खबर के स्रोत का खुलासा करने के लिए मजबूर करे।
उन्होंने कहा, 'परामर्श की प्रक्रिया एक महीने तक चली और इसमें उद्योग जगत भी शामिल था। कानून का कोई भी प्रावधान पत्रकारिता की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करता।'
कानून की पृष्ठभूमि और संवैधानिक आधार
संसद ने अगस्त 2023 में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम पारित किया था। यह भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और उसके प्रसंस्करण को नियंत्रित करने वाला व्यापक कानून है। वैष्णव ने स्मरण कराया कि यह कानून सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक निर्णय के बाद तैयार किया गया, जिसमें निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी।
अधिनियम के तहत व्यक्तियों की सहमति से या धारा 7 में उल्लिखित 'वैध उपयोगों' के आधार पर व्यक्तिगत डेटा का प्रसंस्करण किया जा सकता है। आलोचकों का कहना है कि यही 'वैध उपयोग' खंड पत्रकारिता के संदर्भ में अस्पष्ट है और इसमें स्पष्टता की आवश्यकता है।
डीएनपीए की आपत्तियाँ और अदालती लड़ाई
डीएनपीए की मुख्य चिंता यह है कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण से जुड़े प्रावधान पत्रकारिता पर असर डाल सकते हैं — विशेष रूप से उन मामलों में जहाँ खबरों के लिए व्यक्तिगत जानकारी जुटाना और उसका उपयोग अनिवार्य होता है। संगठन का तर्क है कि खोजी पत्रकारिता और नागरिकों के सूचना के अधिकार की रक्षा के लिए कानून में स्पष्ट और विशेष छूट होनी चाहिए।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय में डीएनपीए की याचिका पर सुनवाई जारी रहेगी और केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करना होगा। मंत्री के इस बयान से सरकार की स्थिति स्पष्ट हुई है, लेकिन अंतिम निर्णय अदालत पर निर्भर करेगा। यह मामला भारत में डिजिटल युग में प्रेस की स्वतंत्रता की सीमाओं को परिभाषित करने वाला एक महत्वपूर्ण कानूनी पड़ाव बन सकता है।