28 अक्टूबर 2026
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डीपीडीपी कानून मीडिया की आज़ादी पर असर नहीं डालता, पत्रकारिता संविधान से सुरक्षित: अश्विनी वैष्णव

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डीपीडीपी कानून मीडिया की आज़ादी पर असर नहीं डालता, पत्रकारिता संविधान से सुरक्षित: अश्विनी वैष्णव

सारांश

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 28 अक्टूबर को कहा कि डीपीडीपी अधिनियम, 2023 पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं करता — न स्रोत उजागर करने की बाध्यता है, न प्रकाशन से पहले अनुमति की। लेकिन 21 समाचार संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली डीएनपीए ने सर्वोच्च न्यायालय में इसे चुनौती दे रखी है।

मुख्य बातें

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 28 अक्टूबर 2026 को कहा कि डीपीडीपी अधिनियम, 2023 पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं करता।
पत्रकारों को खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेना अनिवार्य नहीं है।
कानून में खबर के स्रोत का खुलासा करने की भी कोई बाध्यता नहीं है।
डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) , जो 21 प्रमुख समाचार संगठनों का प्रतिनिधित्व करती है, ने इस कानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर को इस याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब माँगा।
संसद ने यह कानून अगस्त 2023 में पारित किया था; यह निजता को मौलिक अधिकार घोषित करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद तैयार हुआ।

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो मीडिया की स्वतंत्र रूप से समाचार प्रकाशित करने की क्षमता को बाधित करे। उन्होंने जोर देकर कहा कि पत्रकारिता की आज़ादी संविधान से मिली हुई है और यह कानून उसे पूरी तरह सुरक्षित रखता है।

मंत्री का बयान और विवाद की पृष्ठभूमि

मंत्री वैष्णव का यह बयान ऐसे समय में आया है जब डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने इस कानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। 21 प्रमुख समाचार संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस संगठन का तर्क है कि कानून में पत्रकारिता संबंधी गतिविधियों के लिए स्पष्ट छूट न होने से खोजी पत्रकारिता और जनहित की खबरों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार, 27 अक्टूबर को डीएनपीए की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था, जिसके एक दिन बाद ही मंत्री ने यह सफाई दी।

पत्रकारों को किसकी अनुमति लेनी होगी?

मीडिया संगठनों की चिंताओं को सीधे संबोधित करते हुए वैष्णव ने कहा कि इस कानून के तहत किसी पत्रकार को किसी व्यक्ति पर खबर प्रकाशित करने से पहले उससे अनुमति लेने की कोई बाध्यता नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो पत्रकारों को खबर के स्रोत का खुलासा करने के लिए मजबूर करे।

उन्होंने कहा, 'परामर्श की प्रक्रिया एक महीने तक चली और इसमें उद्योग जगत भी शामिल था। कानून का कोई भी प्रावधान पत्रकारिता की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करता।'

कानून की पृष्ठभूमि और संवैधानिक आधार

संसद ने अगस्त 2023 में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम पारित किया था। यह भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और उसके प्रसंस्करण को नियंत्रित करने वाला व्यापक कानून है। वैष्णव ने स्मरण कराया कि यह कानून सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक निर्णय के बाद तैयार किया गया, जिसमें निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी।

अधिनियम के तहत व्यक्तियों की सहमति से या धारा 7 में उल्लिखित 'वैध उपयोगों' के आधार पर व्यक्तिगत डेटा का प्रसंस्करण किया जा सकता है। आलोचकों का कहना है कि यही 'वैध उपयोग' खंड पत्रकारिता के संदर्भ में अस्पष्ट है और इसमें स्पष्टता की आवश्यकता है।

