13 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

गणेश चतुर्थी 2026: इको-फ्रेंडली मूर्तियों की धूम, येवला की पैठणी गणपति बनी खास आकर्षण

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
गणेश चतुर्थी 2026: इको-फ्रेंडली मूर्तियों की धूम, येवला की पैठणी गणपति बनी खास आकर्षण

सारांश

इस गणेश चतुर्थी पर देश बदल रहा है — रासायनिक रंगों की जगह शुद्ध मिट्टी ले रही है, और येवला की पैठणी-डायमंड वर्क गणपति परंपरा को नए रूप में पेश कर रही है। पर्यावरण-जागरूकता और सांस्कृतिक विरासत का यह मेल इस साल के उत्सव को अलग बना रहा है।

मुख्य बातें

गणेश चतुर्थी 2026 से पहले देश के कई राज्यों में बाज़ारों में भारी रौनक और भक्तों की भीड़ देखी जा रही है।
कर्नाटक के तुमकुरु में मूर्तिकारों के अनुसार बिना केमिकल रंग वाली शुद्ध मिट्टी की मूर्तियों की बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक है।
महाराष्ट्र के येवला में पैठणी शेला और डायमंड वर्क से सजी विशेष गणेश मूर्तियाँ आकर्षण का केंद्र बनी हैं।
तमिलनाडु के कुड्डालोर और उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में भी त्योहारी माहौल और इको-फ्रेंडली विकल्पों की माँग देखी जा रही है।
मिट्टी की मूर्तियाँ निर्माण लागत में भी सस्ती होती हैं, जिससे ये सामान्य परिवारों के लिए सुलभ हो जाती हैं।

गणेश चतुर्थी 2026 से पहले देशभर के बाज़ारों में उत्साह और रौनक छाई हुई है। कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र — सभी राज्यों में भक्त इस बार पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की ओर तेज़ी से झुक रहे हैं। इस त्योहार का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि बिना केमिकल रंग वाली शुद्ध मिट्टी की गणेश मूर्तियों की माँग पिछले वर्ष की तुलना में कहीं अधिक देखी जा रही है।

इको-फ्रेंडली मूर्तियों की बढ़ती माँग

कर्नाटक के तुमकुरु शहर के जूनियर कॉलेज ग्राउंड्स में विभिन्न प्रकार की गणेश मूर्तियाँ बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। भक्त खासतौर पर उन मूर्तियों की तलाश में हैं जो पूरी तरह मिट्टी से बनी हों और जिनमें किसी भी रासायनिक रंग का इस्तेमाल न किया गया हो। मूर्तिकार रामचंद्रप्पा ने बताया, 'पिछले साल के उलट इस बार लोग बिना पेंट वाली गणेश मूर्तियाँ खरीद रहे हैं। आज सुबह जैसे ही हमने अपने स्टॉल लगाने शुरू किए, भक्त पूरी तरह से मिट्टी से बनी मूर्तियाँ खरीदने और प्री-बुक करने के लिए आगे आए, जिनमें कोई केमिकल रंग इस्तेमाल नहीं होता।'

एक अन्य विक्रेता मंजूनाथ ने पर्यावरणीय जागरूकता पर ज़ोर देते हुए कहा, 'इस बार लोग खासतौर पर बिना पेंट की गणेश मूर्तियों की माँग कर रहे हैं। वे समझते हैं कि रंगीन मूर्तियों का इस्तेमाल करने से पर्यावरण को नुकसान होता है। पिछले साल की तुलना में इस साल बिना पेंट की गणेश मूर्तियों की बिक्री काफी अधिक है।' उल्लेखनीय है कि बिना रंग की मूर्तियाँ निर्माण लागत के लिहाज़ से भी सस्ती पड़ती हैं, जिससे ये आम भक्तों के लिए भी सुलभ हो जाती हैं।

तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में पर्व का माहौल

तमिलनाडु के कुड्डालोर में भी त्योहार को लेकर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है। थिरुप्पुलियूर और कुड्डालोर के अन्य हिस्सों के बाज़ारों में पारंपरिक पूजा सामग्री — फूल, पत्ते, फल और सजावटी वस्तुएँ — बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में रंग-बिरंगी इको-फ्रेंडली गणपति की मूर्तियाँ बाज़ार में छाई हुई हैं और इन्हें लेकर स्थानीय भक्तों में ख़ासा उत्साह है।

येवला की पैठणी गणपति: परंपरा और आधुनिकता का अनोखा मेल

महाराष्ट्र के येवला शहर से इस बार एक विशेष आकर्षण सामने आया है। पैठणी साड़ी कला के लिए प्रसिद्ध इस शहर में गणेश मूर्तियों की सजावट में भी पैठणी शैला का उपयोग किया गया है। मूर्तियों के मुकुट और अन्य हिस्सों पर बारीक डायमंड वर्क किया गया है, जो रोशनी पड़ते ही चमकने लगता है और मूर्तियों को एक शाही और भव्य रूप देता है।

