डोडा की महिलाओं को 'फ्लोरीकल्चर मिशन' से नई राह, गेंदे की खेती से ₹3 लाख से अधिक की कमाई
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की फ्लोरीकल्चर मिशन पहल जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का सशक्त माध्यम बनकर उभरी है। भद्रवाह के सार्तिंगल गाँव और अथखर घाटी क्षेत्र में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़े महिला स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) अब व्यावसायिक फूल खेती के ज़रिए न केवल अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं, बल्कि कृषि क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका भी निभा रही हैं। यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब डोडा जैसे पहाड़ी जिलों में महिला किसानों की आर्थिक भागीदारी परंपरागत रूप से सीमित रही है।
मुख्य घटनाक्रम
डोडा की महिलाओं ने सीएसआईआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन (सीएसआईआर-आईआईआईएम) के सहयोग से बंजर भूमि पर गेंदे (मैरीगोल्ड) की व्यावसायिक खेती शुरू की। इस पहल का नेतृत्व एनआरएलएम की क्लस्टर कोऑर्डिनेटर नादिया फारूक कर रही हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की इस योजना के तहत महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री, आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया।
नादिया फारूक ने बताया कि शुरुआत में उनके क्लस्टर की पाँच महिलाओं ने परीक्षण के तौर पर बंजर ज़मीन पर गेंदे की खेती शुरू की थी। यह प्रयोग बेहद सफल साबित हुआ और पिछले डेढ़ महीने से ये महिलाएँ जम्मू के सप्लायर्स को फूल बेच रही हैं।
पारंपरिक खेती से फूलों की ओर सफर
नादिया फारूक के अनुसार, 'पहले हम पारंपरिक खेती — मक्का — करते थे। फिर हम आईआईआईएम के रूरल ऑफिसर से मिले और उन्होंने हमें गेंदे की खेती के लिए प्रेरित किया। उन्हीं से बीज लेकर हमने इसकी शुरुआत की।' उन्होंने बताया कि सामान्य दिनों में गेंदे के फूल ₹30–35 प्रति किलो बिकते हैं, जबकि नवरात्रि जैसे त्योहारी मौसम में माँग बढ़ने पर यह कीमत ₹60 प्रति किलो तक पहुँच गई। गौरतलब है कि फेस्टिव सीजन की यह मूल्य वृद्धि किसानों की आय को एक ही मौसम में दोगुना कर देती है।
महिला सशक्तिकरण का प्रेरणादायक उदाहरण
इस पहल से जुड़ी रानी नामक महिला किसान स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भरता का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आई हैं। उम्मीद योजना से पिछले आठ वर्षों से जुड़ी रानी ने पहले एक छोटे कारोबार से अपनी उद्यमशील यात्रा शुरू की थी और पिछले तीन वर्षों से गेंदे की खेती भी कर रही हैं। उनके अनुसार वह अब तक बाज़ार में ₹3 लाख से अधिक मूल्य के गेंदे के फूल बेच चुकी हैं, जिससे उनके परिवार को अतिरिक्त आय का मज़बूत स्रोत मिला है।
रानी ने बताया कि फ्लोरीकल्चर विभाग की ओर से बीज, प्रशिक्षण और नियमित जागरूकता कार्यक्रमों का लाभ मिल रहा है, जिससे खेती की गुणवत्ता और उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
समुदाय में जागरूकता और विस्तार
नादिया फारूक के नेतृत्व में यह समूह अब अपने क्षेत्र के अन्य किसानों को भी पारंपरिक खेती के साथ गेंदे की खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है। समूह उन्हें प्रशिक्षण, बीज और आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करा रहा है। यह उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें सरकार-समर्थित कृषि मिशन पहाड़ी और दूरदराज़ के इलाकों में महिलाओं को मुख्यधारा की आर्थिक गतिविधियों से जोड़ रहे हैं।
आगे की राह
सीएसआईआर-आईआईआईएम के सहयोग से यह पहल डोडा के अन्य गाँवों तक विस्तारित होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को जिले भर में दोहराया जाए, तो हज़ारों महिला किसानों की आय में ठोस बढ़ोतरी संभव है। फ्लोरीकल्चर मिशन की यह सफलता दर्शाती है कि सही तकनीकी सहायता और बाज़ार से जुड़ाव मिले तो बंजर ज़मीन भी आजीविका का आधार बन सकती है।