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डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड: IFSO ने ₹67.30 लाख की ठगी में जनकपुरी के बुजुर्ग को बचाया

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डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड: IFSO ने ₹67.30 लाख की ठगी में जनकपुरी के बुजुर्ग को बचाया

सारांश

दिल्ली पुलिस की IFSO टीम ने मनी ट्रेल की पड़ताल से जनकपुरी के एक अकेले बुजुर्ग को ₹67.30 लाख की डिजिटल अरेस्ट ठगी से बचाया — रकम होल्ड कराई, परिवार को बुलाया और हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई। यह मामला प्रोएक्टिव पुलिसिंग की मिसाल है।

मुख्य बातें

IFSO यूनिट ने 20 सितंबर 2026 को ₹67.30 लाख के डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में जनकपुरी, दिल्ली के एक वरिष्ठ नागरिक को समय रहते सहायता पहुँचाई।
मनी ट्रेल जाँच में एक्सिस बैंक में लेयर-1 म्यूल अकाउंट और साउथ इंडियन बैंक सेविंग्स अकाउंट का खुलासा हुआ।
टीम में इंस्पेक्टर परवीन कुमार , हेड कॉन्स्टेबल मनोज और महिला कॉन्स्टेबल मीनाक्षी शामिल थे; बीट कॉन्स्टेबल आरके मीणा को पीड़ित के घर भेजा गया।
पुलिस ने हेल्पलाइन 1930 के ज़रिए शिकायत दर्ज कराई और ठगी की रकम होल्ड कराने की प्रक्रिया शुरू की।
दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया: भारतीय कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी कोई व्यवस्था नहीं है; कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर पैसे नहीं माँगती।

दिल्ली पुलिस की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशन्स (IFSO) यूनिट की 'प्रोएक्टिव विक्टिम आइडेंटिफिकेशन एंड प्रोटेक्शन टीम' ने 20 सितंबर 2026 को एक डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड मामले में पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी निवासी एक वरिष्ठ नागरिक तक समय रहते सहायता पहुँचाई। इस साइबर धोखाधड़ी में करीब ₹67.30 लाख की रकम शामिल थी। पुलिस की यह त्वरित कार्रवाई नेशनल साइबरक्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज एक शिकायत की जाँच के दौरान सामने आए मनी ट्रेल के आधार पर संभव हुई।

मुख्य घटनाक्रम

IFSO टीम में इंस्पेक्टर परवीन कुमार, हेड कॉन्स्टेबल मनोज और महिला कॉन्स्टेबल मीनाक्षी शामिल थे। मामले की जाँच के दौरान टीम ने संबंधित बैंक खातों के लेन-देन का विस्तृत विश्लेषण किया। मनी ट्रेल की पड़ताल में एक्सिस बैंक में एक लेयर-1 म्यूल अकाउंट का पता चला, जो कर्नाटक के नागौरी स्थित एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के नाम पर पंजीकृत था।

इस खाते में रकम के स्रोत की आगे पड़ताल करने पर साउथ इंडियन बैंक का एक सेविंग्स अकाउंट सामने आया। पुलिस को प्रारंभिक तौर पर आशंका हुई कि यह खाता या तो साइबर ठगों द्वारा सीधे इस्तेमाल किया जा रहा है, या फिर खाताधारक स्वयं किसी धोखाधड़ी का शिकार होकर अनजाने में ठगों के खाते में रकम भेज रहा है।

बुजुर्ग पीड़ित की पहचान और तत्काल सहायता

खाते की सब्सक्राइबर डिटेल के आधार पर पुलिस ने खाताधारक की पहचान की, जिनका पता जनकपुरी, पश्चिमी दिल्ली में मिला। IFSO टीम ने तत्काल उनसे संपर्क किया। पुलिस के अनुसार, वह अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिक थे और घटना को लेकर अत्यंत परेशान थे।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए IFSO टीम ने जनकपुरी के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) से समन्वय किया और बीट कॉन्स्टेबल आरके मीणा को तत्काल उनके घर भेजा गया। इसके साथ ही पुलिस ने पीड़ित के परिवार के सदस्यों से संपर्क कर उन्हें मौके पर बुलाया, ताकि बुजुर्ग को भावनात्मक और पारिवारिक सहयोग मिल सके।