दुकानदार श्रेया गाढे ने बताया, 'हम भगवान गणेश की मूर्तियाँ लेकर आते हैं। इस बार गणेश मूर्तियों की सजावट में पैठणी की झलक है। बाज़ार में अलग-अलग तरह की मूर्तियाँ मिलती हैं, लेकिन हमारे यहाँ इस पैठणी वाली गणेश की मूर्ति मिलेगी।' परंपरागत पैठणी कला और समकालीन सजावट का यह अनूठा संगम गणेश भक्तों के बीच तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है।

इको-फ्रेंडली उत्सव: व्यापक प्रवृत्ति का संकेत

यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जन-जागरूकता बढ़ रही है और विभिन्न न्यायालयों व सरकारों ने भी त्योहारों में प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों पर अंकुश लगाने की कोशिशें की हैं। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंग वाली मूर्तियों से जल-निकायों में प्रदूषण की शिकायतें बढ़ी हैं, जिसके चलते मिट्टी की मूर्तियों की वापसी को सामाजिक स्वीकृति मिल रही है।

इस गणेशोत्सव में पर्यावरण-प्रेमी भक्ति की यह धारा न केवल धार्मिक आस्था का उत्सव है, बल्कि सामूहिक ज़िम्मेदारी का भी प्रतीक बनती जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

सरकारों और नागरिक समाज ने मिलकर वर्षों में बनाया है। येवला की पैठणी गणपति इस बात की याद दिलाती है कि स्थानीय दस्तकारी और धार्मिक उत्सव एक-दूसरे को मज़बूत कर सकते हैं — यह वह कड़ी है जिसे आर्थिक नीति-निर्माताओं को पर्यटन और हस्तशिल्प प्रोत्साहन के नज़रिए से भी देखना चाहिए। हालाँकि, इको-फ्रेंडली का दावा तब तक अधूरा है जब तक विसर्जन के बाद जल-निकायों की गुणवत्ता को नियमित रूप से मापा और सार्वजनिक नहीं किया जाता।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गणेश चतुर्थी 2026 में इको-फ्रेंडली मूर्तियाँ इतनी लोकप्रिय क्यों हो रही हैं?
इस साल भक्त बिना केमिकल रंग वाली शुद्ध मिट्टी की मूर्तियाँ अधिक पसंद कर रहे हैं क्योंकि वे पर्यावरण को होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक हो रहे हैं। तुमकुरु के मूर्तिकारों के अनुसार पिछले साल की तुलना में इस साल ऐसी मूर्तियों की बिक्री और प्री-बुकिंग काफी अधिक है।
येवला की पैठणी गणपति मूर्ति क्या है और यह कहाँ मिलती है?
महाराष्ट्र के येवला शहर में इस बार गणेश मूर्तियों की सजावट में पारंपरिक पैठणी शेला और बारीक डायमंड वर्क का उपयोग किया गया है। यह मूर्तियाँ येवला के स्थानीय बाज़ारों में उपलब्ध हैं और रोशनी में डायमंड वर्क के चमकने से इन्हें विशेष भव्य रूप मिलता है।
क्या इको-फ्रेंडली मूर्तियाँ सामान्य मूर्तियों से महँगी होती हैं?
नहीं, बल्कि इको-फ्रेंडली मिट्टी की मूर्तियाँ सस्ती पड़ती हैं क्योंकि इनमें कम या बिल्कुल पेंट की ज़रूरत नहीं होती। कर्नाटक के तुमकुरु में मूर्तिकारों ने बताया कि यही कारण है कि आम परिवार भी इन्हें आसानी से खरीद पा रहे हैं।
देश के किन-किन हिस्सों में गणेश चतुर्थी की तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं?
कर्नाटक के तुमकुरु, तमिलनाडु के कुड्डालोर, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर और महाराष्ट्र के येवला सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बाज़ारों में भारी रौनक है। हर राज्य में स्थानीय परंपरा और इको-फ्रेंडली प्रवृत्ति दोनों का मेल देखने को मिल रहा है।
पैठणी कला क्या है और इसका गणेशोत्सव से क्या संबंध है?
पैठणी महाराष्ट्र की प्रसिद्ध बुनाई कला है, जो येवला और नासिक जैसे शहरों में विकसित हुई है। इस बार येवला के कारीगरों ने इस पारंपरिक शेला का उपयोग गणेश मूर्तियों की सजावट में किया है, जिससे धार्मिक उत्सव और स्थानीय हस्तशिल्प परंपरा का एक अनोखा संगम देखने को मिल रहा है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 52 मिनट पहले
  2. 1 साल पहले
  3. 1 साल पहले
  4. 1 साल पहले
  5. 1 साल पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले