26 अक्टूबर 2026
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थुम्मिडीहेट्टी परियोजना: फडणवीस का स्वतंत्र मूल्यांकन का ऐलान, संयुक्त समिति होगी गठित

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थुम्मिडीहेट्टी परियोजना: फडणवीस का स्वतंत्र मूल्यांकन का ऐलान, संयुक्त समिति होगी गठित

सारांश

तेलंगाना की थुम्मिडीहेट्टी बैराज को 148 से 152 मीटर ऊंचा करने की माँग पर महाराष्ट्र ने तत्काल 'हाँ' नहीं कहा — बल्कि स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन और संयुक्त समिति का रास्ता चुना। फडणवीस का यह कदम सहयोग और सुरक्षा के बीच सधा हुआ संतुलन है।

मुख्य बातें

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 26 अक्टूबर 2026 को घोषणा की कि महाराष्ट्र थुम्मिडीहेट्टी परियोजना की ऊंचाई वृद्धि का स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन करेगा।
तेलंगाना बैराज की ऊंचाई 148 मीटर से बढ़ाकर 152 मीटर करना चाहता है, जिससे महाराष्ट्र में लगभग 2,300 एकड़ भूमि के जलमग्न होने की संभावना है।
दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों और सिंचाई सचिवों की संयुक्त समिति गठित की जाएगी जो विस्तृत तकनीकी समीक्षा करेगी।
परियोजना का उद्देश्य आदिलाबाद के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में 2 लाख एकड़ भूमि की सिंचाई करना है।
जल आवंटन और वैधानिक स्वीकृतियों पर अंतिम निर्णय केंद्रीय जल आयोग (CWC) के माध्यम से होगा।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 26 अक्टूबर 2026 को घोषणा की कि महाराष्ट्र, तेलंगाना की थुम्मिडीहेट्टी सिंचाई परियोजना की प्रस्तावित ऊंचाई वृद्धि का स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन करेगा। यह निर्णय उस उच्चस्तरीय बैठक के बाद आया जिसमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी और सिंचाई मंत्री उत्तम कुमार रेड्डी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने बैराज की ऊंचाई 148 मीटर से बढ़ाकर 152 मीटर करने की औपचारिक सहमति माँगी।

बैठक की पृष्ठभूमि

थुम्मिडीहेट्टी परियोजना तेलंगाना के कुमराम भीम आसिफाबाद जिले (पूर्व में आदिलाबाद) के कौतला मंडल में प्राणहिता नदी — जो गोदावरी की सहायक नदी है — पर स्थित है। यह परियोजना डॉ. बीआर अंबेडकर प्राणहिता-चेवेल्ला परियोजना का एक प्रमुख घटक रही है और इसका उद्देश्य आदिलाबाद जिले के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में लगभग 2 लाख एकड़ भूमि की सिंचाई सुनिश्चित करना है।

तेलंगाना 152 मीटर की बैराज ऊंचाई के लिए दबाव बना रहा है ताकि जल उपयोग और गुरुत्वाकर्षण प्रवाह को अधिकतम किया जा सके। इससे महाराष्ट्र में लगभग 2,300 एकड़ भूमि के जलमग्न होने की संभावना है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र की ओर से 150 मीटर जैसे कम ऊंचाई वाले विकल्पों पर विचार-विमर्श जारी है ताकि अपनी सीमा में जलमग्नता को सीमित रखा जा सके।

मुख्यमंत्री फडणवीस का रुख

मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि महाराष्ट्र तेलंगाना की सहायता के प्रति सकारात्मक है, बशर्ते महाराष्ट्र के नागरिकों को कोई नुकसान न हो। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पिछली स्वीकृतियों से यह सामने आया है कि वास्तविक जलमग्न क्षेत्र प्रारंभिक अनुमानों से अधिक रहा है — इसीलिए स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन अनिवार्य माना गया।

यह ऐसे समय में आया है जब अंतर-राज्यीय जल विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं। गौरतलब है कि कावेरी और कृष्णा नदी जैसे विवादों की तरह, यह मामला भी दो पड़ोसी राज्यों के बीच संवाद और तकनीकी साक्ष्य की परीक्षा है।

संयुक्त समिति और तकनीकी मूल्यांकन

सरकार ने दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों और सिंचाई सचिवों की एक संयुक्त समिति गठित करने का आदेश दिया है। इस संयुक्त अध्ययन में तीन प्रमुख पहलुओं की जाँच की जाएगी: परियोजना स्थलों के स्थानांतरण से जलमग्न क्षेत्रों पर प्रभाव, संबंधित वन्यजीव अभयारण्यों पर असर, और आवश्यक गैर-नदी तल भूमि की सीमा।

महाराष्ट्र के अध्ययन को लेकर तेलंगाना द्वारा उठाई गई किसी भी तकनीकी आपत्ति या विसंगति की समीक्षा दोनों राज्यों के अधिकारी संयुक्त रूप से करेंगे और जहाँ आवश्यक होगा, स्वतंत्र विशेषज्ञों से परामर्श लिया जाएगा।

