28 अक्टूबर 2026
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मद्रास हाईकोर्ट मदुरै बेंच का बड़ा फैसला: हिंदू देवी-देवताओं में आस्था न रखने वाले गैर-हिंदुओं को मंदिर प्रवेश नहीं

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मद्रास हाईकोर्ट मदुरै बेंच का बड़ा फैसला: हिंदू देवी-देवताओं में आस्था न रखने वाले गैर-हिंदुओं को मंदिर प्रवेश नहीं

सारांश

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने स्पष्ट कर दिया — जो गैर-हिंदू देवी-देवताओं के प्रति आस्था या सम्मान की अंडरटेकिंग नहीं देते, उन्हें आगमिक मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलेगा। यह फैसला हिंदू मुन्नानी की जनहित याचिका पर आया और तमिलनाडु के हज़ारों मंदिरों की प्रवेश नीति को प्रभावित कर सकता है।

मुख्य बातें

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच ने 28 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाया कि हिंदू देवी-देवताओं के प्रति सम्मान न रखने वाले गैर-हिंदुओं को मंदिर प्रवेश नहीं मिलेगा।
स्वामीनाथन और जस्टिस मुरुगन की डिवीजन बेंच ने यह निर्णय सुनाया।
जो गैर-हिंदू अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर करके देवी-देवताओं के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं, उन्हें प्रवेश की अनुमति दी जा सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान सर्वोच्च है और हिंदुओं के किसी वर्ग को मंदिर प्रवेश से रोकने वाले आगमिक निर्देश आज स्वीकार्य नहीं।
तमिलनाडु सरकार ने तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं के पालन का आश्वासन दिया।

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच ने 28 अक्टूबर 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति सार्वजनिक रूप से अन्य धर्मों के प्रतीक धारण करते हैं और हिंदू देवी-देवताओं के प्रति आस्था या सम्मान व्यक्त नहीं करते, उन्हें हिंदू मंदिर परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस मुरुगन की डिवीजन बेंच ने यह निर्णय हिंदू मुन्नानी के मदुरै जिला समन्वयक थंगम वेंकटेश द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।

याचिका में क्या माँगा गया था

याचिकाकर्ता थंगम वेंकटेश ने अदालत से माँग की थी कि गैर-हिंदुओं को मंदिरों के प्रतिबंधित गर्भगृहों और मंडपों में प्रवेश से रोका जाए। उन्होंने तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम और हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम के प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की भी अपील की।

याचिका में यह भी अनुरोध किया गया था कि मंदिरों में प्रमुख स्थानों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने वाले नोटिस बोर्ड लगाए जाएँ और उन अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक एवं विभागीय कार्रवाई की जाए, जो खुले तौर पर अन्य धर्मों के प्रतीक धारण करने वाले लोगों को मंदिर परिसर में प्रवेश देते हैं।

अदालत के मुख्य निर्देश और टिप्पणियाँ

बेंच ने अपने फैसले में कहा, 'क्या यह कहा जा सकता है कि कुछ लोगों के गर्भगृह में प्रवेश करने से अपवित्रता होती है? आगम इस मुद्दे को स्पष्ट रूप से संबोधित करते हैं।' अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि ऐतिहासिक रूप से हिंदुओं के कुछ वर्गों को भी मंदिर के ध्वजस्तंभ को पार करने की अनुमति नहीं थी, परंतु न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे आगमिक निर्देशों को आज स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि संविधान सर्वोच्च है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आगमिक निर्देश केवल उन गैर-हिंदुओं पर लागू होते हैं, 'जिन्होंने अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।' इसका अर्थ यह है कि जो गैर-हिंदू देवी-देवताओं के प्रति सम्मान की लिखित घोषणा करते हैं, उन्हें प्रवेश की अनुमति मिल सकती है।

कानूनी पृष्ठभूमि और राज्य का पक्ष

गौरतलब है कि इसी अदालत ने पहले भी आगमिक मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर स्पष्ट फैसला दिया था। हालाँकि, हाल ही में मंदिरों में हुई कुछ घटनाओं के मद्देनज़र याचिकाकर्ता ने पुनः स्पष्टीकरण माँगा था।