शिकायत दर्ज और रकम होल्ड

पुलिस ने पीड़ित को राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 के माध्यम से शिकायत दर्ज कराने में सहायता की। शिकायत दर्ज होने के बाद ठगी की रकम को ट्रैक कर होल्ड कराने और आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की कार्रवाई की गई। गौरतलब है कि घटना की त्वरित सूचना मिलने से ठगी की रकम को रोकने की संभावना उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाती है।

डिजिटल अरेस्ट: कानून में कोई प्रावधान नहीं

दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि भारतीय कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। पुलिस के अनुसार, कोई भी सरकारी एजेंसी — चाहे वह पुलिस हो, CBI, ED, कस्टम्स, अदालत या कोई अन्य — वीडियो कॉल के ज़रिए किसी नागरिक को गिरफ्तार करने या पूछताछ के नाम पर पैसे जमा करने के लिए नहीं कहती। यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिक इसके निशाने पर हैं।

नागरिकों के लिए सतर्कता के उपाय

पुलिस ने लोगों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों, से अपील की है कि ऐसी संदिग्ध कॉल आने पर घबराएँ नहीं, किसी भी स्थिति में पैसे ट्रांसफर न करें और तुरंत कॉल काटकर परिवार के सदस्यों को सूचित करें। साइबर ठगी की स्थिति में हेल्पलाइन नंबर 1930 पर तत्काल शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी गई है। IFSO की यह पहल डिजिटल अपराध की रोकथाम में प्रोएक्टिव पुलिसिंग की मिसाल बन सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक व्यापक सच्चाई को भी उजागर करती है — डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड अब कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि एक संगठित और बहु-स्तरीय साइबर अपराध उद्योग बन चुका है जो विशेष रूप से अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाता है। म्यूल अकाउंट नेटवर्क का कर्नाटक तक फैलाव दिखाता है कि ये गिरोह राज्य सीमाओं से परे काम करते हैं, जिससे समन्वित राष्ट्रीय प्रतिक्रिया की ज़रूरत और भी स्पष्ट होती है। हेल्पलाइन 1930 की उपयोगिता तभी सिद्ध होती है जब नागरिक तुरंत सूचित करें — लेकिन जागरूकता की कमी अभी भी सबसे बड़ी बाधा है।
RashtraPress
6 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड क्या है?
डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड एक साइबर ठगी है जिसमें अपराधी पुलिस, CBI, ED या अन्य सरकारी एजेंसी के अधिकारी बनकर वीडियो कॉल के ज़रिए पीड़ित को 'डिजिटल अरेस्ट' का डर दिखाते हैं और पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं। दिल्ली पुलिस के अनुसार, भारतीय कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी कोई व्यवस्था नहीं है।
IFSO यूनिट ने जनकपुरी के बुजुर्ग की मदद कैसे की?
IFSO की प्रोएक्टिव विक्टिम आइडेंटिफिकेशन टीम ने नेशनल साइबरक्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल की शिकायत से मनी ट्रेल खंगाला, एक्सिस बैंक म्यूल अकाउंट और साउथ इंडियन बैंक सेविंग्स अकाउंट का पता लगाया और खाताधारक की पहचान कर जनकपुरी में उनके घर पुलिस भेजी। इसके बाद परिवार को बुलाया गया और हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई गई।
साइबर ठगी होने पर कहाँ शिकायत करें?
साइबर ठगी की स्थिति में तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या नेशनल साइबरक्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें। जितनी जल्दी शिकायत होगी, ठगी की रकम को ट्रैक कर होल्ड कराने की संभावना उतनी अधिक होती है।
म्यूल अकाउंट क्या होता है और इसका साइबर फ्रॉड से क्या संबंध है?
म्यूल अकाउंट वह बैंक खाता है जिसे साइबर ठग ठगी की रकम को स्थानांतरित करने और छुपाने के लिए इस्तेमाल करते हैं — कभी किसी फर्जी कंपनी के नाम पर, कभी किसी अनजान व्यक्ति के खाते के ज़रिए। इस मामले में कर्नाटक की एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का एक्सिस बैंक खाता लेयर-1 म्यूल अकाउंट के रूप में सामने आया।
डिजिटल अरेस्ट कॉल आने पर क्या करें?
दिल्ली पुलिस के अनुसार, ऐसी कॉल आने पर तुरंत घबराएँ नहीं, कोई पैसा ट्रांसफर न करें और कॉल काटकर परिवार के किसी सदस्य को सूचित करें। इसके बाद हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराएँ। याद रखें कि कोई भी वैध सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर पैसे नहीं माँगती।
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