पेट्रोल-डीजल ₹10-12 प्रति लीटर और महंगे हो सकते हैं: एचएसबीसी की प्रांजुल भंडारी
सारांश
मुख्य बातें
एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने 9 जून को कहा कि यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और भारत का तेल आयात बिल इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में और वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, ₹10 से ₹12 प्रति लीटर की बढ़ोतरी अधिक संतुलित और उचित होती, ताकि वैश्विक तेल मूल्य झटके का बोझ सरकार और उपभोक्ताओं के बीच समान रूप से बंट सके।
कच्चे तेल की लागत और तेल कंपनियों पर दबाव
भंडारी ने बताया कि पिछले एक महीने में भारत में आयातित कच्चे तेल की वास्तविक लागत (लैंडेड कॉस्ट) करीब 110 डॉलर प्रति बैरल रही है। उन्होंने कहा, 'इन स्तरों पर तेल वितरण कंपनियों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। सरकार ने इस बोझ का बड़ा हिस्सा अपने ऊपर लिया है और तेल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में कटौती की है।'
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक कच्चे तेल बाजार में लगातार अस्थिरता बनी हुई है, जिससे ऊर्जा आयात की लागत पर दबाव बढ़ता जा रहा है। गौरतलब है कि घरेलू स्तर पर नियंत्रित खुदरा कीमतें और अंतरराष्ट्रीय ईंधन कीमतों के बीच बढ़ता अंतर तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) की वित्तीय स्थिति को लगातार कमज़ोर कर रहा है।
उपभोक्ताओं पर पड़ेगा बोझ
भंडारी ने स्पष्ट किया कि ऊंची वैश्विक तेल कीमतों का पूरा बोझ केवल सरकार नहीं उठा सकती। उन्होंने कहा, 'इस बोझ का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं को भी उठाना चाहिए। खुदरा ईंधन कीमतों में पहले ही ₹7.5 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है, लेकिन मुझे लगता है कि इसमें थोड़ी और बढ़ोतरी की जा सकती है।'
उनके अनुसार, ₹10 से ₹12 प्रति लीटर की कुल वृद्धि अधिक उचित होती, क्योंकि इससे वैश्विक तेल कीमतों के झटके का बोझ सरकार और उपभोक्ताओं के बीच अधिक संतुलित तरीके से बंटता। यदि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो आगे और बढ़ोतरी संभव है।
सरकार की स्थिति और अंडर-रिकवरी
इस सप्ताह की शुरुआत में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव प्रवीण खन्नूजा ने नई दिल्ली में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान बताया था कि देश की तेल विपणन कंपनियाँ अभी भी भारी वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं। उन्होंने कहा कि कंपनियों को प्रतिदिन लगभग ₹600 से ₹700 करोड़ का अंडर-रिकवरी नुकसान हो रहा है, जिसमें एलपीजी बिक्री पर होने वाला घाटा भी शामिल है।
खन्नूजा के अनुसार यह नुकसान मुख्य रूप से खुदरा बिक्री कीमतों और अंतरराष्ट्रीय ईंधन कीमतों के बीच बढ़ते अंतर के कारण हो रहा है। सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर इस दबाव को कुछ हद तक कम करने की कोशिश की है, परंतु वैश्विक कीमतों में स्थिरता न आने पर यह राहत सीमित साबित हो सकती है।
आगे क्या होगा
विशेषज्ञों की राय में यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो सरकार के सामने दो ही विकल्प बचते हैं — या तो राजकोषीय दबाव झेलते हुए सब्सिडी जारी रखे, या खुदरा ईंधन कीमतों में और वृद्धि करे। भंडारी की यह टिप्पणी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब आम उपभोक्ता पहले से ही महंगाई के दबाव में हैं और किसी भी ईंधन मूल्य वृद्धि का असर परिवहन लागत से लेकर खाद्य वस्तुओं तक व्यापक रूप से पड़ सकता है।