राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2025: निर्मला सीतारमण की अपील — हथकरघा अपनाएं, बुनकर परिवारों को मजबूत करें
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 7 अगस्त 2025 को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर देशवासियों से भावनात्मक अपील की कि वे हथकरघा उत्पादों को अपनाएं और उन लाखों बुनकर परिवारों की आजीविका को सहारा दें जो इस पारंपरिक कला पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा कि हथकरघा महज एक वस्त्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, विरासत और आत्मनिर्भरता का जीवंत प्रतीक है। वित्त मंत्री कार्यालय ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर उनका वीडियो संदेश भी साझा किया।
स्वदेशी आंदोलन की विरासत से जुड़ा दिवस
वित्त मंत्री कार्यालय द्वारा साझा संदेश में रेखांकित किया गया कि राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हमें 1905 के स्वदेशी आंदोलन की याद दिलाता है, जब देशवासियों ने विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर स्वदेशी उत्पादों को अपनाने का संकल्प लिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में इस ऐतिहासिक तिथि को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में समर्पित किया, ताकि देश की समृद्ध बुनाई परंपरा को सम्मान और नई पहचान मिल सके। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब वैश्विक फास्ट-फैशन उद्योग के दबाव में पारंपरिक बुनकरों की आजीविका संकट में है।
हर राज्य की अपनी बुनाई पहचान
वीडियो संदेश में सीतारमण ने देश की सांस्कृतिक विविधता को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत का हर राज्य अपनी विशिष्ट हथकरघा परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। उन्होंने असम, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात और मध्य प्रदेश का उल्लेख करते हुए बताया कि प्रत्येक राज्य की अपनी अलग बुनाई शैली और पारंपरिक परिधान हैं। इस अवसर पर उन्होंने स्वयं असम की पारंपरिक मेखला-चादर धारण की और इसे सबसे आरामदायक पारंपरिक परिधानों में से एक बताया।
बुनकरों की मेहनत को मिले सम्मान
सीतारमण ने कहा कि चाहे रेशम हो या सूती वस्त्र, प्रत्येक हथकरघा उत्पाद उन बुनकर परिवारों की मेहनत, कला और समर्पण की कहानी कहता है जो इन्हें बनाते हैं। उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि अधिक से अधिक लोग हथकरघा उत्पादों का उपयोग करें। गौरतलब है कि हथकरघा क्षेत्र भारत में कृषि के बाद सबसे बड़ा ग्रामीण रोजगार प्रदाता है और लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है।
आम जनता पर असर
वित्त मंत्री की यह अपील उस व्यापक नीतिगत संदर्भ में आई है जिसमें सरकार 'वोकल फॉर लोकल' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियानों के तहत स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। हथकरघा उत्पाद खरीदना न केवल सांस्कृतिक विरासत को संजोना है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा सहयोग देना भी है।
आगे की राह
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर इस तरह की उच्चस्तरीय अपील बुनकर समुदायों तक सरकारी संवेदनशीलता का संकेत देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक नीतिगत समर्थन — जैसे बाजार पहुंच, डिजिटल प्लेटफॉर्म और उचित मूल्य निर्धारण — को व्यावहारिक रूप नहीं दिया जाता, केवल भावनात्मक अपील से बुनकरों की आर्थिक स्थिति में स्थायी सुधार संभव नहीं होगा।