केंद्रीय जल आयोग की भूमिका

मुख्यमंत्री फडणवीस ने स्पष्ट किया कि जल आवंटन और वैधानिक स्वीकृतियों से जुड़े मामले केंद्रीय जल आयोग (CWC) के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। CWC द्वारा महाराष्ट्र से प्रतिक्रिया माँगे जाने के बाद राज्य तथ्यात्मक निष्कर्षों के आधार पर अपना आधिकारिक रुख प्रस्तुत करेगा। अंतिम निर्णय स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा और उसके बाद की चर्चाओं के उपरांत ही लिया जाएगा।

बैठक में उपस्थित प्रमुख अधिकारी

इस उच्चस्तरीय बैठक में महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन, तेलंगाना के सिंचाई मंत्री उत्तम कुमार रेड्डी, महाराष्ट्र के मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल, तेलंगाना के मुख्य सचिव संजय जाजू, अतिरिक्त मुख्य सचिव लोकेश चंद्र, प्रधान सचिव श्रीकर परदेशी, जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव एकनाथ दावले, सचिव जयंत बोरकर और प्रकाश मिसल सहित दोनों राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी व्यक्तिगत रूप से और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सम्मिलित रहे।

आगे की कार्रवाई संयुक्त समिति की रिपोर्ट और CWC की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी — और यह बैठक दो राज्यों के बीच जल-साझाकरण के संवेदनशील मसले पर संवाद की शुरुआत भर है।

संपादकीय दृष्टिकोण

न 'ना', बल्कि एक प्रक्रिया है जो निर्णय को आगे खिसकाती है। असली सवाल यह है कि क्या संयुक्त समिति की समयसीमा और जनादेश स्पष्ट रूप से परिभाषित किए जाएंगे, या यह भी उन अनगिनत अंतर-राज्यीय तकनीकी समितियों की तरह अनिश्चितकाल के लिए लंबित रहेगी जो भारत के जल-विवाद इतिहास में भरी पड़ी हैं। पिछले जलमग्नता अनुमानों का 'वास्तविकता से अधिक' साबित होना — जैसा फडणवीस ने स्वयं स्वीकार किया — यह संकेत देता है कि तकनीकी आधार पहले से ही विवादित है। बिना बाध्यकारी समयसीमा और CWC के स्पष्ट निर्देश के, यह संवाद समाधान की दिशा में कम और राजनीतिक स्थगन की दिशा में अधिक जा सकता है।
RashtraPress
26 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

थुम्मिडीहेट्टी परियोजना क्या है और यह विवाद क्यों है?
थुम्मिडीहेट्टी परियोजना तेलंगाना के कुमराम भीम आसिफाबाद जिले में प्राणहिता नदी पर स्थित एक सिंचाई बैराज है, जिसका उद्देश्य आदिलाबाद के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में लगभग 2 लाख एकड़ भूमि की सिंचाई करना है। विवाद इसलिए है क्योंकि तेलंगाना इसकी ऊंचाई 148 से 152 मीटर बढ़ाना चाहता है, जिससे महाराष्ट्र की लगभग 2,300 एकड़ भूमि जलमग्न हो सकती है।
महाराष्ट्र ने तेलंगाना के अनुरोध पर क्या फैसला किया?
महाराष्ट्र ने तत्काल सहमति देने की बजाय स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन का रास्ता चुना है। मुख्यमंत्री फडणवीस ने दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों और सिंचाई सचिवों की संयुक्त समिति गठित करने का आदेश दिया है जो विस्तृत तकनीकी अध्ययन करेगी।
संयुक्त समिति किन मुद्दों की जाँच करेगी?
संयुक्त समिति तीन प्रमुख पहलुओं की जाँच करेगी: परियोजना स्थलों के स्थानांतरण से जलमग्न क्षेत्रों पर प्रभाव, संबंधित वन्यजीव अभयारण्यों पर असर, और आवश्यक गैर-नदी तल भूमि की सीमा। तेलंगाना द्वारा उठाई गई तकनीकी आपत्तियों की समीक्षा भी संयुक्त रूप से की जाएगी।
इस परियोजना में केंद्रीय जल आयोग (CWC) की क्या भूमिका है?
जल आवंटन और वैधानिक स्वीकृतियों से जुड़े मामले केंद्रीय जल आयोग (CWC) के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। CWC द्वारा महाराष्ट्र से प्रतिक्रिया माँगे जाने के बाद राज्य तथ्यात्मक निष्कर्षों के आधार पर अपना आधिकारिक रुख प्रस्तुत करेगा।
परियोजना पर अंतिम निर्णय कब तक अपेक्षित है?
अंतिम निर्णय संयुक्त समिति की तकनीकी समीक्षा पूरी होने और उसके बाद दोनों राज्यों के बीच चर्चा के उपरांत लिया जाएगा। अभी कोई निश्चित समयसीमा घोषित नहीं की गई है और CWC की प्रक्रिया भी इस समयरेखा को प्रभावित करेगी।
राष्ट्र प्रेस
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