जनरल द्विवेदी सेवानिवृत्त: ऑपरेशन स्नो लेपर्ड व सिंधु के बाद भारतीय सेना दोनों सीमाओं पर पूरी तरह तैयार
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी मंगलवार, 30 जून 2026 को औपचारिक रूप से सेवानिवृत्त हो गए। अपने विदाई समारोह में उन्होंने खुलासा किया कि पिछले दो वर्षों में सेना ने उत्तरी सीमाओं पर ऑपरेशन स्नो लेपर्ड और पश्चिमी मोर्चे पर ऑपरेशन सिंधु के अंतर्गत व्यापक सैन्य तैयारियाँ पूरी की हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भविष्य के युद्ध संयुक्त और एकीकृत अभियानों पर टिके होंगे, इसलिए तीनों सेनाओं के बीच सुदृढ़ तालमेल और स्पष्ट रणनीतिक दृष्टि अनिवार्य है।
नेतृत्व-परिवर्तन और समीक्षा की प्रक्रिया
वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ कर्नल डी.एस. चीमा (सेवानिवृत्त) ने इस घटनाक्रम पर कहा कि किसी भी सेना प्रमुख की विदाई के समय संपूर्ण सैन्य ढाँचे की स्थिति-समीक्षा और जिम्मेदारियों का हस्तांतरण एक सुस्थापित संस्थागत प्रक्रिया है। उनके अनुसार, जब नया सेना प्रमुख कार्यभार संभालता है, तब मौजूदा तैयारियों का व्यापक आकलन किया जाता है ताकि निरंतरता बनी रहे।
कर्नल चीमा ने बताया कि जनरल द्विवेदी अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में सीमावर्ती क्षेत्रों का निरंतर दौरा कर रहे थे। उन्होंने श्रीनगर सहित अनेक महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों का स्वयं निरीक्षण किया और मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था की ज़मीनी स्थिति का जायज़ा लिया।
पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर सेना की तैयारी
कर्नल चीमा के अनुसार, जनरल द्विवेदी का यह दावा कि भारतीय सेना पूर्णतः तैयार है, वास्तविक ज़मीनी स्थिति के अनुरूप है। पूर्वी लद्दाख में सेना ने अपनी परिचालन क्षमताओं में उल्लेखनीय वृद्धि की है। उन्होंने न्योमा एयरफील्ड का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि यह वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से अत्यंत कम दूरी पर स्थित है और सामरिक दृष्टि से निर्णायक महत्व रखता है। इस एयरफील्ड के विकसित होने से त्वरित सैन्य तैनाती और रसद आपूर्ति की क्षमता पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ हुई है।
उन्होंने जोजिला सुरंग का भी संदर्भ दिया और कहा कि इसके पूर्णतः चालू होने के बाद लद्दाख क्षेत्र तक वर्षभर निर्बाध संपर्क संभव हो जाएगा। इससे सीमावर्ती इलाकों में सैनिकों और सैन्य उपकरणों की आवाजाही सुगम होगी तथा हर मौसम में सैन्य संचालन को नई मज़बूती मिलेगी।
स्वदेशी रक्षा उत्पादन में नई ऊँचाई
कर्नल चीमा ने रेखांकित किया कि भारत अब केवल रक्षा उपकरणों का आयातक देश नहीं रहा। पिछले कुछ वर्षों में स्वदेशी रक्षा उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति हुई है — आज देश आधुनिक हथियार और सैन्य उपकरण न केवल स्वयं निर्मित कर रहा है, बल्कि अनेक देशों को उनका निर्यात भी कर रहा है। उनके अनुसार यह रणनीतिक बदलाव भारत की समग्र सुरक्षा-शक्ति को नई ऊँचाई दे रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि चीन या पाकिस्तान किसी प्रकार की सैन्य आक्रामकता दिखाने का प्रयास करते हैं, तो उन्हें पहले भारतीय सेना की तैयारियों और क्षमताओं का गंभीरता से आकलन करना होगा। दोनों सीमाओं पर सेना पूरी तरह सतर्क और हर परिस्थिति से निपटने के लिए सज्ज है।
एकीकृत युद्ध-संरचना और ड्रोन तकनीक
भविष्य के युद्धों की प्रकृति पर कर्नल चीमा ने कहा कि आधुनिक संघर्ष अब केवल टैंक, तोप और पैदल सेना तक सीमित नहीं रहे। आने वाले समय में युद्ध पूरी तरह इंटीग्रेटेड — अर्थात् संयुक्त सैन्य अभियानों पर आधारित होंगे। भारतीय सेना इसी दिशा में निरंतर काम कर रही है और नई एकीकृत सैन्य संरचनाएँ विकसित की जा रही हैं, जिनमें इन्फैंट्री, आर्मर्ड यूनिट, आर्टिलरी, एयर डिफेंस, इंजीनियरिंग और अन्य सभी आवश्यक सैन्य संसाधनों को एकसाथ जोड़ा जाएगा।
ड्रोन तकनीक पर विशेष बल देते हुए उन्होंने कहा कि हाल के सैन्य अभियानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन निर्णायक भूमिका निभाएँगे — निगरानी, खुफिया सूचना संग्रह, लक्ष्य की पहचान और सटीक हमलों में। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) इस क्षेत्र में तेज़ी से काम कर रहा है और भारत हर महीने हज़ारों ड्रोन निर्माण की क्षमता की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
आगे की राह
कर्नल चीमा ने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा, जहाँ विभिन्न सैन्य इकाइयाँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ड्रोन और स्वदेशी हथियार एकसाथ मिलकर काम करेंगे। नए सेना प्रमुख के कार्यभार संभालने के साथ ही इन एकीकृत संरचनाओं को और गति मिलने की उम्मीद है, जो भारत की सीमा-सुरक्षा को दीर्घकालिक रूप से और अधिक सुदृढ़ बनाएगी।