डीएनपीए की आपत्तियाँ और अदालती लड़ाई

डीएनपीए की मुख्य चिंता यह है कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण से जुड़े प्रावधान पत्रकारिता पर असर डाल सकते हैं — विशेष रूप से उन मामलों में जहाँ खबरों के लिए व्यक्तिगत जानकारी जुटाना और उसका उपयोग अनिवार्य होता है। संगठन का तर्क है कि खोजी पत्रकारिता और नागरिकों के सूचना के अधिकार की रक्षा के लिए कानून में स्पष्ट और विशेष छूट होनी चाहिए।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय में डीएनपीए की याचिका पर सुनवाई जारी रहेगी और केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करना होगा। मंत्री के इस बयान से सरकार की स्थिति स्पष्ट हुई है, लेकिन अंतिम निर्णय अदालत पर निर्भर करेगा। यह मामला भारत में डिजिटल युग में प्रेस की स्वतंत्रता की सीमाओं को परिभाषित करने वाला एक महत्वपूर्ण कानूनी पड़ाव बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की घोषणा है — कानूनी गारंटी नहीं। डीपीडीपी अधिनियम की धारा 7 में 'वैध उपयोग' की परिभाषा अस्पष्ट है, और पत्रकारिता के लिए कोई स्पष्ट छूट खंड नहीं है — यह वही खामी है जिसे डीएनपीए ने सर्वोच्च न्यायालय में उठाया है। मंत्री का मौखिक आश्वासन तब तक पर्याप्त नहीं होगा जब तक कि इसे या तो कानून में संशोधन के रूप में, या स्पष्ट नियमों के रूप में लिखित रूप न दिया जाए। यह मामला सिर्फ मीडिया का नहीं, बल्कि नागरिकों के सूचना के अधिकार का भी है — और सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भारत में डिजिटल युग की पत्रकारिता के लिए एक मिसाल बनेगा।
RashtraPress
28 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डीपीडीपी अधिनियम, 2023 क्या है और यह पत्रकारिता से कैसे जुड़ा है?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और उसके प्रसंस्करण को नियंत्रित करने वाला व्यापक कानून है, जिसे संसद ने अगस्त 2023 में पारित किया था। पत्रकारिता से इसका संबंध इसलिए है क्योंकि खबरें जुटाने में अक्सर व्यक्तिगत डेटा का उपयोग होता है, और आलोचकों का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं दी गई है।
अश्विनी वैष्णव ने डीपीडीपी कानून पर पत्रकारिता को लेकर क्या कहा?
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 28 अक्टूबर 2026 को कहा कि डीपीडीपी अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो मीडिया की स्वतंत्र रूप से खबरें प्रकाशित करने की क्षमता को बाधित करे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पत्रकारों को न तो किसी व्यक्ति पर खबर प्रकाशित करने से पहले उसकी अनुमति लेनी है और न ही खबर के स्रोत का खुलासा करना है।
डीएनपीए ने सुप्रीम कोर्ट में डीपीडीपी कानून को क्यों चुनौती दी है?
डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए), जो 21 प्रमुख समाचार संगठनों का प्रतिनिधित्व करती है, का तर्क है कि कानून में पत्रकारिता संबंधी गतिविधियों के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी पत्रकारिता और जनहित की खबरों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। संगठन की चिंता है कि डिजिटल डेटा प्रसंस्करण के प्रावधान उन मामलों में बाधा बन सकते हैं जहाँ खबरों के लिए व्यक्तिगत जानकारी जुटाना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या किया है?
सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को डीएनपीए की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब माँगा है। मामले की सुनवाई अभी जारी है और केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करना है।
क्या डीपीडीपी कानून में पत्रकारों के लिए कोई विशेष प्रावधान है?
कानून की धारा 7 में कुछ 'वैध उपयोगों' का उल्लेख है जिनके आधार पर सहमति के बिना भी डेटा का प्रसंस्करण हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता के लिए कोई स्पष्ट और अलग छूट खंड नहीं है। यही अस्पष्टता डीएनपीए की आपत्ति का केंद्र है, जबकि सरकार का कहना है कि पत्रकारिता की आज़ादी संविधान से सुनिश्चित है।
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