गणेश चतुर्थी 2026: इको-फ्रेंडली मूर्तियों की धूम, येवला की पैठणी गणपति बनी खास आकर्षण
सारांश
मुख्य बातें
गणेश चतुर्थी 2026 से पहले देशभर के बाज़ारों में उत्साह और रौनक छाई हुई है। कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र — सभी राज्यों में भक्त इस बार पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की ओर तेज़ी से झुक रहे हैं। इस त्योहार का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि बिना केमिकल रंग वाली शुद्ध मिट्टी की गणेश मूर्तियों की माँग पिछले वर्ष की तुलना में कहीं अधिक देखी जा रही है।
इको-फ्रेंडली मूर्तियों की बढ़ती माँग
कर्नाटक के तुमकुरु शहर के जूनियर कॉलेज ग्राउंड्स में विभिन्न प्रकार की गणेश मूर्तियाँ बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। भक्त खासतौर पर उन मूर्तियों की तलाश में हैं जो पूरी तरह मिट्टी से बनी हों और जिनमें किसी भी रासायनिक रंग का इस्तेमाल न किया गया हो। मूर्तिकार रामचंद्रप्पा ने बताया, 'पिछले साल के उलट इस बार लोग बिना पेंट वाली गणेश मूर्तियाँ खरीद रहे हैं। आज सुबह जैसे ही हमने अपने स्टॉल लगाने शुरू किए, भक्त पूरी तरह से मिट्टी से बनी मूर्तियाँ खरीदने और प्री-बुक करने के लिए आगे आए, जिनमें कोई केमिकल रंग इस्तेमाल नहीं होता।'
एक अन्य विक्रेता मंजूनाथ ने पर्यावरणीय जागरूकता पर ज़ोर देते हुए कहा, 'इस बार लोग खासतौर पर बिना पेंट की गणेश मूर्तियों की माँग कर रहे हैं। वे समझते हैं कि रंगीन मूर्तियों का इस्तेमाल करने से पर्यावरण को नुकसान होता है। पिछले साल की तुलना में इस साल बिना पेंट की गणेश मूर्तियों की बिक्री काफी अधिक है।' उल्लेखनीय है कि बिना रंग की मूर्तियाँ निर्माण लागत के लिहाज़ से भी सस्ती पड़ती हैं, जिससे ये आम भक्तों के लिए भी सुलभ हो जाती हैं।
तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में पर्व का माहौल
तमिलनाडु के कुड्डालोर में भी त्योहार को लेकर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है। थिरुप्पुलियूर और कुड्डालोर के अन्य हिस्सों के बाज़ारों में पारंपरिक पूजा सामग्री — फूल, पत्ते, फल और सजावटी वस्तुएँ — बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में रंग-बिरंगी इको-फ्रेंडली गणपति की मूर्तियाँ बाज़ार में छाई हुई हैं और इन्हें लेकर स्थानीय भक्तों में ख़ासा उत्साह है।
येवला की पैठणी गणपति: परंपरा और आधुनिकता का अनोखा मेल
महाराष्ट्र के येवला शहर से इस बार एक विशेष आकर्षण सामने आया है। पैठणी साड़ी कला के लिए प्रसिद्ध इस शहर में गणेश मूर्तियों की सजावट में भी पैठणी शैला का उपयोग किया गया है। मूर्तियों के मुकुट और अन्य हिस्सों पर बारीक डायमंड वर्क किया गया है, जो रोशनी पड़ते ही चमकने लगता है और मूर्तियों को एक शाही और भव्य रूप देता है।
दुकानदार श्रेया गाढे ने बताया, 'हम भगवान गणेश की मूर्तियाँ लेकर आते हैं। इस बार गणेश मूर्तियों की सजावट में पैठणी की झलक है। बाज़ार में अलग-अलग तरह की मूर्तियाँ मिलती हैं, लेकिन हमारे यहाँ इस पैठणी वाली गणेश की मूर्ति मिलेगी।' परंपरागत पैठणी कला और समकालीन सजावट का यह अनूठा संगम गणेश भक्तों के बीच तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है।
इको-फ्रेंडली उत्सव: व्यापक प्रवृत्ति का संकेत
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जन-जागरूकता बढ़ रही है और विभिन्न न्यायालयों व सरकारों ने भी त्योहारों में प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों पर अंकुश लगाने की कोशिशें की हैं। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंग वाली मूर्तियों से जल-निकायों में प्रदूषण की शिकायतें बढ़ी हैं, जिसके चलते मिट्टी की मूर्तियों की वापसी को सामाजिक स्वीकृति मिल रही है।
इस गणेशोत्सव में पर्यावरण-प्रेमी भक्ति की यह धारा न केवल धार्मिक आस्था का उत्सव है, बल्कि सामूहिक ज़िम्मेदारी का भी प्रतीक बनती जा रही है।