तमिलनाडु सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया कि तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम और संबंधित नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा है और आगे भी जारी रहेगा। तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम यह परिभाषित करता है कि मंदिर, चाहे किसी भी नाम से जाना जाए, मूलतः हिंदुओं या हिंदू समुदाय के वर्गों के लिए एक सार्वजनिक पूजा स्थल है।

आम जनता पर असर

यह फैसला तमिलनाडु के हज़ारों मंदिरों में प्रवेश नीति को प्रभावित कर सकता है, विशेषकर उन आगमिक मंदिरों में जहाँ परंपरागत नियम अधिक कड़े हैं। जो गैर-हिंदू श्रद्धा भाव से मंदिर आना चाहते हैं, उनके लिए अंडरटेकिंग का प्रावधान एक मध्यम मार्ग के रूप में उभरता है।

आलोचकों का कहना है कि इस फैसले के व्यावहारिक क्रियान्वयन को लेकर अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं — जैसे कि 'सम्मान' की परिभाषा और उसकी जाँच का तरीका। न्यायालय का यह फैसला आने वाले समय में संवैधानिक व्याख्याओं और मंदिर प्रशासन से जुड़ी बहसों को और गहरा कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

इसका कोई स्पष्ट तंत्र अभी तक सामने नहीं आया है। तमिलनाडु में जहाँ मंदिर प्रशासन राज्य के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के अधीन है, वहाँ इस फैसले का राजनीतिक और सामाजिक प्रतिध्वनि दोनों होगी। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर चूक जाती है वह यह है कि 'अंडरटेकिंग' का प्रावधान वास्तव में समावेशी है — यह द्वार बंद नहीं करता, बल्कि श्रद्धा को प्रवेश की कसौटी बनाता है।
RashtraPress
28 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मद्रास हाईकोर्ट मदुरै बेंच का मंदिर प्रवेश पर क्या फैसला आया है?
मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच ने 28 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाया कि जो गैर-हिंदू सार्वजनिक रूप से अन्य धर्मों के प्रतीक धारण करते हैं और हिंदू देवी-देवताओं के प्रति आस्था या सम्मान व्यक्त नहीं करते, उन्हें हिंदू मंदिर परिसर में प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए। जो गैर-हिंदू अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर कर सम्मान व्यक्त करते हैं, उन्हें प्रवेश की अनुमति मिल सकती है।
यह मामला अदालत में किसने और क्यों उठाया?
हिंदू मुन्नानी के मदुरै जिला समन्वयक थंगम वेंकटेश ने मदुरै बेंच के सामने जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने गैर-हिंदुओं को मंदिरों के प्रतिबंधित गर्भगृहों में प्रवेश से रोकने, संबंधित कानूनों को सख्ती से लागू करने और उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की थी।
क्या गैर-हिंदू अब किसी भी हिंदू मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते?
नहीं, फैसले में पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जो गैर-हिंदू हिंदू देवी-देवताओं के प्रति सम्मान की अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर करते हैं, उन्हें प्रवेश दिया जा सकता है। यह निर्णय मुख्यतः उन व्यक्तियों पर लागू होता है जो अन्य धर्मों के प्रतीक प्रदर्शित करते हैं और सम्मान व्यक्त नहीं करते।
तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम क्या कहता है?
तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम के अनुसार, मंदिर चाहे किसी भी नाम से जाना जाए, वह हिंदुओं या हिंदू समुदाय के वर्गों के लिए एक सार्वजनिक पूजा स्थल है। राज्य सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया है कि इस अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन जारी रहेगा।
अदालत ने आगमिक निर्देशों के बारे में क्या कहा?
अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान सर्वोच्च है और हिंदुओं के किसी वर्ग को ध्वजस्तंभ पार करने से रोकने वाले पुराने आगमिक निर्देश आज स्वीकार्य नहीं हैं। हालाँकि, गैर-हिंदुओं के संदर्भ में आगमिक प्रावधान उन पर लागू होते हैं जिन्होंने सम्मान की अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
राष्ट्र प्रेस
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