जनरल उपेंद्र द्विवेदी बने जम्मू-कश्मीर राइफल्स व लद्दाख स्काउट्स के मानद 'कर्नल ऑफ द रेजिमेंट'
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने जम्मू-कश्मीर राइफल्स और लद्दाख स्काउट्स रेजिमेंट के मानद 'कर्नल ऑफ द रेजिमेंट' का दायित्व औपचारिक रूप से ग्रहण कर लिया है। नई दिल्ली में 23 जून को आयोजित एक गरिमामय सैन्य समारोह में यह नियुक्ति संपन्न हुई, जो जनरल द्विवेदी और इन दोनों ऐतिहासिक रेजिमेंटों के बीच के गहरे और अटूट संबंध को रेखांकित करती है।
क्यों छोड़ा था पद, और अब क्यों लिया वापस
उल्लेखनीय है कि जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सेना की सर्वोच्च कमान संभालने के बाद जम्मू-कश्मीर राइफल्स एवं लद्दाख स्काउट्स के 'कर्नल ऑफ द रेजिमेंट' का पद स्वेच्छा से छोड़ दिया था। सेना प्रमुख के रूप में उन्होंने यह सिद्धांत अपनाया था कि वे अपने कार्यकाल के दौरान किसी एक रेजिमेंट के कर्नल का पद नहीं रखेंगे — ताकि संपूर्ण सेना के प्रति उनकी निष्पक्षता और समान उत्तरदायित्व बनी रहे। यह निर्णय भारतीय सेना की सर्वोच्च नेतृत्व परंपराओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण था।
अब सेना प्रमुख के कार्यकाल के उचित चरण में उन्होंने दोनों रेजिमेंटों के साथ इस मानद संबंध को पुनः स्वीकार किया है, जो उनकी रेजिमेंटल जड़ों और भावनात्मक जुड़ाव की स्वाभाविक परिणति है।
समारोह और परंपरागत सम्मान
इस अवसर पर आयोजित सैन्य समारोह में वर्तमान कर्नल ऑफ द रेजिमेंट लेफ्टिनेंट जनरल एम. पी. सिंह ने जनरल उपेंद्र द्विवेदी को परंपरागत मानद कर्नल की बैटन भेंट की। यह बैटन-हस्तांतरण भारतीय सेना की रेजिमेंटल संस्कृति में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक क्षण होता है। समारोह ने नेतृत्व, निष्ठा और रेजिमेंटल भावना की उन गौरवशाली परंपराओं को पुनः रेखांकित किया जो भारतीय सेना की पहचान हैं।
'कर्नल ऑफ द रेजिमेंट' पद का महत्व
भारतीय सेना में 'कर्नल ऑफ द रेजिमेंट' एक मानद और अत्यंत प्रतिष्ठित पद होता है, जो सेना के नियमित 'कर्नल' सैन्य रैंक से सर्वथा भिन्न है। सामान्यतः यह पद किसी लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के वरिष्ठ अधिकारी को दिया जाता है, जिसे उस रेजिमेंट का संरक्षक या अभिभावक नामित किया जाता है। इस पद पर आसीन अधिकारी रेजिमेंट के नैतिक संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं — सैनिकों और उनके परिवारों का मनोबल बढ़ाते हैं, और पूरी रेजिमेंट को एक परिवार की तरह एकजुट रखते हैं।
यह पद केवल उसी अधिकारी को मिलता है जिसका उस रेजिमेंट से गहरा और दीर्घकालिक संबंध रहा हो। कई बार सेना प्रमुख भी अपनी मूल रेजिमेंट के मानद कर्नल का पद ग्रहण करते हैं — यही परंपरा जनरल द्विवेदी ने भी निभाई है।
रेजिमेंटों की विरासत और सम्मान
जम्मू-कश्मीर राइफल्स और लद्दाख स्काउट्स दोनों ही भारतीय सेना की उन रेजिमेंटों में शुमार हैं जिन्होंने देश की सबसे दुर्गम सीमाओं पर असाधारण शौर्य और बलिदान का इतिहास रचा है। लद्दाख स्काउट्स विशेष रूप से उच्च-ऊँचाई वाले युद्धक्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता के लिए विख्यात है। जनरल द्विवेदी का इन रेजिमेंटों के मानद कर्नल बनना न केवल उनके व्यक्तिगत जुड़ाव को, बल्कि इन रेजिमेंटों की समृद्ध सैन्य परंपराओं और बलिदान की विरासत को भी राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करता है।
आगे क्या
यह नियुक्ति रेजिमेंट के सक्रिय अधिकारियों, जवानों और पूर्व सैनिकों — सभी के लिए गर्व का विषय है। सेना प्रमुख की यह भूमिका रेजिमेंटल एकता और मनोबल को और सुदृढ़ करेगी, तथा जम्मू-कश्मीर व लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात सैनिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।