डॉ. राममनोहर लोहिया: बर्लिन से लौटकर चुना 'स्वदेशी समाजवाद', पश्चिमी विचारों को दी चुनौती
सारांश
Key Takeaways
- डॉ. राममनोहर लोहिया का जीवन संघर्ष और प्रेरणा से भरा हुआ था।
- उन्होंने 'स्वदेशी समाजवाद' का मार्ग चुना और जातिवाद के खिलाफ खड़े हुए।
- उनका '3 आना बनाम 15 आना' भाषण भारतीय राजनीति में एक मील का पत्थर है।
- लोहिया ने सामाजिक समानता के लिए 'सप्त क्रांति' का मंत्र दिया।
- उनके विचार आज भी भारतीय राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं।
नई दिल्ली, 22 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में हुआ था। उनका जीवन प्रारंभ से ही अद्वितीय रहा। केवल ढाई वर्ष की आयु में उनके सिर से मां का साया उठ गया, लेकिन इस व्यक्तिगत दुख ने उनके अंदर सामाजिक चेतना का बीजारोपण किया। उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं रही, बल्कि पड़ोस की विभिन् जातियों की महिलाओं ने उन्हें मातृत्व का स्नेह दिया।
एक छोटे बच्चे के रूप में विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच रहने का परिणाम था कि उनके अंदर जातिवाद और छुआछूत जैसी समस्याओं के खिलाफ विद्रोह का बीज अंकुरित हो गया था।
बर्लिन विश्वविद्यालय (जर्मनी) से अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में डॉक्टरेट करने के बाद, लोहिया जब भारत लौटे, तो वे पश्चिमी विचारों के प्रति बंधे हुए नहीं थे। उस समय जब भारतीय बुद्धिजीवी या तो पश्चिमी पूंजीवाद के अनुयायी थे या सोवियत रूस के कम्युनिज्म के, लोहिया ने 'स्वदेशी समाजवाद' का नया मार्ग अपनाया।
उन्होंने कार्ल मार्क्स की पारंपरिक थ्योरी को यह कहकर अस्वीकृत कर दिया कि भारत में वर्ग-संघर्ष केवल धन का नहीं है, बल्कि यहां 'जाति' वर्ग को निर्धारित करती है। उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक भारत में जाति व्यवस्था जीवित है, तब तक आर्थिक समानता की कोई भी चर्चा बेमानी है।
लोहिया की स्वतंत्रता की चाह केवल ब्रिटिश-शासित भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं थी। 18 जून 1946 को, जब भारत अपनी स्वतंत्रता का जश्न मनाने की तैयारी कर रहा था, लोहिया पुर्तगाली तानाशाहों की आंखों में धूल झोंककर गोवा पहुंच गए। वहां उन्होंने नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए पुर्तगालियों के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। आज भी गोवा में 18 जून को 'गोवा क्रांति दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
इतना ही नहीं, उन्होंने पड़ोसी देश नेपाल में निरंकुश 'राणा शासन' को उखाड़ फेंकने के लिए नेपाली राष्ट्रवादियों (जैसे बीपी कोइराला) को भारत में हथियार, पनाह और रणनीतिक समर्थन प्रदान किया। वे सचमुच में एक अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र सेनानी थे।
भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन लोहिया का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने महसूस किया कि सत्ता में बैठी कांग्रेस अब 'आम आदमी' की पार्टी नहीं, बल्कि 'अभिजात्य वर्ग' की पार्टी बन गई है। उन्होंने बिना किसी झिझक सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया और 'गैर-कांग्रेसवाद' का नारा दिया। उनका "3 आना बनाम 15 आना" का भाषण आज भी भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे प्रभावशाली और ऐतिहासिक भाषण माना जाता है।
सरकार द्वारा निर्धारित एक दिन में प्रति व्यक्ति आय 15 आना पर संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। डॉ. लोहिया ने कहा, "यह आंकड़ा पुनः समायोजित किया जाए, क्योंकि भारत की साठ प्रतिशत जनता की प्रति व्यक्ति आय केवल तीन आने प्रतिदिन है।" उन्होंने इसके पीछे के तथ्यों और आंकड़ों का हवाला देते हुए एक लंबा और रोचक भाषण दिया, जिसके बाद संसद में नेहरू मंत्रिमंडल के समक्ष गहन चर्चा हुई, जिसे संसद में अब तक की सबसे स्वस्थ बहस माना गया है।
लोहिया केवल सवाल नहीं उठाते थे, वे समाधान भी प्रदान करते थे। उन्होंने अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए 'सप्त क्रांति' (सात क्रांतियां) का अद्भुत मंत्र दिया। इसमें स्त्री-पुरुष समानता, जाति-प्रथा का उन्मूलन, रंगभेद का अंत, व्यक्तिगत निजता की रक्षा और आर्थिक समानता जैसे मुद्दे शामिल थे।
आज हम जिस 'पंचायती राज' और 'सत्ता के विकेंद्रीकरण' की बात करते हैं, उसका असली विचार लोहिया का 'चौखंभा राज्य' था। उनका सपना था कि सत्ता को चार खंभों (गांव, जिला, प्रांत और केंद्र) में समान रूप से विभाजित किया जाए, ताकि दिल्ली में बैठा नेता नहीं, बल्कि गांव का आम आदमी अपने निर्णय स्वयं ले सके।
उन्होंने 'अंग्रेजी हटाओ' और 'जाति तोड़ो' जैसे उग्र आंदोलनों का नेतृत्व किया। उनका अंग्रेजी का विरोध भाषा से नहीं, बल्कि उस प्रणाली से था जो अंग्रेजी के नाम पर गरीबों और ग्रामीणों को शिक्षा और सत्ता से दूर रखती थी। उन्होंने सामूहिक भोज की शुरुआत की जहां सभी जातियों के लोग एक साथ भोजन करते थे।
1990 के दशक में जिस 'मंडल आयोग' ने पिछड़ों (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया और भारतीय राजनीति की धारा बदल दी, उसकी वैचारिक नींव दशकों पहले लोहिया ने ही "पिछड़े पावें सौ में साठ" के नारे के साथ रखी थी। आज उत्तर भारत की राजनीति में सक्रिय कई क्षेत्रीय पार्टियां लोहिया के विचारों की उपज हैं।
12 अक्टूबर 1967 को इस महान 'विद्रोही संन्यासी' ने दिल्ली में अंतिम सांस ली। उनके पास न तो कोई बैंक बैलेंस था, न कोई संपत्ति और न ही कोई अपना घर।